कितनी मौतों के बाद सत्ता ये मानेगी कि दर्द में हैं खाकी वाले ? वो कौन सा सबूत है जो पुलिसकर्मी मर कर भी नही दे पा रहे ?

उनके कन्धो पर हर दिन नई – 2 जिम्मेदारी लादने से पहले ये तो देख लेते कि कन्धो में कितना बड़ा और गहरा घाव है .. शायद ही कोई ऐसी नौकरी हो जो अपने घर और परिवार को भुलाने के लिए की जाती हो.. घर और परिवार से दूर रख ही नही बल्कि त्याग कर अगर कोई नौकरी करवानी है तो बेहतर है कि फार्म भरते समय ये लिखा जाय कि सन्यासियों को ही वरीयता क्योकि दिन भर लूट , हत्या बलात्कार जैसी घटनाओं में देखने और उस से निबटने वाला शाम को अपने तनाव को दूर करने के लिए अपने परिवार का मुह देखना चाहेगा..

पुलिस में भर्ती होने से पहले शायद ही किसी को पता होता होगा कि उसको सन 1861 के कानून के हिसाब से कार्य करना होगा.. वो अपने को सन 2010 , 2018, 2019 बैच का भले कहता हो लेकिन उसको बाद में पता चल जाता है कि वो असल में 1861 बैच का है . ठीक वही हिन्दुस्तानी सिपाही जो अंग्रेजी कानून से बंधा होता है.. लेकिन तब तक वो अपनी जिम्मेदारियों से इतना बंध चुका होता है कि उन उसको निगल सकता है और न ही उसको उगल सकता है ..

उसकी भर्ती के समय वो पूरी दुनिया की जिम्मेदारी लेने के भाव से भर्ती होता है.. कहीं अपराध नहीं होने देगा , गुंडों को पकड़ेगा जैसे भाव ले कर जब वो सच का सामना करता है तो पता चलता है कि उसको तो खुद को बचाना भारी पड़ रहा, गुंडों को पकड़ना तो बहुत दूर की बात है .. प्रयागराज कचेहरी में सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह पर आधे दर्जन मुकदमो में लिप्त नबी अहमद हमला करता है तो वो बचाव में किये गये काम के बाद 5 साल जेल काटता है और परिवार भूखों मरने लगता है उसका..

लखनऊ में प्रशांत और संदीप उस इलाके की गश्त करते हैं जहाँ बंगलादेशी रेल लाइन के उस पार से आ कर चोरी जैसी घटनाओ को अंजाम देते रहते थे..  उन्होंने मेहनत कर कर इस चोरी को काबू भी कर लिया था.. ATM के पास एक वाहन खड़ा देख कर तलाशी की कोशिश होती है और उन्हें कुचलने की भी .. एक फायर के बाद दोनों सिपाही दोषी हो जाते हैं और एकमात्र गवाह उन दोनों पुलिस वालों के ऊपर अकेले हावी रहती है .. यहाँ तक कि उनकी नौकरी और जिन्दगी पर भी..

लखनऊ की घटना में एक गवाह ने जो कुछ कहा वही शत प्रतिशत सत्य मान कर बड़े बड़े अधिकारियो ने 2 सिपाहियों का जीवन अपनी कलम से लिख दिया लेकिन वर्तमान समय में इतने सिपाही और सब इंस्पेक्टर के साथ अन्य पुलिसकर्मी अपने प्राण दे कर भी ये साबित नहीं कर पाए कि वो दर्द में हैं और उनकी तकलीफ सुनी जाय.. आख़िरकार जो सरकार रात के अँधेरे में एक गवाह के संदेहास्पद बयान पर 2 पुलिस वालों की किस्मत लिख सकती है वही सरकार आत्महत्या कर चुके इतने पुलिस वालों से कौन सा सबूत चाह रही है ..?

वो कौन सा सबूत है जो पुलिसकर्मी मौत के बाद भी नहीं दे पा रहे हैं ? किसी नेता पर एक मिस फायर भी होने पर उनकी सुरक्षा दोगुनी कर दी जाती है लेकिन उसी देश में इतने पुलिस वाले फांसी लगा कर और खुद को गोली मार कर ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वो विपत्ति में हैं, पर उनकी आवाज उनके उस कमरे से बाहर ही नहीं निकल पा रही जिसमे वो आत्महत्या कर रहे , लखनऊ और दिल्ली तक पहुचना तो बहुत दूर की बात है.. दम तो खुद तोड़ रहे लेकिन उनकी आवाज का दम साजिश से तोडा जा रहा .

ये वो देश है जहाँ बड़े बड़े दुर्दांत आतंकी और अपराधियों की भी मौत से पहले अंतिम इच्छा पूरी की जाती है लेकिन पुलिस वालों की नहीं .. एक पुलिस वाला अच्छा ख़ासा फिजिकल टेस्ट पास कर के पुलिस में भर्ती होता है .. वो शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है लेकिन फिर कौन है जो उसको मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है.. मृत्यु अंतिम विकल्प कही जाती है , तो क्या उस मरने वाले के पास अपने अधिकारी से ले कर पूरी दुनिया में कोई ऐसा सहारा नहीं रह जाता और वो अपनी व्यथा ऊपर वाले से बताने निकल पड़ता है ..

अब तक आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह और पुलिस के अन्दर की सबसे बड़ी मांग बार्डर स्कीम है लेकिन उस पर शायद कोई बात करने को तैयार नहीं है .. यहाँ पर सबसे ज्यादा हैरत की बात ये है कि एक पुलिस वाले को क्राइम मीटिंग में ये जवाब बार बार देना पड़ता है कि उसके क्षेत्र में कितनी मौतें अपराधियों के अपराध के चलते हुई हैं लेकिन उस से ऊपर वाले अधिकारी से आज तक ये जवाब नही माँगा गया है कि तुम्हारे जिले में कितने पुलिस वालों ने आत्महत्या की और क्यों ?

मानवाधिकार आयोग का भी दोमुहा चेहरा यहाँ देखने को मिलता है जो अपराधी और आतंकी की मौत पर आधी रात जाग जाता है लेकिन पुलिस वालों की इतनी मौतों के बाद भी अब तक एक नोटिस भी ये पूछने के लिए नहीं गई कि समस्या क्या है . थाने में अपराधी मरना इस देश के लिए राष्ट्रीय आपदा है लेकिन थाने में थानेदार का मरना यहाँ की शायद संवैधानिक व्यवस्था का एक अंग.. आने वाली पीढ़ी पुलिस में क्यों जायेगी इसका जवाब सत्ता के सत्ताधीशो को जरूर देना पड़ेगा … आज नहीं तो कल ..

 

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

मुख्यालय -नोएडा 

सम्पर्क नं- 09598805228 

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