Breaking News:

23 फरवरी- बलिदान हुई थी आज 8 वर्ष की वो मासूम वैदेही जिसके दूध के दांत तोड़ कर, खौलते पानी मे उबाला गया पर उसने नहीं कबूल किया इस्लाम

ये सत्यघटना है उस मासूम बच्ची की जिसने वो सब कुछ अपने ऊपर झेला जो किसी ने किताबो में पढ़ा होगा या फिल्मों में ही देखा होगा . 1 नन्ही सी बच्ची जिसने अपने धर्म से प्रेम में खुद को तब स्वाहा कर दिया था जब न सिर्फ उसके परिवार के तमाम लोग घुटने टेक चुके थे बल्कि उसके पूरे इलाके का ही नाम बदल कर इस्लामिक रूप में आ चुका था..अफसोस की बात ये है कि दक्षिण भारत की इस वीरांगना के बारे में नकली कलमकारों ने एक शब्द भी सिर्फ इसलिए नही लिखे क्योंकि इस से उनके तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत प्रभावित होते.. भले ही बलिदान देने वाली एक मासूम बच्ची हो या कोई अन्य..

23 फरवरी 1981 का दिन था वह, जब तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में डाॅक्टर नसरुद्दीन कमाल अपने साथियों के साथ एक दलित परिवार को बंधक बनाए हुए थे। घर के सभी लोगों ने इस्लाम कबूल लिया था, घर के लोग ही क्यों लगभग एक हजार दलित धर्मांतरण करके जबरन मतांतरित किये जा चुके थे। इसलिए मीनाक्षीपुरम का नाम बदलकर रहमतनगर रख दिया गया था। लेकिन तथाकथित सेकुलर समाज व बुद्धिजीवी वर्ग खामोश था.. यह दलित गिने के घर की कहानी है। उसकी 8 वर्ष की पोत्री थी वैदेही…वह किसी भी कीमत पर मुस्लिम बनने को तैयार नहीं हुई,

‘‘मै मर जाऊंगी लेकिन अपना धर्म नही त्याग सकती’’ उसने अपने दादा से कहा था, ‘‘बाबा आपने ही तो मुझे गायत्री मंत्र सिखाया था ना…आपने ही तो बताया था कि यह परमेश्वर की वाणी वेदों का सबसे सुंदर मंत्र है, इससे सब मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं, फिर मैं उन लोगों का मज़हब कैसे मान सकती हूं, जिन्होंने मेरे सहपाठियों का कत्ल कर दिया, क्योंकि वे भी किसी और मज़हब में नही जाना चाहते थे. हम ऐसे मजहब को कैसे अपना सकते हैं?, जिसे न अपनाने पर कत्ल का भय हो, मुझे तो गायत्री मंत्र प्रिय है जो मुझे निर्भय बनाता है।’’

”बेटी जीवन रहेगा तो ही धर्म रहेगा ना…जिद छोड दे और कबूल कर ले जो ये कह रहे हैं .. उसके मतांतरित हो चुके बाबा ने अंतिम प्रयास किया था। पर वैदेही ने बाबा से सवाल किया था, ”बाबा आपने एक दिन बताया था कि गुरु गोबिंद सिंह के दो बच्चे दीवार में जिंदा चिनवा दिए थे, लेकिन उन्होंने इस्लाम नहीं कबूला था, क्या मैं उन सिख भाइयो की छोटी बहन नहीं? जब वे धर्म से नहीं डिगे तो मैं कैसे डिग सकती हूं?”

‘‘ये दो टके की लड़की, हमारी बात मानने से इंकार कर रही.. डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल के साथ खड़े मौलाना नुरूद्दीन खान ने उसके बाल पकड़ते हुए चूल्हे पर गर्म हो रहे पानी के टब में उसका मुंह डूबा दिया था। पानी भभक रहा था, इतना गर्म था कि बनती भाप धुंए के समान नजर आ रही थी। बालिका के चेहरे की चमड़ी निकल गई थी एक बार ही डुबोते, चीख पड़ी थी.. ‘ कोई तुझे बचाने नही आएगा, अभी भी मौका है, छोड़ दे हिन्दू धर्म लड़की, नहीं तो इस बार तुझे इस खोलते पानी में डुबा दिया जाएगा।’’ मौलवी ने कहा था, फिर उसके दादा ने भी कहा, ‘‘कबूल कर ले बेटी , हम सब भी कबूल कर चुके हैं, तू जिंदा रहेगी तो तेरे सहारे मेरा भी बुढ़ापा भी कट जाएगा।’’

