बलिदानी सिपाहियों के शव उतरे लोडर से और SP साहब उतरे AC कार से.. क्या IPS इंसानों से एक सीढ़ी ऊपर होते हैं या अभी भी है ब्रिटिश काल?

उन सिपाहियों के घरों से जो जिस हालात में था , फोन पर खबर मिलते ही वैसे ही भागा होगा.. किसी ने चप्पल नही पहनी रही होगी तो किसी के कपड़े आधे खुले रहे होंगे.. किसी की थाली आढ़ई खाई रही होगी तो कोई नहाने के लिए बाल्टी आधी भर पाया रहा होगा.. उन्हें होश भी नही रहा होगा जब उन्हें सुनाई दिया होगा कि उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर तैनात उनके पिता, पति,भाई या पुत्र अब नही रहे और उन्हें गोली मार दी गई.. वो पैदल ही जल्द से जल्द घटना स्थल तक पहुचने की कोशिश में लग गए होंगे और पूरे शरीर को कान ,आंख औऱ नाक लगा कर ये टेस्ट करने के लिए की शायद कहीं से कोई भी, एक सांस जरा सा भी चल रही हो, धमनियों में थोड़ी सी हलचल हो या दिल मे बहुत जरा सी धकड़न बच गयी हो..आखिर वो उनके परिवार के थे.. वो परिवार जिसे वो सिपाही वर्दी उतार कर कभी शाम को तो कभी 2 – 3 दिन बाद देखा करता या मिला करता था..

लेकिन एक दावा और होता है जो वो दोनों सिपाही जीवित रहते हुए सुना करते रहे होंगे.. उन्होंने अपने थानेदार, अपने क्षेत्राधिकारी, अपने एडिशनल साहब , अपने कप्तान साहब से कई बार सुना रहा होगा कि वो सब पुलिस परिवार के सदस्य हैं.. इन दोनों के बलिदान के बाद पुलिस के साथ जोड़े जाने वाले उस “परिवार” शब्द की पोल खुल गई.. अगर परिवार शब्द का जरा सा भी ध्यान होता तो उन दोनों पुलिसकर्मियों के शव इतनी बेरहमी से लोडर में लाद कर के न आये होते..परिवार वो थे जो अब जीवन भर उन्हें याद कर के दहाड़े मार मार कर रोयेंगे.. परिवार वो हैं जो अब कभी फीस के लिए, कभी कपड़े के लिए तो कभी साबुन तेल के लिए संघर्ष करेंगे..परिवार व पत्नी है जो अब बिना सिंदूर के बचा जीवन बिताएगी.. परिवार वो बच्चे हैं जो अब अनाथ हो चुके हैं..वो क्या परिवार हैं जिन्होंने उनके पार्थिब शरीर की टांग और हाथ पकड़ कर उन्हें लोडर में डाल दिया..

जब दिवंगत हुए उत्तर प्रदेश के उन वीरों का शव लोडर में डाले जा रहे थे तब ठीक उसी समय वहां के पुलिस अधीक्षक महोदय एयरकंडीशन कार से स्थिति का जायज़ा ले रहे थे.. एक सोते सिपाही पर एक्शन लेने के लिए आधी रात में ही सक्रिय हो जाने वाले कप्तान साहब सदा के लिए सो गए 2 सिपाहियों को देख कर इतना भी सक्रिय नही हुए की उनके शवो को ससम्मान थाने या उनके घरों तक लाने की व्यवस्था कर दें..यहां ये ध्यान रखना होगा कि अक्सर लावारिश शवो को ठीक से न ले जाने के चलते पुलिसकर्मियों को निलंबन तक झेलना पड़ता है जिसमे DGP और मुख्यमंत्री तक संज्ञान लेते हैं लेकिन आज जब खुद वर्दी वालों को उस से बदतर हालात में लाया गया तो संज्ञान किस ने और किस पर लिया ये अभी तक रहस्य बना हुआ है ..

ये दोनों सिपाही बाकी कई अन्य की तरह नही थे जिन्होंने पुलिस की अव्यवस्थाओं पर चिट्ठी लिख कर अपने कमरे में आत्महत्या कर ली हो..ये तो बहादुरी से लड़े थे और मैदान युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुए थे..फिर इनका सम्मान क्यो नही किया गया ये वो लोग ही बता सकते हैं जो शायद खुद को इंसान से एक सीढ़ी ऊपर समझ लेते हैं..ये भी हो सकता है कि संभल के इंसान से एक सीढ़ी ऊपर महोदय अपने आप को सही व पाक साफ साबित करने के लिए किसी इंसान अर्थात दरोगा, थानेदार या सिपाही पर कार्यवाही कर के खुद से खुद की पीठ थपथपा लें लेकिन वो न्याय केवल उनकी नजर में या उन्हें पसन्द करने वाले उनके सीनियरों की दृष्टि में होगा..वीडियो में सब कुछ देख और समझ चुकी जनता फिलहाल उन्हें इस कृत्य के लिए कभी क्षमा नहीं करने वाली..यहाँ तमाम नजरें प्रदेश के शासक पर जा कर टिकी हैं जिस से इस मामले में निष्पक्ष कार्यवाही की आशा कर किसी को है ..वीरों पर हमला कर के उनके शरीर को चोट पहुचाने वाले अपराधी यकीनन दोषी हैं लेकिन उनके शवो का निरादर करने वाले बड़े साहब ने उनकी आत्मा को पीड़ा पहुचाई है जिस पर वो जरूर होना चाहिए जिसे न्याय कहते हैं.. परमात्मा दिवंगत वीरों की आत्मा को शांति दे और खुद को इंसानों से एक सीढ़ी ऊपर मानने वालों को सदबुद्धि भी..

 

रिपोर्ट-

राहुल पांडेय

सहायक संपादक- सुदर्शन न्यूज

मुख्यालय नोएडा

मोबाइल- 9598805228

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