14 जून- जन्मजयंती जैन सन्त आचार्य महाप्रज्ञ जी… जाने उनके पावन जीवन के बारे में

सत्य , अहिंसा , न्याय का मसीहा अक्सर कुछ सोच समझ कर भारत में केवल कुछ व्यक्ति विशेष को ही घोषित किया जाता है पर ऐसी तमाम महान विभूतियाँ भारत में मौजूद हैं जो बिना किसी प्रचार और चर्चा में आने की इच्छा के धर्म और न्याय के पथ को दुनिया के आगे प्रदर्शित किया है . उन्ही तमाम महान विभूतियों में से एक हैं जैन संत आचार्य महाप्रज्ञ जी जिनके आज जन्मदिवस अर्थात 14 जून को सुदर्शन न्यूज उन्हें बारम्बार नमन वंदन और अभिनंदन करता है ..

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आचार्य जी का जन्म  आज ही अर्थात 14 जून 1920 को राजस्थान के झुंझनू जिले के ग्राम तमकोड़ में हुआ था। बचपन में इनका नाम नथमल था। आचार्य जी के पिता का नाम श्री तोलाराम चोरड़िया था जिनका स्वर्गवास जल्द ही हो गया था उसके बाद इनकी माता जी ने श्रीमती बालू ने इनका पालन पोषण किया। बचपन में आचार्य जी का नाम नथमल था .. आध्यत्मिक और धार्मिक स्वभाव होने के कारण बचनप से ही संतों की संगति आचार्य जी को बहुत पसंद थी जिसका इनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। इसी के चलते कालांतर में माँ पुत्र दोनों ने साथ में हिन् संत श्रीमद् कालूगणी से दीक्षा ले ली। यह काल 1929 था अर्थात तब आचार्य जी मात्र 9 वर्ष के थे . बेहद काम समय में आचार्य जी दर्शन, व्याकरण,ज्योतिष, आयुर्वेद,  मनोविज्ञान, न्याय शास्त्र, जैन, बौद्ध , वैदिक , संस्कृत, प्राकृत तथा हिन्दी साहित्य में पारंगत हो गए .जैन मत के प्राचीनतम ग्रंथ  ‘आचरांग सूत्र’ का संस्कृत भाष्य उन्ही की देन है …

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उनकी प्रवचन शैली इतनी रोचक थी की जिसके कानो में भी उनके प्रवचन पड़ जाते थे वो मंत्रमुग्ध हो जाता था . अपनी कर्मठता और धर्मपरायणता के चलते आचार्य जी 1969 में युवाचार्य तथा 1978 में महाप्रज्ञ घोषित किये गए . 1998 में आचार्य तुलसी के पद विसर्जित होने के बाद आचार्य जी को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें आचार्य पद पर पदासीन कर दिया गया …देश विदेश में सत्य , ज्ञान , न्याय और धर्म की शिक्षा देते हुए इन्होने कई अनुयायी बनाये और तमाम भटको को राह पर लाये . मानव जीवन से जुड़े तमाम मुद्दों पर लगभग 150 ग्रंथ उनकी लेखनी के आज भी मौजूद हैं जो प्रासंगिक हैं .

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भारत वर्ष की १ लाख किलोमीटर की पद यात्रा और दस हजार गावों में धर्म शिक्षा दे कर उन्होंने लालच व् आलस्य रुपी भौतिकवाद से विरक्ति का संदेश दिया .9 मई सन 2010 को राजस्थान के जिला चुरू के सरदारशहर में आचार्य जी ने प्राण त्याग दिए थे . भले ही आचार्य जी शरीर से हमारे बीच नहीं हैं पर उनके विचार और उनके उपदेश अनंत काल तक सत्मार्ग और सन्मार्ग की शिक्षा मानव समाज को देते हुए आतंकवाद के मार्ग पर जा रहे कइयों को भटके दिशा से मोड़ कर सत्य और अहिंसा के मार्ग पर लाएंगे बशर्ते वो एक बार आचार्य जी के विचारों को मन लगा कर पढ़ें .. सुदर्शन न्यूज आचार्य जी आज उनके जन्म दिवस पर बारम्बार नमन और वंदन करता है .

 

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