मौलवी ने चूल्हे के पास से मिर्च पाउडर उठाकर उसकी आंखों में भरते हुए और चेहरे पर मलते हुए कहा, ‘‘दूध के दांत टूटे नहीं, और तू बड़ी धार्मिक बनी है .. एक बार फिर तड़प उठी थी वह मासूम, पर इस बार भी यही कह रही थी, ‘‘नहीं मैं म कबूल करूंगी।’’ अपना धर्म नहीं त्यागूंगी.. मौलवी को भी क्रोध आ गया था, इस बार तो उसका सिर जलते हुए चूल्हें में ही दे डाला था। परंतु प्राण त्यागते हुए भी उस बालिका के मुख से यही निकल रहा था, ‘‘मैं तेरी बात नहीं कबूल करूंगी।’’

अंतिम बार डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल की देखा था, ‘‘ अब उसमें कुछ नहीं रहा था, वह तो मिट्टी बन चुकी थी, डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल भी तो धर्मांतरण करने वाले लोगों की मंडली में ही शामिल था, लेकिन उस बालिका ने पता नहीं उसमें क्या देखा कि विधर्मी से ही धर्म बचाने की गुहार लगा बैठी थी, उस असहाय बालिका का धर्म के प्रति दृढ़ निश्चय देखकर हृदय चीत्कार कर उठा था ।’’

वह घर की ओर भाग लिया था और डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल पूरे दस दिन अपने घर से नहीं निकला, कुछ खाया पीया नहीं, बस उस बालिका का ध्यान बराबर करता और आंखों में आंसू भर आते उसके…गायत्री मंत्र का अर्थ जानने के लिए उसने एक किताब खरीदी, गलती से वह नूरे हकीकत यानी सत्यार्थ प्रकाश थी। उसने उसका गहराई से अध्ययन किया और 11 नवंबर 1981 को एक जनसमूह के सामने विश्व हिन्दू परिषद और आर्य समाज के तत्वावधान में अपने पूरे परिवार के साथ वैदिक धर्म अंगीकार कर लिया। डाॅक्टर नसरूद्दीन ने अब अपना नाम रखा था आचार्य मित्रजीवन, पत्नी का नाम बेगम नुसरत जहां से श्रीमती श्रद्धादेवी और तीन पुत्रियों शमीम, शबनम और शीरीन का नाम क्रमशः आम्रपाली, अर्चना और अपराजिता रखा गया।

15 नवंबर 1981 को आर्य समाज सांताक्रुज, मुंबई में उनका जोरदार स्वागत हुआ, जहां उन्होंने केवल एक ही बात कही, ‘‘मैं वैदेही को तो वापस नहीं ला सकता, लेकिन हिन्दू समाज से मेरी विनती है, मेरी बेटियों को वह अपनाए, वे हिन्दू परिवारों की बहू बनेंगी तो समझूंगा कि उस पाप का प्रायश्चित कर लिया, जो मेरी आंखों के सामने हुआ। हालांकि वह मैंने नहीं किया, लेकिन मैं भी दोषी था, क्योंकि मेरी आंखों के सामने एक मासूम बालिका की निर्मम हत्या कर दी गई।’’ आचार्य मित्रजीवन ने अपना शेष जीवन वेदों के प्रचार-प्रसार में लगा दिया, इसलिए उन्हें आज बहुत से लोग जानते हैं, उनकी पुस्तकें पढ़ते हैं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वे जन्म से मुस्लिम थे और यह तो कोई जानता ही नहीं कि वैदेही कौन थी?

वेद वृक्ष की छाया तले, पुस्तक का एक अंश
लेखिका फरहाना ताज
————
स्रोत : वैदेही के संदर्भ के लिए देखें 24 फरवरी 1981 इंडियन एक्सप्रेस

वैदिक गर्जना, मासिक पत्रिका 1982

आज 23 फरवरी को उस नन्ही सी बच्ची के बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार उनको बारंबार प्रणाम व नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है और साथ ही सावधान करता है मज़हबी कट्टरपंथियों के संक्रमण से संक्रमित उन तमाम लोगों को जो असल धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को त्याग कर सिर्फ एकतरफा सेकुलरिज्म निभा रहे हैं. उनसे आशा है कि वो मीठी मुस्कान के पीछे छिपे जहरीली मानसिकता को पहचान कर के अपने व अपने परिवार के साथ साथ अपने क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे ..

Share This Post