16 जून- “बलिदान दिवस नलिनीकांत बागची”.. शरीर में फ़ैल चुका था जहर और सामने थे सैकड़ों अंग्रेज.. लेकिन तब तक गोलियां बरसाते रहे, जब तक आखें बंद नहीं हो गई

कभी इनका परिवार सामने नहीं आया आज़ादी की नकली ठेकेदारी लेने और कभी भी इन्होने खुद को आगे कर के अपने संघर्ष का हिसाब किताब नहीं माँगा . ये तो जन्म ही लिए थे देश के लिए और अंत में उसी राह पर खुद को तब तक ले कर चलते रहे जब तक उनकी साँसे थम नहीं गयी . ऐसे न जाने कितने योद्धा थे जिन्हे केवल चरखे के गुणगान के चलते आज़ादी के पावन ग्रन्थ में जगह नहीं मिली जबकि उनके कार्यों के आस पास भी नहीं पहुंच सकते आज़ादी के नकली ठेकेदार .

“विश्वास जीतने” की कोशिश को बड़ा झटका.. दिल्ली में गौ माता को काट कर सड़कों पर डाला था इमरान ने

भारत माता को स्वतंत्र करवाने के लिए जिन तमाम ज्ञात अज्ञात वीरों ने ख़ुदक को स्वाहा किया उनमे से एक थे नलिनीकांत बागची जिनका आज है वो बलिदान दिवस जिसे नकली इतिहासकारों और बिके कलमकारों ने कभी नहीं बताया . भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में यद्यपि क्रान्तिकारियों की चर्चा कम ही हुई है; पर सच यह है कि उनका योगदान अहिंसक आन्दोलन से बहुत अधिक था। बंगाल क्रान्तिकारियों का गढ़ था। इसी से घबराकर अंग्रेजों ने राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली में स्थापित की थी। इन्हीं क्रान्तिकारियों में एक थे नलिनीकान्त बागची, जो सदा अपनी जान हथेली पर लिये रहते थे।

17 जून: बलिदान दिवस तृतीय सरसंघचालक परमपूज्य बाला साहब देवरस जी.. भारतमाता के वो सपूत जिनका जीवन ज्वलंत प्रेरणा है धर्मपत पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण के कार्यों की

एक बार बागची अपने साथियों के साथ गुवाहाटी के एक मकान में रह रहे थे। सब लोग सारी रात बारी-बारी जागते थे; क्योंकि पुलिस उनके पीछे पड़ी थी। एक बार रात में पुलिस ने मकान को घेर लिया। जो क्रान्तिकारी जाग रहा था, उसने सबको जगाकर सावधान कर दिया। सबने निश्चय किया कि पुलिस के मोर्चा सँभालने से पहले ही उन पर हमला कर दिया जाये। निश्चय करते ही सब गोलीवर्षा करते हुए पुलिस पर टूट पड़े। इससे पुलिस वाले हक्के बक्के रह गये। वे अपनी जान बचाने के लिए छिपने लगे।

अब्दुल्ला रोक दिए गये मंदिर जाने से.. कश्मीरी हिन्दुओं ने ठुकराया नकली सेक्यूलरिज्म और किया हर हर महादेव का उद्घोष

इसका लाभ उठाकर क्रान्तिकारी वहाँ से भाग गये और जंगल में जा पहुँचे। वहाँ भूखे प्यासे कई दिन तक वे छिपे रहे; पर पुलिस उनके पीछा करती रही। जैसे तैसे तीन दिन बाद उन्होंने भोजन का प्रबन्ध किया। वे भोजन करने बैठे ही थे कि पहले से बहुत अधिक संख्या में पुलिस बल ने उन्हें घेर लिया। वे समझ गये कि भोजन आज भी उनके भाग्य में नहीं है। अतः सब भोजन को छोड़कर फिर भागे; पर पुलिस इस बार अधिक तैयारी से थी। अतः मुठभेड़ चालू हो गयी। तीन क्रान्तिकारी वहीं मारे गये। तीन बच कर भाग निकले। उनमें नलिनीकान्त बागची भी थे।

17 जून: “निर्वाण दिवस” राजमाता जीजाबाई.. भारतवर्ष की वो महान नारी शक्ति जिनके कारण आज भी गौरवान्वित है भारत का पावन इतिहास

भूख के मारे उनकी हालत खराब थी। फिर भी वे तीन दिन तक जंगल में ही भागते रहे। इस दौरान एक जंगली कीड़ा उनके शरीर से चिपक गया। उसका जहर भी उनके शरीर में फैलने लगा। फिर भी वे किसी तरह हावड़ा पहुँच गये। हावड़ा स्टेशन के बाहर एक पेड़ के नीचे वे बेहोश होकर गिर पड़े। सौभाग्यवश नलिनीकान्त का एक पुराना मित्र उधर से निकल रहा था। वह उन्हें उठाकर अपने घर ले गया। उसने मट्ठे में हल्दी मिलाकर पूरे शरीर पर लेप किया और कई दिन तक भरपूर मात्रा में मट्ठा उसे पिलाया। इससे कुछ दिन में नलिनी ठीक हो गये।

वामपंथ शासित केरल में जिन्दा जला दी गई महिला पुलिसकर्मी सौम्या, घरों का दरवाजा पीट कर मांग रही थी मदद … जलाने वाले का नाम है एजाज

ठीक होने पर नलिनी मित्र से विदा लेकर कुछ समय अपना हुलिया बदलकर बिहार में छिपे रहे; पर चुप बैठना उनके स्वभाव में नहीं थी। अतः वे अपने साथी तारिणी प्रसन्न मजूमदार के पास ढाका आ गये। लेकिन पुलिस तो उनके पीछे पड़ी ही थी। 15 जून को पुलिस ने उस मकान को भी घेर लिया, जहाँ से वे अपनी गतिविधियाँ चला रहे थे।  उस समय तीन क्रान्तिकारी वहाँ थे। दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गयी। पास के मकान से दो पुलिस वालों ने इधर घुसने का प्रयास किया; पर क्रान्तिवीरों की गोली से दोनों घायल हो गये। क्रान्तिकारियों के पास सामग्री बहुत कम थी, अतः तीनों दरवाजा खोलकर गोली चलाते हुए बाहर भागे।

मैच से पहले ही गद्दारी.. UP शाहजहांपुर के निजाम अली ने लिखा – “जिंदाबाद था और रहेगा पाकिस्तान”.. अंत में लिखा – “मोदी मुर्दाबाद”

नलिनी की गोली से पुलिस अधिकारी का टोप उड़ गया; पर उनकी संख्या बहुत अधिक थी। अन्ततः नलिनी गोली से घायल होकर गिर पड़े।पुलिस वाले उन्हें बग्घी में डालकर अस्पताल ले गये, जहाँ अगले दिन अर्थात आज ही के दिन 16 जून, 1918 को नलिनीकान्त बागची ने भारत माँ को स्वतन्त्र कराने की अधूरी कामना मन में लिये ही शरीर त्याग दिया। वो साँसे थम जरूर गयी लेकिन ज्वाला भड़क गयी थी जिसके शांत करवाने में अंग्रेजो को घुटने तक देने पड़े .. आज आज़ादी के उस महानायक नलिनीकांत बागची को उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार बारम्बार नमन करते हुए उनकी गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है .

राष्ट्रवादी पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए हमें सहयोग करेंनीचे लिंक पर जाऐं

Share This Post