आज सडक पर जानवर दिखने पर चौकी इंचार्ज को सस्पेंड किया है, कल आसमान में बादल दिखने पर थानेदार को फांसी तो नही दे दोगे ?

एक रामराज्य के सपने को ले कर उत्तर प्रदेश सरकार आगे बढ़ रही है . ये उत्तर प्रदेश सरकार उसी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसके मुख्य मुखिया वर्तमान समय में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह संसद में पुलिस का दर्द रखने वाले पहले गृहमंत्री बनते हैं और विपक्ष को ललकार कर कहते हैं कि साहब पुलिस को बदनाम करना बहुत आसान है.. वो पुलिस की समस्याओ को भी रेखांकित करते हैं और कम्यूटर तक की निगरानी करने की जिम्मेदारी भी सौंपते हैं पुलिस को ..

पूरे भारत के पुलिस मुखिया कहे जा सकने वाले अमित शाह जी के भाषण के बाद ये लगा कि शायद अब पुलिस वालों की भलाई के लिए कुछ कदम उठाये जायेंगे लेकिन इंच मात्र भी बदलाव नहीं आया उनके हालात में और जो कुछ भी हरदोई में हुआ उसके बाद तो ये लगने लगा कि अगर कोई विभाग सबसे बेसहारा है तो वो है पुलिस.. ऐसा लगा है कि हरदोई के जिलाधिकारी कार्यालय से सीधी चुनौती आयी हो केन्द्रीय गृहमंत्री कार्यालय को और अमित शाह को DM हरदोई ये बताने की कोशिश कर रहे हों कि वो गलत हैं और DM साहब सही ..

सडको पर आवारा पशु दिखाई दिए तो जिलाधिकारी महोदय का पारा चढ़ गया और उन्होंने फ़ौरन ही चौकी इंचार्ज के निलम्बन का आदेश जारी कर दिया था.. अपने निर्णय पर उन्होंने एक बार भी विचार नहीं किया कि एक बार जिला पशुपालन अधिकारी या अन्य किसी से सवाल कर लें इस बावत.. यहाँ ये ध्यान रखने योग्य है कि पुलकित खरे जी एक IAS अधिकारी हैं जिनकी बाकायदा एसोसिएशन है.. लेकिन चौकी इंचार्ज संजय शर्मा वो अराजपत्रित पुलिसकर्मी है जहाँ एसोसियेशन की बात सोचना भी बर्खास्तगी है ..

फ़िलहाल कलम चल गई जिलाधिकारी महोदय की और फ़ौरन आदेश आ गया दरोगा के सस्पेंड होने का.. ये मामला हरदोई के लखनऊ चुंगी क्षेत्र का है.. सडक पर गाय के चलते निलंबन का आदेश उस समय आया जब लखनऊ से लगातार पुलिस वालों को आदेश आ रहे थे कि सावन का अंतिम सोमवार और बकरीद एक साथ आ रही है और हर संदिग्ध व दंगाई पर नजर रखो और अपने क्षेत्र की कानून व्यवस्था को पूरी तरह से काबू में रखो.. शायद दरोगा जी को नहीं पता रहा होगा कि सडक पर खड़े जानवर भी दंगा कर सकते हैं.

यकीनन इसलिए वो जानवर उनकी प्राथमिकता में नहीं रहे होंगे .. अभी हाल में ही जनपद प्रयागराज में कई गौ वंश अचानक ही मर गये थे तो उसमे जिला प्रशासन के विरुद्ध कार्यवाही की गई थी न कि पुलिस के.. वैसे एक बार उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बड़े अधिकारी राहुल श्रीवास्तव ने अपने ट्विटर हैण्डल से एक शिकायतकर्ता को आवारा पशु की जानकारी देने पर उत्तर दिया था कि पुलिस का काम आवारा लोगों को पकड़ना है न कि आवारा पशुओं को .. लेकिन यहाँ मामला एक अराजपत्रित का था.. अब इतना तो हरदोई नहीं बल्कि देश की भी जनता जानना चाहती है कि आवारा पशु किसकी जिम्मेदारी है ? पशुपालन विभाग या अन्य किसी की या पुलिस की . अगर सडक जाम होना पुलिस के लिए दंड का कारण है तो पशु का छुट्टा घूमना जिसका उत्तरदायित्व था उस पर उसी समय एक साथ कार्यवाही क्यों नहीं की गई ? या मंशा ही कुछ और थी ? 

