कूटनीति तो कृष्ण ने भी अपनाई थी, लेकिन कभी कंस का साथ नही लिया- सुरेश चव्हाणके

जरा विचार कीजिये कि जिसके विरुद्ध लड़ाई में एक शत्रु की नजर रख कर जनता ने आपका साथ दिया रहा हो , कल जनता का वही शत्रु आपके साथ अपने बगल ने साथी बन कर खड़ा हो जाये तो जनता के मन पर कितना गहरा आघात जाएगा और वो आपके बगल खड़े उस व्यक्ति को अपना मित्र मानेगी या आपको भी उसी के समान एक शत्रु मान बैठेगी ? कम से कम शांत मन से इस मुद्दे पर मंथन बेहद जरूरी है …

जो नरेश अग्रवाल हिंदुओं के आराध्य को अपशब्द बोले, जो नरेश अग्रवाल पूरी जिंदगी केवल हिन्दू संगठनों को बैन करने की मांग उठाये, जिसने भारत की फौज के पराक्रम पर सवाल उठाए , जिसने भारत के लाल कुलभूषण जाधव को आतंकी से तुलना किया , जिसने अपराध से लड़ती पुलिस के सभी मुठभेड़ों को फर्जी बता दिया उस नरेश अग्रवाल के बगल में खड़े हो कर प्रभु श्रीराम के मंदिर के पक्षधर, सेना का सम्मान करने की दुहाई देने वाले, पुलिस के पराक्रम को नमन करने वाले आदि क्या साबित करना चाहते हैं और क्या सच मे वो जनता को इतना नासमझ समझते हैं ?

कूटनीति एक ऐसा विषय है जो भारत के युद्ध कौशल और भारत की राज्य नीति का आदि काल से हिस्सा रहा .. प्रभु श्रीराम से ले कर , प्रभु श्री कृष्ण और आचार्य चाणक्य तक ने कूटनीति का सहारा लिया था ..  कूटनीति के आधार पर प्रभु श्रीराम ने रावण को साथ कभी नही लिया ,  कूटनीति के ही आधार पर श्रीकृष्ण ने कभी कंस या दुर्योधन से हाथ नही मिलाया , आचार्य चाणक्य ने भी कभी कूटनीति के नाम पर किसी विधर्मी को चन्द्रगुप्त के आस पास भी नही फटकने दिया … इतिहास गवाह है कि कूटनीति विधर्मियी के दमन के लिए धर्म के विशेष मार्ग को कहते हैं , अन्यायी का साथ खुद कर लेना किसी भी हाल में कूटनीति नही हो सकती .

फिर वो कौन ही कूटनीति है जिसके चलते ऐसे विधर्मी उस चौखट तक पहुच गए जहां लोगों को अपने उन तमाम सपनों को पूरा करने की आशा थी जो उन्होंने अपने पुरखों की आत्मा के संग पिछले हजार साल से संजोए थे ..अंत के सलाह सिर्फ इतनी है कि एक बार फिर से अपने फैसले पर पुनर्विचार करें जिस से धर्मनिष्ठ जनता के ताजे घाव जल्द से जल्द भरें और वो घाव नासूर न बने …

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