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कौन वायरल कर रहा सिपाही प्रशांत की पत्नी के खातों की डिटेल और उसमे जमा पैसों का लाइव बुलेटिन ? जबकि किसी का बैंक खाता होता है उसका बेहद निजी विषय

किसी की भी सुरक्षा में किसी भी प्रकार की चूक की जिम्मेदार नेताओं और आम जनता के हिसाब से सबसे पहले पुलिस मानी जाती है, लेकिन सवाल उठता है कि उस समय क्या किया जाय जब खुद पुलिस वाला ही ऐसी असुरक्षा से पीड़ित हो जाय .. ध्यान देने योग्य है कि भारत में किस के नाम से किसी के मोबाइल की सिम है ये बताना भी नियमों का उल्लंघन है लेकिन लखनऊ पुलिस के जवान प्रशांत के खिलाफ एकतरफा हमला बोल रहे लोगों ने निजता की भी सभी सीमायें पार कर दी हैं . ध्यान देने योग्य है कि ये वही लोग है जो आधार कार्ड की अनिवार्यता को निजता पर हमला बता कर सरकार तक का विरोध कर रहे हैं .

विदित हो कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में देश को हिला कर रख देने वाले घटनाक्रम में जहाँ एक तरफ आरोप प्रशांत पर लग रहे हैं कि उसने अपनी पुलिस की ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई लेकिन ये आरोप लगाते लगाते वो तमाम पुलिस के अंध विरोधी अपनी सीमओं को पार करते हुए खुद भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये हैं अर्थात अपने कर्तव्य से कुकृत्य पर उतारू हो गये हैं . पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया ही नहीं बल्कि अब कई स्थापित मीडिया में भी सिपाही की पत्नी राखी का खाता संख्या बार बार प्रचारित करते हुए उसकी बाकायदा डीटेल सबको बताते हुए उसमे पैसे डालने वालों को गलत और अपराधी घोषित करने की कोशिश चल रही है .

इस अंध विरोध की सीमा उस समय पार हो गयी जब बाकयदा सिपाही प्रशांत की पत्नी राखी का खाता संख्या ही नहीं बल्कि उन का मूल स्थान और गृहजनपद के साथ उनका गाँव तक और पिता तक का नाम प्रचारित किया जाने लगा .. सबसे हैरान करने वाली बात ये रही कि हर घंटे क्रिकेट स्कोर की तरह ये प्रचारित किया जाने लगा कि अब तक कांस्टेबल राखी के खाते में कितने पैसे आ चुके हैं .. कुछ ने तो बाकायदा बैंक की स्टेटमेंट तक को पूरे विश्वास से प्रकाशित कर डाला और इतना ही नहीं , उस खाते में किस पुलिस अधिकारी ने कितना पैसा डाला उसको भी प्रमाणों के साथ प्रचारित किया जाने लगा .

पहला सवाल मीडिया के उस वर्ग से बनता है-जिसके हिसाब से सिपाही प्रशांत ने ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई , तो क्या वो अपनी ड्यूटी ठीक से निभा रहे हैं ? क्या किसी का बेहद निजी विषय उसका बैंक खाता और उसकी डीटेल , यहाँ तक कि बैंक का वो स्टेटमेंट जो कानूनी रूप से केवल खाताधारक निकलवा सकता है , उसको प्रचारित करना , प्रकाशित करना एक मीडिया के जिम्मेदार वर्ग का काम है ? क्या ऐसा काम खुद कर के वो किसी और को कर्तव्य विमुख बता सकते हैं ?

दूसरा सवाल प्रशांत की पत्नी के खातें में पैसे भेजने वालों को दोषी बता रहे लोगों से बनता है . क्या उन्होंने कभी भी कश्मीर में सरेंडर करने वाले आतंकियों के परिवार वालों को मिलने वाली पेंशन या सरकारी सहायता पर सवाल उठाया है ? जबकि ये वो आतंकी हैं जिनके हाथ न सिर्फ देश के कई सैनिको के रक्त से बल्कि कश्मीरी पंडितो के खून से सने हुए हैं .. उन्हें सरकार की तरफ से पेंशन मिलना भारत के स्वस्थ लोकतंत्र का परिचायक है और पति के जीते जी विधवा जैसी हो चुकी राखी को 100 , 200 या 500 की सहायता भेजना इतना बड़ा गुनाह ? क्या उनके हिसाब भारत का सबसे बड़ा दुश्मन पुलिस का सिपाही ही है ..

तीसरा और अंतिम सवाल सरकार से भी बनता है . सरकार बताये कि आज तक किसी बड़े से बड़े गैंग्स्टर पर इतनी त्वरित कार्यवाही जब भी की हो तो उसका प्रमाण दें .. क्या सिपाही प्रवीन ने भागने की कोशिश की ? क्या उसने जांच में किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं किया ? क्या सना सब सही बोल रही थी ? अगर सिपाही प्रवीन ने जांच में पूरा सहयोग किया और खुद से ही खुद को पुलिस को सौंप दिया तो क्या जांच रिपोर्ट आने तक उसको बर्खास्त कर देना उचित था ? अगर सरकारी आंकड़े निकाले जाएँ तो प्रदेश में अध्यापक , डाक्टर , इंजिनियर जैसे कई ऐसे विभाग हैं जिसमे एक नहीं बल्कि कई मामलों में नामजद लोग बाकयदा वर्षो से नौकरी कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट तक से फैसला आये बिना खुद को दोषी मानने को तैयार नहीं .. ऐसे में जांच शुरू होने से पहले ही २ सिपाहियों को बर्खास्त कर देना क्या ये न्याय प्रिय सरकार का कर्तव्य कहा जा सकता है ?

सरकार ही नहीं इस मामले से जुड़े हर वर्ग से अपेक्षा है कि वो एक बार फिर से अपने फैसले पर पुनर्विचार करे और साथ में उन दोषियों पर कार्यवाही भी करे जो किसी के जीवन का बेहद निजी विषय उसका बैंक खाता एक अख़बार की तरह बाँट रहे हैं और उसमे जमा हो रहे पैसे का हर घंटे बुलेटिन जारी कर रहे हैं. सवाल प्रदेश ही नहीं केंद्र की सरकार से भी है . क्या किसी के खाते की पूरी जानकारी निकलवा कर उसका दुष्प्रचार देख कर आने वाले समय में एक आम आदमी नरेन्द्र मोदी के उस डिजिटल इण्डिया के सपने पर विश्वास करेगा जिसमे कहा जाता है कि चिंता मत कीजिए . आप का पैसा और आपकी जानकारी पूरी तरह से सुरक्षित है … अगर सिपाही को कानूनी अपराध का दोषी माना जा रहा है तो उन दुश्प्र्चारियो को साइबर अपराध का दोषी क्यों न माना जाय और क्या लखनऊ की बड़ी बड़ी गद्दियो पर बैठे पुलिस के वो महानुभाव इन साइबर अपराधियों के खिलाफ भी वैसे ही तत्काल एक्शन लेंगे जैसे उन्होंने अपने आगे कांपती टांग से सैल्यूट मारने वाले सिपाहियों पर लिया है ?

 

# उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार हैं .

लेखक – राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

नॉएडा – उत्तर प्रदेश 

सम्पर्क – 9598805228

 

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