अपने पद के पूरे रुतबे में रहने वाले जिलाधिकारी महोदय से इतना सवाल तो जरूर बनता है कि सडक से हटा कर चौकी इंचार्ज उन गायो को कहाँ रखते ? क्या उनकी पुलिस चौकी इतनी बड़ी थी कि उसमे पुलिसकर्मियों, अभियुक्तों के साथ साथ गाय भी रखी जा सकती हैं ? वैसे सभी ये जानते हैं कि जिलाधिकारी आवास बड़ा होता है या पुलिस चौकी .. लेकिन बात रुतबे की होती है जो चौकी इंचार्ज के पास नहीं है .. सडक के किनारे वो गायें किसके दूकान या घर में कर दी जातीं DM साहब के हिसाब से ये जानना बेहद जरूरी है .

अगला सवाल यहाँ पुलिस के DGP स्तर के अधिकारियो और केन्द्रीय गृहमंत्रालय से भी बनता है . जब पुलिस वालों की ट्रेनिंग मुरादाबाद या सीतापुर या किसी अन्य ट्रेनिंग सेंटर में करवाई जाती है तो उनको सिर्फ अपराधियों से लड़ने की ट्रेनिंग क्यों दी जाती है .. पशुओं को हांकने और पशुपालन की शिक्षा भी क्यों नही दी जाती उन्हें ट्रेनिंग में.. एक दरोगा के पास पिस्टल और वायरलेस ही क्यों दी जाती है , पशुओ को बाँधने के खूंटा और रस्सी आदि भी उसकी चौकी में व्यवस्था क्यों नहीं करवाई जाती है ?

इसके अलावा एक जिले में पशुपालन का विभाग क्यों बना हुआ है ? अपराधी पकड़ने के लिए प्रशिक्षित पुलिस वाला जिस दिन जानवर बाँधने की शुरुआत कर देगा उस दिन समाज का क्या होगा ये सोच कर भी हैरत होती है . क्या ये जिलाधिकारी महोदय एक पुलिस अधिकारी को तब भी सस्पेंड नहीं करेंगे अगर उसके इलाके में किसी व्यक्ति को कुत्ता काट ले.. अगर सडक पर गायें दिखना पुलिस का अपराध है तो उसके क्षेत्र में कुत्ते का काटना भी शायद उसका गुनाह हो, हरदोई के जिलाधिकारी महोदय के हिसाब से.

अगर वेतन की बात की जाय तो पशुपालन अधिकारी के वेतन में एक पूरी पुलिस चौकी का खर्च शायद चल जाए.. जब एक SSP , DIG दरोगा या इंस्पेक्टरों से क्राइम मीटिंग में सवाल करता है तो उसको इलाके में मौजूद चेन स्नेचर , रेपिस्ट , शूटर , रोड होल्डर आदि की जानकारी देना होता है न कि इलाके में मौजूद आवारा पशु और काटने वाले कुत्तों की.. यही हाल SSP और DIG का होता है जब वो अपने कार्यों का लेखा जोखा मुख्यमंत्री या गृहसचिव आदि को देते हैं ..

यहाँ धन्यवाद देना होगा और सराहना करनी होगी वर्दी पहन कर लूट, हत्या, आतंकवाद आदि को रोकने की जिम्मेदारी उठाये और अब जानवरों और कुत्तो की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी उठा रहे पुलिसकर्मियों की जो तमाम आक्षेप सहने के बाद भी, हर दिन कार्यवाही झेलने के बाद भी समाज की रक्षा रात में जाग कर, बरसात में भीग कर, धूप में जल के कर रहे हैं. यकीनन जिलाधिकारी महोदय हरदोई के बंगले पर सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी अब ज्यादा सतर्क रहेगा कि DM साहब के आवास में बिना परमिशन के कोई इन्सान तो दूर कुत्ता , बिल्ली , गाय यहाँ तक कि चिड़िया भी न घुस जाए..

