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हाथों को बाँध व पैरों को जकड़ कर भेज दिया जाता है कई जिला दूर और कहा जाता है- “हर तरह का अपराध रोको”.. “वर्दी वाला न मरे… पर वो क्या करे ?”

अगर आप सडक से जा रहे हैं और कोई बच्चा रोता दिखाई दे तो यकीनन आप सवाल करेंगे कि क्या हुआ उसको और अगर उसकी समस्या आप के स्तर की होगी तो जरूर हल करेंगे .. यही हाल बस, ट्रेन में आप के बगल बैठे व्यक्ति के साथ होगी, यदि वो रो रहा होगा या बेहद उदास बैठा होगा तो आप जरूर सवाल करेंगे कि क्या हुआ उसको.. लेकिन एक ऐसा विभाग है भारत में जिसमे आये दिन आत्महत्या और इस्तीफे भी किसी को पूछना तो दूर सोचने पर भी नही अग्रसर कर पा रहे हैं कि समस्या क्या है ?

ये वो विभाग है जिसका नाम “पुलिस” है.. वर्दी वाला भी कहा जाता है उसको फिल्मो से चर्चित हुए नाम से.. ये वो नौकरी है जो बचपन में किसी को सबसे ज्यादा आकर्षित करती है. गाँव में जब कोई वर्दी वाला आता था तो पूरा गाँव जमा हो कर ख़ामोशी से उसके एक एक शब्द सुनता था और उसी में बाल वर्ग यानि बच्चे ये सोचते थे कि वो भी बड़े हो कर पुलिस में भर्ती होंगे.. लेकिन जब उसमे से कईयों की इच्छा पूरी हो जाती है तो वो एक बार फिर से अपनी पुरानी जिन्दगी में जाना चाहते हैं ..

कुछ नहीं जा पाते हैं तो नई जिन्दगी की तलाश में निकल जाते है .. नई जिन्दगी की तलाश अर्थात आत्महत्या. यही आत्महत्या है जो इस समय पुलिस विभाग में आये दिन कहीं न कहीं सुनाई और दिखाई दे रही है.. दर्द और घुटन कुछ इस तरह से अंदर ही अंदर है कि एक स्टाफ ये नहीं जान पाता है कि उसके साथ दिन में खाना खाया स्टाफ रात में और रात में उसके साथ गश्त किया स्टाफ सुबह तक जिन्दा भी रहेगा या नहीं.. कभी बलिया तो कभी लखनऊ , कभी सहारनपुर तो कभी मुज़फ्फरनगर..

सिर्फ जिले ही बदल रहे हैं लेकिन हालात समान हैं.. जिस घर वाले अपने बच्चे की पुलिस में भर्ती की ख़ुशी में पूरे गाँव को प्रसाद खिलाये रहते हैं उसी में से कई अपने उसी औलाद की मौत का तेरहवी का भोज कराते मिले हैं.. सहारनपुर में आत्महत्या करने वाले सब इंस्पेक्टर की पत्नी तक को नही पता था कि वो अगले दिन विधवा होने जा रही है.. पैर में एक चोट भी लग जाती है तो एक इन्सान 4 लोगों को दिखाता है पर पुलिस वाला आत्महत्या से पहले अपने घर वालों को भी नहीं बताता.. सोचने लायक है कि अंदर ही अंदर वो कौन सा दर्द पलता होगा ..

अगर इसके मूल कारणों पर गौर किया जाय तो तमाम ऐसे तथ्य सामने आयेंगे जो समाज के कई वर्गो को दोषी ठहराएंगे.. यद्दपि खुद का दोष लेना ये तमाम लोगों के खुद के स्वभाव में नहीं है .. हालात तो यहाँ तक हैं कि अपने खुद की गहरी नींद में अपने घर में रखी बाल्टी भी चोरी होने का दोष लोग अपने चौकी और थाने को देने लगते हैं .. कई बार तो ऐसे भी हालात देखने को मिले हैं जब पति पत्नी या भाई – भाई के झगड़े में हुई किसी अनहोनी का जिम्मेदार पुलिस को ठहरा दिया गया है..

ये कहना गलत नहीं होगा कि अपनी नाकामी या अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उत्तर भारत में एक विभाग दे दिया गया है जिसका नाम पुलिस है.. एक और मिथ्या तमाम लोगों के बीच में घर कर गई है कि वर्दी के अंदर इन्सान नहीं बल्कि कोई रोबोट है जिसको पीड़ा या संवेदना प्रभावित नहीं करती है.. इसी मानसिकता के चलते तमाम नए नियम और प्रतिबन्ध सिर्फ और सिर्फ पुलिस पर ही डाले जाते हैं और उसके दुष्प्रभाव आज के समय श्रृंखलाबद्ध आत्महत्या के रूप में देखने को मिल रहे हैं .

