करणी सेना के प्रदर्शनकारियों को पहले दिन ही “गुंडा” घोषित करने वालों की आज तक हिम्मत नहीं हुई आतंकियों के जनाज़े में शामिल होने वालों पर एक भी शब्द बोलने की


वही देश है , वही लोग हैं , वही स्थान है लेकिन सोच अलग अलग है ..गांव में जिंदा मक्खी निगलने वाली कहावत जिसने भी सुनी होगी उन्होंने शहर में इसको चरितार्थ होते देखा है पद्मावत के इस मुद्दे पर जिसने न सिर्फ बॉलीवुड की सोच को समान रखा अपितु खुद को धर्मनिरपेक्षता का ठेकेदार बताते तमाम मीडिया , लोग , दल , समूह, संगठन को भी बेनकाब किया और धर्म निरपेक्षता के नाम पर केवल और केवल हिन्दू समाज को कटघरे में देखा  .

मीडिया में पहले दिन से ही करणी सेना के प्रदर्शनकारियों को गुंडा जैसे बेहद ही अशोभनीय शब्दों से सम्बोधित किया गया , उन्होंने इसको ऐसे दिखाया जैसे देश की हर समस्या के पीछे केवल करणी सेना का हाथ हो लेकिन मीडिया के उस वर्ग ने कहीं भी कभी भी 1 भी शब्द दुर्दान्त आतंकियों के जनाज़े में शामिल होने वाले , उनके लिए पूरे जोश में सम्मान दिखाने वाले , भारत विरोधी नारे लगाने वाले , खुलेआम हथियार लहराने वालों के विरोध में नहीं बोला ..

क्या वजह हो सकती है इसकी ? भय, खौफ, लालच या कुछ और ? फ़िल्म की रिलीज से पहले जब हिन्दू समाज का अंग करणी सेना को संशय था भारत के इतिहास से छेड़छाड़ का , चिंता थी हिन्दू समाज की महिला गौरव रानी पद्मिनी के स्वाभिमान की रक्षा का तब विरोध प्रदर्शन शुरू हुए ..इसमे भंसाली की शुरुआती अकड़ मुख्य वजह बनी थी ..यद्द्पि सुदर्शन परिवार किसी भी हिंसा को उचित नही ठहराता लेकिन आंदोलन में साजिशन घुसे  कुछ असमाजिक तत्वों को छोड़ कर हर आंदोलनकारी के मन मे केवल नारी के सम्मान पर बट्टा व इतिहास के अपमान की भावना उस से आंदोलन करवा रही थी ,, उनकी मंशा में कहीं भी राष्ट्र के प्रति घृणा आदि का भाव नही था।।

उन्हें पुलिस गिरफ्तार करती तो कुछ एक को छोड़ कर  वो बिना प्रतिरोध के पुलिस वालों के साथ थाने चले जाते थे लेकिन वहीं जब भारतीय सेना के हाथों मारे गए एक इनामी आतंकी के जनाज़े में हजारों की भीड़ भारत विरोधी , पाकिस्तान समर्थक नारे लगाती है तब न कोई ब्रेकिंग न्यूज़ बनती है और न ही कोई गुंडा जैसे शब्दों का प्रयोग होता है ..उनकी घिग्घी क्यों बंध जाती है ये समझ के बाहर की बात है ..

समाज को अपनी सोच से इस मानसिकता का प्रतिकार करना होगा, खुद को बहुत बड़े पत्रकार बता कर सवालों की झड़ी लगाने वालों से जनता को सवाल करना होगा ..हमेशा एकतरफा रिपोर्ट चलाने वालों को उन्ही एक एक रिपोर्ट पर जब उत्तर देने होंगे तो उन्हें अपने किये गए एकतरफा व्यवहार का खुद से एहसास होगा ..


 


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