1 मई- अंग्रेजो के काल बने क्रांतिवीर प्रफुल्ल चाकी का सिर आज ही काट लिया था भारत के ही एक गद्दार ने .. उसका नाम था दरोगा “बनर्जी’

केवल एक ही परिवार की चाटुकारी और मात्र चरखे के गुण गाने में व्यस्त झोलाछाप और चाटुकारी से सनी कलम के मालिकों की दृष्टता के चलते भले ही कई लोग ये नहीं जानते हो की आज बलिदान दिवस है एक महान वीर का लेकिन हम बता रहे हैं गौरव और शौर्य का वो महान इतिहास जिसको पढ़ कर आप को खुद के उन शौर्यवान हुतात्माओ के वंशज होने का गौरव होगा .. उन्ही तमाम ज्ञात अज्ञात महावीरों में से एक हैं प्रफुल्ल चाकी जनका आज है बलिदान दिवस .. सन 1888 में १० दिसम्बर को जन्मे क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।

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प्रफुल्ल का जन्म उत्तरी बंगाल के बोगरा गाँव (अब बांग्लादेश में स्थित) में हुआ था। जब प्रफुल्ल दो वर्ष के थे तभी उनके पिता जी का निधन हो गया। उनकी माता ने अत्यंत कठिनाई से प्रफुल्ल का पालन पोषण किया। विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल का परिचय स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से हुआ और उनके अन्दर देश को स्वतंत्र कराने की भावना बलवती हो गई। इतिहासकार भास्कर मजुमदार के अनुसार प्रफुल्ल चाकी राष्ट्रवादियों के दमन के लिए बंगाल सरकार के कार्लाइस सर्कुलर के विरोध में चलाए गए छात्र आंदोलन की उपज थे।

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पूर्वी बंगाल में छात्र आंदोलन में उनके योगदान को देखते हुए क्रांतिकारी बारीद्र घोष उन्हें कोलकाता ले आए जहाँ उनका सम्पर्क क्रांतिकारियों की युगांतर पार्टी से हुआ। उन्हें पहला महत्वपूर्ण काम अंग्रेज सेना अधिकारी सर जोसेफ बैंफलाइड फुलर को मारने का दिया गया पर यह योजना कुछ कारणों से सफल नहीं हुई। क्रांतिकारियों को अपमानित करने और उन्हें दण्ड देने के लिए कुख्यात कोलकाता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को जब क्रांतिकारियों ने जान से मार डालने का निर्णय लिया तो यह कार्य प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपा गया। दोनों क्रांतिकारी इस उद्देश्य से मुजफ्फरपुर पहुंचे जहाँ ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश को भाँप कर उसकी सरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर भेज दिया था।

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दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया एवं ३० अप्रैल १९०८ ई० को किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। लेकिन जिस बग्घी पर बम फेंका गया था उस पर किंग्सफोर्ड नहीं था बल्कि बग्घी पर दो यूरोपियन महिलाएँ सवार थीं। वे दोनों इस हमले में मारी गईं। दोनों क्रन्तिकारी घटनास्थल से भाग निकले परन्तु मोकामा स्टेशन पर चाकी को पुलिस ने घेर लिया| उन्होंने अपनी रिवाल्वर से अपने ऊपर गोली चलाकर अपनी जान दे दी। यह घटना आज ही कि अर्थात १ मई, १९०८ की है। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद उस समाय के सबसे बड़े गद्दार माने जा सकने वाले के पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन में किसी हिन्दुतानी गुलाम द्वारा की गयी की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है।

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चाकी का बलिदान जाने कितने ही युवकों का प्रेरणाश्रोत बना और उसी राह पर चलकर अनगिनत युवाओं ने मातृभूमि की बलिवेदी पर खुद को होम कर दिया| अंग्रेजो को हरा कर कुछ गद्दारों की नीचता से अमरता आज ही के दिन प्राप्त हुए महान क्रांतिवीर प्रफुल्ल चाकी को आज उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार का शत शत नमन और उनकी गौरवगाथा को छिपाने वाले झोलाछाप इतिहासकारो पर लानत भी उस गद्दार उपनिरीक्षक बनर्जी की तरह जिसने काटा था हुतात्मा का सर और इन्होने काटा इतिहास का वो गौरवशाली पन्ना जिसमे सोने के अक्षरों से शामिल था प्रफुल्ल चाकी का नाम ..

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