इस मामले में कुछ कथित पत्रकारों के व्यवहार भी सराहना के योग्य नहीं है.. खुद को खुद से पत्रकार कहने वाले कई लोग ऐसे भी हैं जिनके जीवन भर का सोशल मीडिया प्रोफाइल चेक किया जाय तो एक भी बार उनके प्रोफाइल पर किसी पुलिस वाले कि प्रसंशा नहीं दिखेगी.. अगर वो अपने पैसे से भी सब्जी ले जा रहा होगा तो भी उनके सोशल मीडिया पर पोस्ट दिखेगी कि दबंग पुलिस वाला फ्री में लेता है गरीबो से सब्जी.. और बस इतना ही पोस्ट काफी होती है उसके खिलाफ एक जांच करवाने के लिए और जांच क्या होती है ये एक पुलिस वाला बेहतर ढंग से बतायेगा..

उदहारण के लिए कुछ ऐसे सरकारी अस्पताल भी हैं जिनको अगर ठीक से देखा जाय तो कई मरीज इस हालत में पड़े दिखाई देंगे जिनको उस हालत में नहीं होना चाहिए होता है.. कुछ के नीचे बेडशीट नहीं, कुछ के ऊपर कम्बल नहीं . लेकिन यहाँ न जाने क्यों किसी को मानवाधिकार का हनन नहीं दिखाई देता, यहाँ किसी को भी अभद्रता नहीं दिखाई देती और इस तरफ कैमरे उतना नहीं घूमते जितना कि थाने और चौकियो की तरफ.. ऐसे लगता है कि जैसे दुनिया की सारी बुराईयाँ वहीँ है. यहाँ ये भी ध्यान रखने योग्य है कि अस्पताल के स्टाफ से बहुत कम वेतन एक पुलिस वाले का होता है.. और सरकार से मिलने वाली सुविधाएँ भी उनसे बेहद कम..

अस्पताल का उदहारण सिर्फ एक बानगी भर है .. अध्यापक, जलकल विभाग , नलकूप विभाग , रेलवे विभाग , PWD , बैंक या तमाम अन्य विभाग.. इनके वेतन से कभी पुलिस वाले का वेतन मिला कर देखा जा सकता है , निश्चित तौर पर कईयों की गलतफहमी दूर हो जायेगी.. इसके बाद भी घूसखोर , ठुल्ला , मामू और न जाने क्या क्या नाम ? एक इंसान अपने घर से बाहर 2 चीजो की तलाश में निकलता है .. या तो पैसा और या तो सम्मान.. लेकिन पुलिस वाला इन दोनों में क्या पाता है ये कभी उसी से पूछियेगा ..

अगर अमेरिका , रूस , इजरायल , जर्मनी जैसे देशो के अखबारों को पढ़ा जाय तो उनके मुख्य समाचार कभी भी अपने पुलिस बल की अनावश्यक निंदा से भरे नहीं होते.. यहाँ तक कि अफगानिस्तान जैसे आतंक प्रभावित देशो में भी अपने ही पुलिस बल को मीडिया निशाना नहीं बनाती है .. दक्षिण भारत में भी पुलिस के खिलाफ लिख कर ही पत्रकार बनने का चलन कम है . मात्र एक इलाका विशेष में ही इस प्रकार की मानसिकता खूब फली फूली है जिन्होंने अपने ही रक्षको को दुश्मन के रुप में प्रस्तुत कर रखा है..

खैर वापस आते हैं आत्महत्या के मुद्दे पर.. जिसको न पैसा मिल रहा हो और न सम्मान उसके पास जीवन के सीमित विकल्प रह जाते हैं . और वो विकल्प होता है उसका परिवार जिसको देख कर उसका मन हल्का हो जाता है.. अपने घर के मात्र कुछ सौ मीटर दूर मात्र 8 घंटे पढाने जाने वाले व एक अच्छा वेतन पाने वाले अध्यापक से अगर पूछा जाय कि क्या उसके पास समय है तो भी उसमे से तमाम ये कहते हैं  कि वो बहुत व्यस्त हैं और घर को समय नहीं दे पा रहा है..

अब इसी आधार पर एक पुलिस वाले की कल्पना कीजिये.. उसके वेतन भी कम हैं , भत्ते निकलवाने में वर्षो लग जाते हैं , दिन भर लूट हत्या बलात्कार आतंकवाद जैसी घटनाओं से पाला पड़ता है, छुट्टी मांगना एक गुनाह के जैसे है वहां क्योकि पुलिस बल कम है ऐसा बताया जाता है , पर पुलिस बल कम है का यही ध्यान उसकी बेहद छोटी से छोटी गलती पर उसको निलम्बित करते समय नहीं रखा जाता है.. और अगर भूल से छुट्टी मिल भी गई तो बॉर्डर स्कीम का पालन अलग से ..

