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घर 800 किलोमीटर दूर, छुट्टी बस 2 दिन.. “बार्डर स्कीम” निभाते हुए जिला ही नहीं, दुनिया का बार्डर पार कर गये सब इंस्पेक्टर अर्जुन

एक बात समझ से परे है कि जिस व्यवस्था में अपराधी और आतंकियों तक की पैरवी इसलिए की जाती है क्योकि उस से वोटबैंक जुड़ा होता है , उस समय में पुलिस वालों को तकलीफ देने से कौन सा वोटबैंक खुश होता है.. हर कदम पर अपने ट्रांसफर और निलंबन का खतरा झेलने वाला पुलिसकर्मी आखिर क्या सच में इतना ताकतवर होता है कि वो अगर अपने बगल के जिले में रहा तो अपने गृहजनपद को हिला कर रख देगा ? ध्यान रखने योग्य ये है कि अपने जिले में ख़ासा प्रभाव रखने वाले कई दुर्दांत अपराधी जुगाड़ से अपने ही जिले की जेलों में ऐश कर रहे हैं .. लेकिन उनसे भी ज्यादा बदतर हालात में कोई है तो वो है पुलिस वाला .

प्रतापगढ़ और सहारनपुर के बीच की दूरी है लगभग 800 किलोमीटर.. उस राह पर आज एक भीषण एक्सीडेंट हुआ है जिसमे उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर अर्जुन सिंह बलिदान हो गये .. अर्जुन सिंह प्रतापगढ़ में थानेदार थे और जिले के सबसे तेज तर्रार पुलिसकर्मियों में गिने जाते थे .. अर्जुन सिंह सहारनपुर के मूल निवासी थे और कन्नौज के पास आज हुए भीषण सडक हादसे में नहीं रहे .. यद्दपि अर्जुन सिंह ने आँखे मूँद ली हैं लेकिन वो छोड़ गये हैं अपने पीछे कई सवाल जिसका सम्बन्ध बाकी वर्दी वालों से जरूर है .

पुलिस विभाग में पोस्टिंग , ड्यूटी समय, प्रमोशन आदि की नियमितता बाकी अन्य किसी भी विभाग से बहुत कम है लेकिन अनुशासन की अपेक्षा सबसे ज्यादा..क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 800 किलोमीटर दूर रहने वाले एक सब इंस्पेक्टर को मात्र 2 दिन का मौक़ा दिया जाय और उस से कहा जाय कि 2 दिन के अन्दर अंदर घर जाओ और फिर चले आओ .. इतना ही नहीं इसी बीच अपने वो सभी काम भी निबटाओ जो तुम्हे करने हैं . अगर अवकाश ज्यादा हुआ तो विभागीय कार्यवाही तय है .

यहाँ ये उल्लेख करना भी जरूरी है कि कई ऐसे उदहारण हैं कि पुलिस वाले के अवकाश काल में भी अगर कोई घटना उसके क्षेत्र में घट गई तो उसका निलम्बन उसके घर तक भेज दिया जाता है.. भला अवकाश काल में कोई कैसे निलम्बित हो सकता है ये विचार का विषय ही नहीं बल्कि रहस्य के समान एक सवाल है. थानों और चौकियो के अंदर अगर रहने के हालात की चर्चा की जाय तो रहने के लिए वो उपयुक्त व्यवस्था कई जगहों पर नहीं है जहाँ पर एक पुलिस वाला अपनी पत्नी, बच्चो और परिवार को ले कर रह सके ..

इतना ही नहीं , अगर वो व्यवस्थाएं जैसे तैसे हैं भी तो किस पुलिस वाले को कब किस दोष का दोषी मान कर उसका ट्रांसफर न जाने किस जिले में कर दिया जाय ये भी तय नहीं होता .. इसके चलते उसके बच्चो की पढाई बार बार प्रभावित होती हैं और गाँव में कुछ लोगों के मुह से कही जाने वाली वही कहावत चरितार्थ होती है कि कई पुलिस वालों के बच्चे सुखी नहीं होते.. आखिर सुखी हों भी तो कैसे , या तो वो बार्डर स्कीम जैसे नियमो से अपने पिता से दूर होते हैं या फिर अपने पिता के साथ कभी थाना , कभी पुलिस लाइन के चक्कर खानाबदोशो की तरह लगाया करते हैं ..  क्या ऐसे माहौल में कोई खुश रह सकता है , ये बड़ा सवाल है ..  .

