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आज ही वीरगति प्राप्त हुए थे स्वदेशी आन्दोलन की प्रथम आहुति कहे जाने वाले वीर बाबू गेनू सैद जी.


यद्दपि भारत का स्वर्णिम इतिहास असल रूप में लिखा जाना अभी बाकी है क्योकि कई ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने राष्ट्र की आन मान सम्मान और संस्कृति के लिए खुद को स्वाहा कर दिया लेकिन उनका नाम बहुत कम लोगों तक पहुचाया गया.. आक्रान्ताओं और विधर्मियो को महिमामंडित करती किताबों ने समाज को क्या संदेश दिया इसका आंकलन फिलहाल चल रही रहा है लेकिन अपने सच्चे बलिदानियों को विस्मृत कर के युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित जरूर हुई है.

आज उन्ही तमाम ज्ञात और अज्ञात वीर बलिदानियों में से एक बाबू गेनू सैद जी का आज बलिदान दिवस है. इस नाम से यकीनन काफी लोग परिचित नहीं होंगे. बाबू गेनू का जन्म 1902 में पुणे जिले के गांव महालुंगे पड़वल में हुआ. घनघोर गरीबी में पले-बढ़े बाबू गेनू के पिता का उनके बचपन में ही देहांत हो गया था. मां कपड़ा मिल में मजदूरी करने लगीं. जब बाबू गेनू बड़े हो रहे थे उस वक़्त देश में अंग्रेजों की मुखालफत ज़ोरों पर थी. बाबू गेनू भी आंदोलन में हिस्सा लेने लगे.

जिस आन्दोलन में लाला लाजपत राय जी को वीरगति मिली थी उसी साइमन कमीशन के विरोध में उन्होंने जुलूस भी निकाला. 1930 में हुए गांधी के नमक सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया. दो बार जेल गए.उस समय की अंग्रेज सरकार देश को आर्थिक दृष्टि से लूट रही थी। इंग्लैण्ड में चलने वाली फैक्ट्रियों का उत्पादन बढ़ाने हेतु आवश्यक कच्चे माल के लिए भारत के संसाधनों का दोहन किया जाता था। अंग्रेजों की इस कुटिल चाल को विफल करने के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वातंत्र्य संग्राम में स्वदेशी अपनाने और विदेशी माल का बहिष्कार करने का प्रबल अभियान चलाया था।

स्वदेशी और बहिष्कार का सत्याग्रह देश की अस्मिता का प्रतीक बन गया था। बाबू गेनू ने पूरी शक्ति से इस स्वदेशी आंदोलन में भाग लिया।  पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय घायल हो गये और उनकी मृत्यु हो गई। सत्याग्रह आंदोलन में भी बाबू जेल गये। जेल में ही उन्हें अपनी मां के निधन का समाचार मिला। बाबू ने अपने मित्रों से कहा कि, अब मै पूरी तरह से मुक्त हो गया हूं ,भारत माता को मुक्त कराने के लिए कुछ भी कर सकता हूं। अक्टूबर 1830 में बाबू गेनू, प्रहलाद और शंकर के साथ जेल से बाहर आए।बाबू ने घर-घर जाकर स्वदेशी का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ कर दिया। दीपावली, 1930 के बाद विदेशी माल के बहिष्कार का आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बाबू गेनू ने सभी स्वयंसेवकों से मिलकर तय किया कि विदेशी वस्तुएं ले जाने वाले ट्रकों को रोकेंगे।

12 दिसम्बर को सत्याग्रह का दिन तय किया। 12 दिसम्बर 1930 को शुक्रवार का दिन था। मुम्बई के कालादेवी रोड पर विदेशी कपड़ों से भरी लॉरियां, ट्रक आदि को रोकने का निश्चय किया गया।मुम्बई के मुलजीजेठा मार्केट से विदेशी कपड़े जाने थे, जिनको रोकने की जिम्मेदारी मुम्बई शहर की कांग्रेस पार्टी ने बाबू गेनू और उनके तानाजी पथक संगठन को सौंपी। मि.फ्रेजर को इसकी जानकारी थी। इसलिए उसने पुलिस बल को पहले ही बुला लिया था। प्रातः साढ़े दस बजे से ही सत्याग्रहियों की टोलियां जयघोष करती हुई आने लगीं।

बाबू गेनू के नेतृत्व में तानाजी पथक भी आया। विदेशी माल से भरे ट्रक दौड़ने लगे। विदेशी कपड़ों से भरी हुई लारी आ रही थी। बाबू ने लारी रूकवाने का प्रयास किया। कड़े पुलिस बंदोबस्त के बावजूद घोई सेवणकर नामक युवक लारी के सामने तिरंगा लेकर लेट गया। ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और गाड़ी रूक गयी। भारत माता की जय और वंदेमातरम के नारों ने जोर पकड़ लिया।भीमा घोंई से तुकाराम मोहिते तक यह क्रम चलता रहा। धीरे – धीरे पुलिस का गुस्सा बढ़ता गया। पुलिस ने बल प्रयोग प्रारम्भ कर दिया।

सत्याग्रहियों का जोर भी बढ़ रहा था। तभी लॉरी के सामने स्वयं बाबू गेनू आ गया। क्रुध्द पुलिस का नेतृत्व कर रहे अंग्रेज सार्जेण्ट ने आदेश दिया, लॉरी चलाओ, ये हरामखोर मर भी गए तो कोई बात नहीं। ड्राइवर भारतीय था उसका नाम बलवीर सिंह था। उसने लॉरी चलाने से मना कर दिया। अंग्रेज सार्जेण्ट ने स्वयं लॉरी चलानी प्रारम्भ कर दी।लॉरी बाबू गेनू के ऊपर से गुजर गयी। वह गम्भीर रूप से घायल हो गया। पूरी सड़क बलिदानी खून से लाल हो गई।

अन्तिम सांसे ले रहे बाबू को निकट के अस्पताल में भर्ती करवाया गया जहां सायंकाल उसकी मृत्यु हो गई। बाबू की अन्तिम यात्रा के दिन पूरा मुम्बई बंद रहा। उसकी याद में उसके गांव महालुंगे पडवल में प्रतिमा स्थापित की गई है। प्रत्येक वर्ष 12 दिसम्बर का दिन बाबू गेनू की स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज वीर बलिदानी बाबू गेनू की स्मृति दिवस पर सुदर्शन परिवार भी उनके द्वारा जलाई गई स्वदेशी की अलख को आगे बढाते रहने का संकल्प लेता है.


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