क्या पता जिलाधिकारी महोदय गुस्से में उसका भी वही हाल कर दें जो उन्होंने चौकी इंचार्ज संजय शर्मा के साथ किया है.. जब भ्रमण पर निकले होंगे DM साहब तो उन्हें सिर्फ सडक पर जानवर ही नहीं खड़े दिखे होंगे , बल्कि पुलिस चौकी में मूलभूत सुविधा न होना भी दिखाई दिया होगा जिसमें सिपाही कैसे सोते होंगे , क्या खाते होंगे , पकड़े गये वाहन कहाँ रखते होंगे आदि समस्याएँ भी रही होंगी .. लेकिन ये सब जरूरी नहीं था, बल्कि उन्हें ये तो साबित करना ही था कि उनके पास बहुत ताकत है और उन्होने साबित भी कर दिया .

प्रार्थना ये भी करनी होगी कि ताकत का यही गुरुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को और प्रधानमन्त्री नरेंद मोदी को न हो जाये अन्यथा समाज और समाज को चला रहे लोगों का क्या हाल हो जायेगा इसकी कल्पना कर के भी सिहर उठेगा कोई भी.. अभी हाल में ही एक जज साहब ने एक सिपाही की वर्दी उतारने का आदेश दिया था.. हरदोई में जो हुआ उसको भी वर्दी उतारने जैसा ही माना जाएगा.. वो वर्दी जो एक पुलिस वाले के लिए खाल के समान होती है और उसके दम पर ही उसका परिवार पल रहा होता है और कई परिवर सुरक्षा का एहसास कर रहे होते हैं .

उत्तर प्रदेश पुलिस के तमाम अधिकारियो का अक्सर शासन से कहना होता है कि उसके पास पुलिस बल कम है और उन्हें अतिरिक्त पुलिस स्टाफ उपलब्ध करवाया जाय.. खुद शासन भी आये दिन तमाम पुलिसकर्मियों और दरोगाओ की भर्ती करने के दावे करता है .. देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है लेकिन पुलिस वाले उतने ही हैं .. और उन कम पुलिस वालों में तमाम जिलाधिकारी महोदय के ऐसे आदेशो का शिकार बन कर घरो में बैठे हैं और अपनी बहाली के लिए अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं .

क्या ये नहीं हो सकता है कि उस समय चौकी इंचार्ज अपने मुख्य मुखिया पुलिस अधीक्षक द्वारा बताये गए किसी और जरूरी आदेश का पालन कर रहे हों.. उस एक समय कितनी VVIP मूवमेंट थीं , कितनी जगहों के एमरजेंसी फोन आये थे, कितने विवेचनाएँ लम्बित थी जिसको पूरा करने का आदेश था आदि क्या जानना जरूरी नहीं था .. शासन भी संज्ञान लेगा तो जानेगा कि बड़े अपराध के समय क्यों किसी जिले में कम पड़ जाता है पुलिस बल जब जानवर और कुत्ते के चलते निलम्बित स्टाफ अपने घरो में बैठे रहते हैं .

किसी चीज को काबू में रखना एक अलग बात होती है लेकिन किसी चीज का दमन करना एक अलग बात होती है . काबू वो चीज होती है जहाँ पर हर काम नियम कानून से हों और अपनी भी जिम्मेदारी तय हों , लेकिन दमन वो होता है जहाँ पर तानाशाही हो और किसी को प्रताड़ित करने की मंशा.. बेहद विपरीत हालत में सब कुछ झेल कर भी अन्याय , अपराध और आतंकवाद से लड़ रहे पुलिसकर्मियों की पीड़ा को न समझा गया तो ये एक अन्याय ही होगा और अन्याय किसी भी रूप में हो वो किसी के भी हित में नहीं होता .. न सहने वाले के और न ही करने वाले के ..

 

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज

मुख्यालय नोएडा 

मोबाइल – 9598805228 

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