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हिंदुस्थानी असमंजस में हैं कि ज्यादा खतरनाक कौन ? इस्लामिक आतंकी मसूद अजहर या वामपंथी देश चीन ?

एक बार फिर से चीन ने भारत की जनता के और भारत के सैनिको के ही नहीं बल्कि संसार की शांति और दुनिया के सौहार्द के सबसे बड़े दुश्मन आतंकी मौलाना मसूद अजहर को अन्तराष्ट्रीय आतंकी घोषित होने से बचा लिया है . ये वो समय था जब दुनिया एक हो चुकी थी इस दुर्दांत आतंकी को घुटने के बल बिठाने के लिए लेकिन उसी समय चीन ने आगे बढ़ कर वो कृत्य किया जो उस से वैसे ही आपेक्षित भी था .. इसी के साथ चीनी सामानों के बहिष्कार की मुहिम भी चल निकली है .

इसी मामले में जब और गहराई तक जाया जाय तो और भी तथ्य सामने आते हैं . इस मामले में ये ध्यान देने योग्य है कि आतंकियों की असल फैक्ट्री पाकिस्तान एक इस्लामिक मुल्क है और उसका संरक्षण करने वाला चीन एक वामपंथी देश .. क्या अब के घटनाक्रम के बाद इसको नहीं माना जा सकता है कि आतंक को पैदा करना इस्लामिक मुल्क का काम है और उसको पालना पोषना , सुरक्षा देना और संरक्षण देना वामपंथी देशों का ..

अगर कुछ कट्टर वामपंथियो को देखा जाय तो उनके द्वारा किये गये नरसंहार इस्लामिक आतंकियों से भी कहीं ज्यादा भयानक और भयावाह रहे हैं . चे ग्वेरा हो या फिदेल कास्त्रो या लेनिन . अगर इनकी जीवनी उठा कर देखा जाय तो शायद ही संसार में किसी ने इतना खून बहाया हो .. इतना ही नहीं खुद कम्युनिस्ट देश चीन के वर्तमान शासन जिनपिंन को दुनिया का सबसे युद्धोन्मादी राष्ट्राध्यक्ष कहा जाता है जिनके सीमा विवाद लगभग सभी पड़ोसियों से हैं .

अब भारत के नजरिये से देखा जाय तो कश्मीर में खून की होली खेल रहे दुर्दांत इस्लामिक आतंकियों के पक्ष में बोलने वाले , बंगलादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को निकालने विरोध करने वाले , आतंकी याकूब मेनन की फांसी के विरोध में आधी रात में कोर्ट खुलवाने वाले , हिन्दू परम्पराओं पर लगातार प्रहार करने वाले , विश्वविद्यालयो का माहौल विषैला बनाने की कोशिश करने वाले , जातिवाद की आग लगाने वाले , भारत में चीन का गुणगान करने वाले आखिर कौन हैं . यकीनन इसमें कई ऐसे नाम सामने आयेंगे जो वामपंथी विचारधारा वाले ही हैं .

तो सवाल उठता है कि क्या दुनिया में आतंक और वामपंथ का गठजोड़ भारत में भी उसी नियम और कानून या निर्देशों पर लागू है ? सवाल ये भी है कि भारत वाले पहले किस से खुद को सतर्क करें ? इस्लामिक आतंकियों से या उनको पालती पोषती चीन जैसी वामपंथी विचारधारा से ? मुद्दा ये भी है कि उन्ही वामपंथी पार्टियों से हाथो में हाथ डाल कर चुनाव लड़ने की मंशा रखने वालों और देश की सत्ता अपने हाथ में लेने वालों में से अब भारत की जनता किस किस से सतर्क रहे या किस को अपना मुखिया चुने ? यकीनन ये आत्ममंथन का विषय है जिसके निष्कर्ष पर जल्द ही पहुचना होगा ..

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