29 जून- साथी बलिदान हो चुके थे लेकिन जूनून था दुश्मनों की लाश बिछाने का.. उन्हें मार कर आज अमर हो गये कारगिल के वीर कैप्टन “विजयंत थापर”

इन्हे न ही किसी प्रकार की आज़ादी या अखंडता की ठेकेदारी लेनी थी और न ही इन्हे कभी उसे बता कर वोट आदि बटोरना था . ये जन्म ही लिए थे भारत माता की रक्षा करने के लिए और आख़िरकार उसी पावन कार्य में इन्होने ले ली अंतिम सांस .. आज ही अमरता को प्राप्त हुए थे कारगिल के महानायको में से एक कैप्टन विजयंत थापर जिनकी गौरव गाथा आज भी गूँज रही है हिमालय की चोटियों से .. भारत की सेना ने इस वीर चक्र प्राप्त जांबाज़ ने कारगिल की चोटी पर विजयी ध्वज फहरा दिया था और दुश्मन को उनकी अवैध मांद से निकाल कर मारा जिसके बाद ये खुद भी अमर हो गए थे .

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26 दिसम्बर 1976 पंजाब की ज़मीं को एक और वीर पैदा करने का सौभाग्य हुआ। कर्नल वि.एन. थापर को बेटा हुआ था। कर्नल वि.एन. थापर तब पठानकोट में ही पोस्टेड थे। पिता ने इस बच्चे का नाम रखा ‘विजयंत’। आर्मी वाले का बच्चा था कोई आम बात नहीं, नाम भी मिला तो उस वक़्त की एक आर्मी बैटल टैंक के नाम पर। यही विजयंत कर्नल विजयंत बना। रहने वाले तो नॉएडा के थे लेकिन पोस्टिंग के दौरान कई जगहों पर तबादला होता रहता। साथ में विजयंत को भी जगहें बदलनी पड़ती।

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तारीख 12 दिसम्बर 1998, 2-राजपूताना राइफ़ल्स को अपना अगला हीरो मिल गया था, जिसने ग्वालियर में अपनी पलटन को पहली सलामी दी और आखिरी सालामी कारगिल में पूरे देश से ली। तारीख 25 मई 1999, पूरी पलटन को द्रास पहुंचने का आदेश मिला। पलटन हाज़िर थी। पलटन भी वो जिसने सिर्फ़ इतिहास लिखना सीखा है – राजपुताना राइफल्स। ऑपरेशन था टाइगर हिल, तोलोलिंग में घुसे दुश्मनों को निकाल फेंकना। पलटन निकली और अपना काम कर दिया। तोलोलिंग फिर से सिर उठाये चीख रहा था, कोई है इस दुनिया में जो राजपुताना की इस टोली का सामना कर सके। और यहां से राजपुताना के इस हीरो ‘कैप्टन विजयंत थापर’ का कारगिल का सिलसिला शुरु हो चुका था।

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इसके बाद उन्हें नोल एंड लोन हिल पर ‘थ्री पिम्पल्स’ से पाकिस्तानियों को खदेड़ने की जिम्मेदारी मिली. चांदनी रात में पूरी तरह से दुश्मन की फायरिंग रेंज में होने के बावजूद विजयंत आगे बढ़े. जब विजयंत ‘थ्री पिम्पल्स’ पर चढ़ाई करने जा रहे थे, तब उन्होंने अपने परिवार के नाम एक ख़त छोड़ा. ये उनके वापस ना आने की सूरत में उनके परिवार को दिया जाना था. जज़बातों के उमड़ते सैलाब के बावजूद उन्होंने बड़े साफ़ और सीधे लफ़्ज़ों में अपनी बात कही. उन्होंने लिखा कि अनाथालय में कुछ पैसे दान करें .आगे लिखा था कि – ‘मेरा यह खत जब तक आपके पास पहुंचेगा, मैं आप सबको आसमान से देख रहा होऊंगा. अगर मैंने फिर मनुष्य का जन्म लिया तो एक बार फिर सेना में भर्ती होकर देश के लिए लड़ना चाहूंगा. नई पीढ़ी को इस कुर्बानी के बारे में बताना चाहिए. पापा, मां, आपको गर्व होना चाहिए.’

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29 जून 1999 को 2 राजपूताना राइफल्स की टुकड़ी का नेतृत्व करते 22 साल के कैप्टन विजयंत थापर दुश्मनों पर टूट पड़े और टोलोलिंक की चोटी पर भारत का तिरंगा लहरा दिया. ‘तोलोलिंग पर 12 जून 1999 को फतेह करने के बाद शहीद कैप्टन विजयंत थापर ने घर पर को फोन किया था. उसने बताया था कि हमारी बटालियन ने तोलोलिंग पर जीत हासिल कर ली है. अब पंद्रह हजार फीट ऊंची और माइनस 15 डिग्री तापमान में नॉल (तोलोलिंग और टाइगर हिल के बीच की पहाड़ी) पर विजय हासिल करना जाना है. मम्मी अब हमारी बीस दिन तक बात नहीं हो पाएगी, मम्मी आप इंतजार मत करना ..

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तोलोलिंग जीतने के बाद, विजयंत को ब्लैक रॉक कॉम्प्लेक्स में थ्री पिमपल्स और नॉल को कैप्चर करने का टास्क मिला. तोलोलिंग और टाइगर हिल के बीच की ये बेहद ही खतरनाक और सबसे मुश्किल चोटियां थीं. इस दौरान कैप्टन विजयंत के कई जवान शहीद हो गए. टुकड़ी थोड़ी बिखर गई थी. लेकिन विजयंत ने फिर से सब को जमा किया और फिर नॉल की चोटी का एक छोटा हिस्सा भी अपने कब्ज़े में ले लिया. लेकिन इस वक़्त तक कंपनी के कमांडर मेजर पी आचार्य अमरहो चुके थे. सिर्फ 15 मीटर की दूरी से दुश्मन दो मशीन गन से एक साथ इन पर गोलियां बरसा रहे थे. उस समय इस जांबाज़ के पास केवल 1 सैनिक था ..

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इनके पास लौटने का मौक़ा था लेकिन इन्हें शौक थी भारत के दुश्मनों को मार गिराने की और इसके के चलते ही लगभग डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक ये सब कुछ चलता रहा. कैप्टन थापर बिना जान की परवाह कि दुश्मनों को निशाना बनाते हुए नॉल चोटी पर विजय प्राप्त की लेकिन इसी प्रयास में कई गोलियां लगने के कारण वो अमरता को प्राप्त हो चुके थे . आज 29 जून को कारगिल के उस महानायक को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन करते हुए सुदर्शन परिवार उनकी गौरव गाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है .. कैप्टन विजयंत अमर रहें . जय हिन्द की सेना .

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