14 मार्च- आक्रान्ता अफगानों को धकेल कर पेशावर पर भगवा धर्मध्वजा फहराने वाले “बाबा फूला सिंह” बलिदान दिवस

अफ़सोस की बात ये है की राष्ट्र और धर्म के लिए लड़ने वाले उन तमाम वीरों के नाम को इतिहास की पुस्तकों को से हटाया गया. झोलाछाप नकली और चाटुकार इतिहासकारों के कुकर्म के चलते बाबा फूला सिंह जैसे वीरों को विस्मृत किया गया . ये बात तब की है जिस समय धर्म पर अधर्मियों का वार हो रहा था . अफगानी आक्रान्ता हर तरफ हमले कर रहे थे और जहाँ जहाँ धर्म , न्याय और नीति का बोलबाला होता था वहां पर वो बलपूर्वक हमले कर के धर्मनिष्ठ का दमन कर रहे थे .

ये बात उस समय की है जब मजहबी भावनाओ से भरे आक्रान्ताओं की सेना पेशावर पर बलपूर्वक कब्जा कर अफगानी अजीम के नेतृत्व में नौशेहरा मैदान तक आ चुकी थीं। यह सुनकर महाराजा रणजीत सिंह ने हरिसिंह नलवा एवं दीवान कृपाराम के नेतृत्व में उनका मुकाबला करने को स्वराजी सैनिकों के जत्थे खैराबाद भेज दिये।महाराजा के साथ बाबा फूलासिंह अटक नदी के किनारे डट गये; पर शत्रुओं ने अटक पर बना एकमात्र पुल बारूद से उड़ा दिया। इससे दोनों समूहों का आपसी सम्पर्क कट गया।

उस समय रणजीत सिंह ने नदी पर नावों का पुल बनाने का आदेश दिया। तभी एक गुप्तचर ने समाचार दिया कि अटक पार वाले दल शत्रुओं से घिर गये हैं। उन्हें यदि शीघ्र सहायता नहीं मिली, तो सबकी जान जा सकती है।रणजीत सिंह ने चिन्तित नजरों से बाबा फूलासिंह की ओर देखा। बाबा ने संकेत समझकर अपना सिर झुका दिया। फिर घोड़े पर बैठे-बैठे ही उन्होंने हाथ को ऊँचा उठाकर अपने सैनिकों को आगे बढ़ने का आदेश दिया। आदेश पाकर 500 निहंग साथियों ने तेज बहती नदी में घोड़े उतार दिये।

एक ओर नदी की विकराल धारा थी, तो दूसरी ओर शेर जैसे कलेजे वाले साहसी वीर। पानी के जहाज की तरह धाराओं को चीरकर वे अफगानों पर टूट पड़े। शत्रु सैनिक सिर पर पाँव रखकर भागे।जहाँगीरा का दुर्ग भी सिक्ख सैनिकों के पास आ गया। यह सुनकर अजीम खाँ बहुत आगबबूला हुआ। उसने सैनिकों को बहुत भला-बुरा कहा। मजहबी भावनाओं की कसम दिला कर अफगानों को फिर से लड़ने और इस अपमान का बदला लेने को तैयार किया। अफगान सेनापति मुहम्मद खान लुण्डा ने तीस हजार सैनिकों के साथ तरकी की पहाडि़यों पर मोर्चा बाँधा। रणजीत सिंह ने फिर से बाबा फूलासिंह के नेतृत्व में 1,500 सैनिक भेज दिये।

लेकिन फूलासिंह जरा भी चिन्तित नहीं हुए। उन्होंने सैनिकों को ललकारा – गुरू गोविन्द सिंह ने चिडि़यों से बाज लड़ाने की बात कही थी। आज उसी का अवसर आया है। मत भूलो कि एक-एक स्वराजी सैनिक सवा लाख के बराबर होता है। हमें धर्मध्वज फहराकर स्वराज्य की सीमाएँ पेशावर तक पहुँचानी हैं। फूलासिंह की घनगर्जना से सैनिकों का खून गरम हो गया और उनमें उत्साह की लहर दौड़ गयी। घनघोर संग्राम शुरू हो गया। तलवारें आपस में टकराने लगीं। निहंगों के जौहर देखते ही बनते थे। शीघ्र ही महाराजा ने एक और बड़ी टुकड़ी इनकी सहायता के लिए भेज दी.

इससे सिख सैनिकों का हौसला बढ़ गया।वे ‘बोले सो निहाल, सत् श्री अकाल’ कहकर शत्रुओं पर टूट पड़े। इस हमले के बाद अफगानी चीख और चिल्ला कर भागने लगे . वह 14 मार्च, 1823 का दिन था। बाबा फूलासिंह की तलवार मुसलमानों पर कहर ढा रही थी। इसी बीच उन्हें एक गोली आ लगी। कुछ सैनिक उनकी सहायता को आगे बढ़े; पर बाबा चिल्लाये – मेरी चिन्ता मत करो। अपना कत्र्तव्य निभाओ। याद है न, हमें पेशावर पर भगवा झण्डा फहराना है। इसी समय एक और गोली ने उनके घोड़े को भी गिरा दिया।

अब बाबा हाथी पर चढ़ गये। तभी एक अफगान सैनिक ने एक साथ कई गोलियाँ बाबा की ओर चलायीं। इस हमले को वे नहीं झेल पाये। बाबा के बलिदान होते ही सिक्ख सैनिकों ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया। अफगान सेना पीछे हटने लगी। कुछ समय बाद अन्ततः पेशावर पर धर्मध्वजा फहरा ही गया .. आज उस महान बाला फूला सिंह जी के बलिदान दिवस पर उनके शौर्य को याद करते हुए सुदर्शन परिवार उन्हें बारम्बार नमन करते हुए उनकी गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है

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