UP में एक और सिपाही चढा हिंसा की भेंट .. शासन बताये कि आपात स्थिति में घिरा एक वर्दी वाला क्या करे ? सिपाही सुरेश वत्स बने या सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह ?

उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए बेहद ऊहापोह की स्थिति है . यहाँ पर पुलिस के जवानों के ऊपर एक प्रकार से आफत जैसी आ चुकी है और उन पर जहाँ तहां हमले हो रहे हैं . समाज के रक्षक आज कल अपनी ही रक्षा के लिए परेशान जैसे होते दिख रहे हैं . अगर सही ढंग से देखा जाय तो पुलिस के मनोबल पर पहले वार के रूप में 4 साल पहले प्रयागराज कचेहरी में सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के साथ हुई घटना है. यहाँ अपनी आत्मरक्षा करते हुए सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह को 4 साल से मौत से भी बदतर प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है . उसके बाद ऐसी घटनाओ की बाढ़ सी आ चुकी है .

पिछले कुछ समय से जिस प्रकार से मानवाधिकार आयोग ने पुलिस के हर काम में दखल दिया और हर मुठभेड़ में उनको नोटिस भेजा है वो भी एक बड़ा कारण है . लखनऊ के सिपाही प्रशांत की घटना में एकपक्षीय रूप से एक सिपाही को दोषी बताते हुए जिस प्रकार से हल्ला मचाया गया वो और ऐसे मामलों के और बड़े कारको के रूप में सामने आया .. अब तक किसी ने भी अपराधियों से लड़ते पुलिस के जवान को ये नही बताया कि वो उन हालात में क्या करे जब उसके पास दो रास्ते बचे हो.. या मर जाए , या मार दे .. सवाल ये है कि वो क्या बने ? वीरगति पाने वाला इंस्पेक्टर सुबोध सिंह या अपनी आत्मरक्षा करते हुए सामने वाले का प्रतिकार करने वाला शैलेन्द्र सिंह जिसे बाद में तिल तिल करने के लिए मरने पर छोड़ दिया जाता है .

पुलिस के खिलाफ आरोप लगाने में कोई बड़ी मेहनत नहीं करनी होती है . मात्र कुछ रूपये का नेट पैक डलवा कर पुलिस के खिलाफ एक लेख लिख देना या एक ट्विट कर के किसी के खिलाफ कार्यवाही करवा देना ही कुछ लोगों के लिए पुलिस से जुड़ना कहा जाता है . कभी आधी रात को ठंड में 80 की स्पीड में गाडी दौडा कर किसी अपराधी का पीछा करते ? कभी चिलचिलाती गर्मी में कड़ी धूप में कोई बड़ा जाम खुलवाते , कभी मूसलाधार बारिश में किसी झगड़े को शांत करवाते दृश्य उनके लिए कल्पना से परे होते हैं . असल में पुलिस विभाग किसी भी प्रकार की राजनीति से दूर होता है इसलिए उनकी आदतों में नहीं होता कि वो अपने साथ फोटोग्राफर ले कर चलें .. अन्यथा वो आपके लिए उन तथाकथित नेताओं से अधिक प्रिय होता जिनके लिए तमाम लोग पीछे दौड़ कर नारे लगाते हैं .

फिलहाल गाजीपुर में एक और पुलिसकर्मी सुरेश वत्स समाज की शांति के दुश्मनों से लड़ता हुए अमरता को प्राप्त हो गया है . आखिर पुलिस वाला अपने हाथ किस किस के लिए बंधे ? दुर्दांत अपराधियों के खिलाफ उसको जांच झेलनी पड़े , हिंसक उन्मादियो के आगे घुटने टेकने पड़े , फिर उच्चाधिकारियों से  डांट खानी पड़े . कोई तो बताये कि वो क्या करे .. इतना तो तय है , समाज के रक्षको के कंधे को घायल कर के समाज की रक्षा करने और एक निर्भय समय बनाने के सपने देखना अपने सपने के साथ नईन्साफी होगी .. कभी भगवान् श्रीराम ने अपने भाई भरत से कहा था कि तुम अपनी सैन्य शक्ति को पहले वेतन देना बाद में किसी अन्य को और अपनी सैन्य शक्ति का विशेष ध्यान रखना क्योकि सैन्य शक्ति ही राष्ट्र शक्ति होती है . .. एक योगी द्वारा शासित राज्य उत्तर प्रदेश में कम से कम रामायण के उन आदर्शो का पालन करने की आशा जरूर की जा सकती है . सुदर्शन न्यूज भगवान से उस जांबाज़ सिपाही सुरेश वत्स की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है और उनके परिवार वालों को हर सम्भव मदद देने का संकल्प भी लेता है. साथ ही सरकार से सवाल करता है कि आपात स्थिति में एक पुलिस कर्मी क्या करे ? वो सुबोध सिंह सुरेश वत्स बन कर अपने प्राण त्याग दे या शैलेन्द्र सिंह , प्रशांत  बन कर जीते जी मरने के लिए मजबूर हो जाय ?

 

लेखक –

राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक  सुदर्शन न्यूज , नॉएडा

मो – 9598805228

Share This Post