प्रतापगढ़ में तैनात थानेदार जो सहारनपुर से अपने थाने प्रतापगढ़ जा रहे थे , उन्हें मात्र 2 दिन की छुट्टी मिली थी.. उसी में उन्हें आना जाना मिला कर १२०० किलोमीटर चलना भी था और अपने तमाम काम भी निबटाने थे.. आख़िरकार वो दुनिया को ही छोड़ गये.. 2 दिन की छुट्टी पाने के लिए 2 साल से दिया गया प्रार्थना पत्र जब स्वीकृति भी होता है तो एक दिन उसको आने और 1 दिन उसको जाने में लग जाता है.. वो अपने घर वालों का व उसके घर वाले उसका मात्र मुह भर देख पाते हैं ..

तनाव का निदान किसी के घर वालों से ही हो सकता है ऐसा माना जाता है .. अगर किसी अन्य से अपनी कोई व्यक्तिगत समस्या बताने लगे तो शायद वो उसकी वीडियो या आडियो वायरल कर के उसके तनाव को और बढा दे..  ऐसे में तनावग्रस्त एक पुलिस वाला अपना तनाव कम करने किस के पास जाए ? उन बड़े अधिकारियो के पास जिनके आगे खड़े होने से उसके पैर कांपते हैं ? और क्या वो उनकी समस्या को सुनेंगे , या उनके पास इतना समय है कि वो एक एक सिपाही या सब इंस्पेक्टर की समस्या सुने ?

कुछ का कहना है कि वर्दी पहनी है तो कहीं भी जाने के लिए तैयार रहना चाहिए .. उसके लिए सेना का उदहारण दिया जाता है जिस से पुलिस वालों को शिक्षा लेने की सलाह दी जाती है .. निश्चित तौर पर ऐसे लोगों को एक बार सेना के सैनिक की सरकार द्वारा प्रदत्त वेतन , सुविधा , रहन सहन देख कर वापस एक थाने या चौकी में बने पुलिस वाले के लिए मिली सुविधाएँ देख कर आनी चाहिए और उसके बाद उसी पुलिस वाले के वेतन की सैलरी स्लिप भी देखनी चाहिए.

वैसे ऐसी सलाह देने वाले ठीक वैसे ही दर्शक होते हैं जो टी वी में क्रिकेट मैच देख कर चिल्लाते हैं कि मैदान में खेल रहे खिलाडियों में से उस बाल पर बैटमैन को उठा कर मारना था या बालर वो वो गेंद यार्कर फेंकनी थी .. मतलब कि सच्चाई और जमीनी हकीकत से कोसों दूर.. सिर्फ और सिर्फ एक दिन गाँव में घुस कर छापेमारी जैसे बड़े कामो से तो दूर, मात्र एक ट्रैफिक पुलिस वाले के साथ चिलचिलाती धूप में सैकड़ो वाहनों के धुएं में मात्र 1 घंटे भी खड़े होने में उन्हें पुलिस के कार्य का एहसास अपने आप हो जाएगा ..

ऐसी सलाह देने वाले लोगों को ध्यान ये भी रखना चाहिए एक पुलिस वाले का ड्यूटी समय 24 घंटे का होता है यद्दपि सेना सर्वोच्च है इसको खुद पुलिस वाले भी मानते हैं .. लेकिन अगर आप पुलिस कैंटीन , पुलिस अस्पताल , पुलिस वालों के स्कूल आदि की बात करेंगे तो वो सब जानने को मिल जाएगा जो आपके लिए नया होगा.. कई ऐसे पुलिस वाले मिलेंगे जो जनता के लिए अपराधियों से मुठभेड़ कर के अपने वेतन से इलाज करवा कर कर्जदार हो गये हैं और कुछ इस लोक को छोड़ कर चले गये हैं .

वो किसी अपराधी को भी गोली मारे तो उसका मुकदमा अपनी जेब से जीवन भर लड़े. मेरठ हाशिमपुरा PAC जवानो का मामला, मेरठ मुठभेड़ , पीलीभीत मामला इसके उदहारण हैं.. वो आत्मरक्षा में गोली चलाए तो जेल काटे सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह की तरह.. और अगर कुछ न करे तो बिजनौर के सब इंस्पेक्टर सहजोर सिंह की तरह कब किस ने और क्यों मारा ये पता भी न चले और लाश कहीं सुनसान में मिले.. विचार कीजिए कि एक व्यक्ति के जीवन के कितने विकल्प बचते होंगे ऐसे हालातो में..

