क्या आतंकवाद, धर्मांतरण और लैंड जिहाद को नापसंद करने वाले लोगों को अब नहीं रहा पुलिस, सरकार या अदालतों पर विश्वास .. “न्यूजीलैंड हमला”

ये बहुत ही हृदय विराद्क है और साथ में भयावाह भी . बंदूकधारी ने मस्जिद में घुस पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई और जो न्यूजीलैंड अपनी शांति और सुन्दरता के लिए जाना जाता था वही न्यूजीलैंड नहा गया रक्त से .. अचानक हुए इस हमले के बाद पूरी दुनिया भर में एक नई चर्चा छिड़ गयी और सबकी नजर उस हमलावर पर चली गयी जो इस मामले में मुख्य गुनाहगार है.. उसकी फेसबुक से लाईव हुई वीडियो भी दुनिया भर में वायरल हो रही है .

लेकिन यकीनन इस पूरे मामले में एक नया पहलू नजर आ रहा है . हमलावर का कहना है कि वो एक वर्ग विशेष द्वारा जमीनों को कब्जाने और दूसरे धर्मों के लोगों का धर्मांतरण करने के चलते नाराज था . वो उस आस्ट्रेलिया से बताया जा रहा है जो पिछले कुछ समय में कई आतंकी और उन्मादी हमले झेल चुका है . निश्चित तौर पर उसके साथ कुछ ऐसा हुआ होगा जो उसको इस राह पर चलने पर मजबूर कर दिया . फिलहाल इतना तो तय है कि हिंसा को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता है .

सवाल एक और उठता है कि क्या किसी प्रकार के मजहबी चरमपंथ के विरोध में किये जा रहे विरोध का स्वरूप अब ऐसे ही हो जाएगा ? क्या अब कुछ लोगों को आतंक , उन्माद , लैंड जिहाद , धर्मांतरण के खिलाफ सरकार की तरफ से उठाये जाने वाले कदमो पर विश्वास नहीं रहा ? क्या अब कुछ लोगों को पुलिस और अदालत आदि व्यवस्था पर भी यकीन नहीं रहा ? न्यूजीलैंड की घटना एक बहुत बड़े संकेत की तरफ संकेत दे रही है ..बेहतर होगा कि उन संकेतों को वो देश पहले समझें जो लैंड जिहाद और धर्मांतरण जैसी घटनाओं से जूझ रहे हैं .

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