सब इंसपैक्टर अर्जुन सिंह मौजूदा थानाध्यक्ष थाना कोहेडोर जनपद प्रतापगढ (उत्तर प्रदेश) हमारे बीच नहीं रहे । आज छुट्टी से वापस जाते समय दुर्भाग्यवश उनकी गाडी का जनपद कन्नौज की सीमा के अन्तर्गत आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे पर सडक हादसा हो गया और वो हम सब की आंखो में आंसू देकर चले गये । सब इंसपैक्टर अर्जुन सिंह जनपद सहारनपुर के रहने वाले थे और करीब दो साल पहले उनका स्थानान्तरण उच्चाधिकारियों ने जनपद मेरठ से जनपद प्रतापगढ किया था.. फिलहाल वो अपने घर से ही नहीं बल्कि दुनिया से भी दूर हो गये हैं . इतना दूर कि शासन के किसी नियम या किसी अधिकारी के आदेश भी अब उन पर लागू नहीं होंगे ..

जब इस मामले में वर्तमान समय में कार्य कर रहे पुलिसवालों से बात करने की कोशिश की गई तो वो एक भी शब्द कैमरे पर बोलने को तैयार नहीं हुए लेकिन उनकी आँखों ने उस दर्द को बता दिया जो वो कहना चाहते थे .. जब इसी मामले में कुछ रिटायर्ड पुलिसकर्मियों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि पुलिस विभाग से सेना जैसे रहने की आशा करना गलत नहीं है बशर्ते उनके वेतन , सुविधा इत्यादि भी उन्ही सैनिको जैसे कर दिए जाएँ .. लेकिन शायद ये सम्भव नहीं है किसी भी सरकार के लिए .. खास बात ये है कि पुलिस वालों पर बार्डर स्कीम जैसे नियम उन पार्टियों ने लगाए हैं जिनकी तमाम नीतियों का वर्तमान सरकार खुल कर विरोध करती है .. लेकिन हर मामले में पुरानी सरकार की नीतियों का विरोध करने वाली वर्तमान योगी सकरार पुलिस के खिलाफ बनाये उन पार्टियों के नियमो से सहमत है ये चौंकाने वाली बात है .

48 घंटे में आना जाना मिला कर 1600 किलोमीटर का सफ़र तय करने चले सब इंस्पेक्टर अर्जुन को घर निकलने से पहले भी एक मिनट का आराम नहीं मिला था .. वो अपनी पूरी ड्यूटी कर के निकले थे और उन्हें 1600 किलोमीटर वापस जा कर भी आराम करने का मौका न मिलता क्योकि उसके बाद फिर से उन्हें वैसे ही काम पर लग जाना पड़ता.. निश्चित तौर पर भले ही उनके शरीर पर वर्दी थी , लेकिन उस वर्दी के अन्दर एक इंसान था .. जबकि “पुलिस” कहने से एक मशीन जैसा एहसास कुछ लोगों में होता है , पर वो पुलिस के साथ साथ अर्जुन सिंह भी थे जो अब नहीं रहे .. अगर मशीन होती तो रिपेयर जरूर हो जाती .

अब सवाल ये उठता है कि क्या सब इंस्पेक्टर अर्जुन के बलिदान के बाद बार्डर स्कीम , ड्यूटी समय , अत्यधिक दबाव , आवासीय सुविधाएं , समयानुसार प्रमोशन जैसे अतिमहत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया जायेगा ? क्या अब किसी और सब इंस्पेक्टर को मिली 48 घंटे की छुट्टी उसकी मौत की दौड़ साबित नहीं होगी ? निश्चित तौर पर इन तथ्यों पर विचार करना समाज की सुरक्षा को और मजबूत करने जैसा होगा क्योकि थके कंधे और टूटे मनोबल से कोई भी रक्षक ज्यादा देर तक समाज की ढाल नहीं बना रह पायेगा…

 

रिपोर्ट – 

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

नोएडा मुख्यालय

मोबाईल – 09598805228

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