7 अप्रैल- पुण्यतिथि क्रांतिवीर बसावन सिंह.. जेल में 18 साल बिताने वाले चन्द्रशेखर आज़ाद के इस साथी की स्वतंत्र भारत 1989 में हुई गुमनाम मृत्यु, क्योंकि बोलबाला था चरखे का


अगर कोई ताव दे कि उसने क्रांतिकारियों और देशभक्तों का बहुत सम्मान किया है तो आज उस से एक सवाल जरूर कीजिये कि उन्होंने कभी भी बसावन सिंह का नाम क्यों नहीं लिया .. बसावन सिंह यकीनन उन्हें भी नहीं याद होंगा जबकि ये वो शूरवीर थे जो महानतम क्रन्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद के साथी रहे और उनके साथ तमाम अभियानों में रहे .. ये वो नाम है जिन्होंने इस देश की आज़ादी के लिए अपनी जवानी को जेल में बिताया था .. लेकिन अफ़सोस फिर भी ये गुमनाम रहे .

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चरखे से आज़ादी आने के दावे सीना ठोंक ठोंक कर करने वाले तमाम तथाकथित लेखको ने कभी भी कहीं भीं इनका नाम प्रमुखता से नहीं लिया था . अफ़सोस की बात ये है कि इन्हें इनके ही द्वारा स्वतंत्र करवाए गये भारत में मिली थी एक बेहद गुमनाम नृत्यु और इनकी शव यात्रा में गिने चुने लोग ही थे .. फिर कैसे न माना जाय कि देश की रक्षा के लिए हथियार उठा कर दुष्टों और गद्दारों का संहार करने वाले इन बलिदानियों के साथ भारत के कथित इतिहासकारों ने न्याय किया होगा ..

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बसावन सिंह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी थे। उनका जन्म 23 मार्च 1909 इस्वी को एक गरीब किसान के घर जमालपुर, वैशाली, बिहार मे हुआ था। उनकी औपचारिक शिक्षा दसवीं के बाद समाप्त हो गयी क्योंकि उन्होने 1921 के असहयोग आन्दोलन मे भाग लिया लेकिन बाद में गांधी से विचारों से अहमत हों कर वो क्रान्ति के पथ पर चल दिए ..सन 1925 मे क्रनातिकारी योगेन्द्र शुक्ल के नेत्रित्व वाली हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी से जुड़ गये।

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ये महानतम क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद के निकट सहयोगी रहे . इन्होनें साढ़े अठारह साल जेल में बिताए। आज ही के दिन अर्थात 7 अप्रैल 1989 को इनकी गुमनाम मृत्यु इनके ही स्वतंत्र करवाए देश में  हो गई, न उस समय लोगो को ज्यादा जानकारी हुई थी और न ही अब और आज… भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अन्य महान और वीर योद्धा बसावन सिंह को आज उनकी पुण्यतिथि पर सुदर्शन परिवार बारम्बार नमन करता है और उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है ..

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