किसी को डांट दिया तो सस्पेंड , किसी को मार दिया तो लाइन हाजिर , चालान काट दिया तो पिटाई लेकिन इसके बाद भी अपराध पर दमन सबको चाहिए.. मतलब हाथ और पैर बाँध दिए जाएँ और कहा जाए कि जाओ दिन भर दौड़ो.. इसके बाद उसको घर से दूर रख कर ऐसे बैरको में रखा जाय जहाँ उसकी पत्नी और माँ साथ नही रह सकती है . अगर गिनती पर आ जाए तो कितनी चौकियां ऐसी गिनी जा सकती हैं जहाँ एक परिवार रहने लायक है ? और कितने थाने ऐसे हैं जहाँ निचले स्तर के कहे जाने वाले स्टाफ अपने घर के साथ रह सकें..

दिन भर प्रताड़ना और उसके बाद सैकड़ो किलीमीटर घर से दूर अकेले बैरक में .. ऐसे हालात में एक पुलिस वाले के मन में अकेले में क्या विचार आते होंगे ये आराम से समझा जा सकता है लेकिन इसको अगर सच में समझा गया होता तो इतनी आत्महत्या न होती.. एक जेल के अन्दर एक कैदी की मौत पर पूरा जेल स्टाफ सस्पेंड हो जाया करता है . थाने में एक अपराधी की मौत पर थाने के एक एक स्टाफ पर कार्यवाही होती है .. लेकिन उन्ही चौकी थानों में खुद पुलिस वालों की मौत पर सिर्फ और सिर्फ ख़ामोशी .

मृत्यु हमेशा अंतिम विकल्प माना गया है .. कोई कितना भी लापरवाह , आलसी , बहानेबाज या कुछ भी अन्य क्यों न हो पर मौत को गले वही लगाता है जो हर किसी जगह से निराश हो गया होता है.. यहाँ तक कि भगवान से भी.. एक अच्छा फिजिकल टेस्ट पास कर के पुलिस में भर्ती होने वाले सभी स्टाफ शारीरिक रूप से निश्चित तौर पर मजबूत होते हैं इसमें कोई शक नहीं होता .. फिर वो कौन है जो उन्हें मानसिक रूप से तोड़ रहा है जब इसका जवाब खोजा जाएगा तो पुलिस पर बेवजह ऊँगली उठाने वालों की तरफ तमाम उँगलियाँ खुद ही उठ जायेगी..

सरकार और मानवाधिकार से यहाँ अपेक्षा जरूर है कि जिस प्रकार से अपराधी की मौत पर तत्काल कमेटी बना कर गहन जांच होती है उसी प्रकार से इतने पुलिस वालों की मौत की भी गहराई से जांच करवाई जाए. मेरे व्यक्तिगत आंकलन के अनुसार सबसे बड़ी वजह बॉर्डर स्कीम ही निकलेगी .. इसके बाद वेतन विसंगति और कुछ लोगो को उनके ऊपर मिले मौखिक कार्यवाही के अधिकार.. अपने ही सुरक्षा बलों का मनोबल गिरा कर आज तक कही भी कोई भी समाज सुरक्षित नहीं रहा है, संसार का कोना कोना इसका गवाह है..

क्या शासन के लिए ये सम्भव नहीं है कि जिस प्रकार से अभी हाल में ही कई निष्क्रिय पुलिस वालों की लिस्ट बनवा कर उन्हें जबरन रिटायर किया गया था, उसी प्रकार से उनकी भी लिस्ट बने जो इन पुलिसकर्मियों की मौतों के जिम्मेदार हैं ? लापरवाही अगर नौकरी जाने कारण बन सकती है तो किसी को मरने पर मजबूर कर देना कार्यवाही की वजह क्यों नहीं ? क्या उनकी लिस्ट नही बननी चाहिए जिनका खौफ अपराधियों के बजाय अपने ही विभाग में है ?

या फिर ऐसे ही देखा जाता रहेगा तमाशा.. गाँव भर को पुलिस में भर्ती होने का प्रसाद बाँट कर आये एक पुलिसकर्मी के घर वाले उसका तेरहवी भोज करवाते रहेंगे और समाज की रक्षा करने के लिए वर्दी पहनने वाले कफन में लपेटे जाते रहेंगे.. अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए निचले स्टाफ की चीख सुनने की शौक रखने वालों को इन मौतों के लिए जवाबदेह कब बनाया जाएगा ? सवाल शासन से है कि इस समस्या की जड पर चोट किया जायेगा या फिर 2 – 4 पत्ते तोड़ कर ‘सब सही हो गया’ की घोषणा कर दी जायेगी ..

परमात्मा जीवन से हार गये सभी पुलिसकर्मियों की आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को ये अथाह और अपार कष्ट सहने की शक्ति .. साथ में इन मौतों के जिम्मेदार कुछ गिने चुने लोगों को सजा और सद्बुद्धि भी ..

रिपोर्ट- 

राहुल पाण्डेय 

सुदर्शन न्यूज – नोएडा 

मोबाइल नम्बर – 9598805228

 

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