26 सितंबर: जन्मजयंती परमवीर चक्र विजेता सूबेदार जोगिन्दर सिंह.. गोलियां खत्म तो संगीनों से ही चीर दी चीनियों की छाती और हो गये अमर

भारतीय सेना की सिख रेजीमेंट के सूबेदार जोगिन्दर सिंह.. जिनकी जांबाजी तथा वीरता की गाथा लिखी जाए तो कलम में स्याही ख़त्म हो जायेगी.. ये वो गौरवगाथा है जिसके स्मरण मात्र से रौंगटे हो जाते हैं लेकिन शर्म की बात ये है कि सूबेदार जोगिन्दर सिंह पराक्रम, शौर्य, जांबाजी तथा बलिदान को एक तरह से भुला दिया गया है.  अपनी एक एक सांस देश की रक्षा के लिए समर्पित करने वाले इस सूरमा को नकली कलमकार लिख नहीं सके.

देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम इनकी नस नस में था और इन्होंने सेना में जाने और देश के दुश्मनों को ठिकाने लगाने का फैसला किया था ..इनकी गौरवगाथा आज भी उन स्थलों में गूंजती है जहां इन्होंने भारत माता पर घात लगाए दुश्मनों को मौत के घाट उतारा था. जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 को पंजाब में, फरीदकोट जिले में, मोगा के एक गांव मेहला कलां में हुआ था. जोगिंदर नाथू आला गांव की प्राइमरी स्कूल और फिर दरौली गांव की मिडिल स्कूल में पढ़े. सेना में जाने का जज्बा उनके अन्दर हमेशा से था. उन्होंने सेना में जाने की तैयारी की तथा 28 सितंबर 1936 को वे सिख रेजीमेंट में सिपाही के तौर पर भर्ती हो गए.

सेना में आने के बाद वे पढ़े, परीक्षाएं दीं और सम्मानित जगह बनाई. वे अपनी यूनिट के एजुकेशन इंस्ट्रक्टर बनाए गए. अपनी जांबाजी तथा शौर्य के कारण जोगिन्दर सिंह ने सेना में अपनी एक खास जगह बना ली थी. जब भारत आजाद हुआ तो 1948 में जब कश्मीर में पाकिस्तानी कबीलाइयों ने हमला किया तो वहां मुकाबला करने वाली सिख रेजीमेंट का हिस्सा भी वे थे. इस युद्ध में उन्होंने नापाक पाकिस्तानियों के दांत खट्टे कर दिए थे. लेकिन जोगिन्दर सिंह की असली जांबाजी का इम्तिहान अभी  बाकी था. ये इम्तिहान 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय हुआ

1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. चीन ने अक्साई चिन और पूर्वी सीमा (नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) पर अपना दावा ठोका था. चीनी सेना ने थगला रिज पर कब्जा कर लिया. भारतीय सेना की नई IV Corps ने थगला रिज से चीन को बाहर खदेड़ने जैसे  असंभव काम के लिए टुकड़ियों को इकट्ठा किया. हालांकि चीनी सेना ज्यादा नियंत्रण वाली स्थिति में थी. चीनी सेना ने 20 अक्टूबर को नमखा चू सेक्टर और लद्दाख समेत पूर्वी सीमा के अन्य हिस्सों पर एक साथ हमले शुरू कर दिए. तीन दिनों में उसने बहुत सारी जमीन पर कब्जा कर लिया और धोला-थगला से भारतीय उपस्थिति को बाहर कर दिया. अब चीन को तवांग पर कब्जा करना था जो उसकी सबसे बड़ी चाहत थी. उसे तवांग पहुंचने से रोकने का काम भारतीय सेना की पहली सिख बटालियन को दिया गया था.

ये 20 अक्टूबर की भोर थी जब असम राइफल्स की बमला आउटपोस्ट के एक जेसीओ ने देखा कि बॉर्डर के पार सैकड़ों की तादाद में चीनी फौज जमा हो रही है. उसने 11वीं प्लाटून को सावधान कर दिया. जोगिंदर सिंह ने तुंरत हलवदार सुचा सिंह के नेतृत्व ने एक सेक्शन बमला पोस्ट भेजा. फिर उन्होंने अपने कंपनी हेडक्वार्टर से ‘सेकेंड लाइन’ गोला-बारूद मुहैया कराने के लिए कहा. फिर सब अपने-अपने हथियारों के साथ तैयार बैठ गए. सूबेदार जोगिंदर सिंह के साथ सिर्फ 29 सैनिक थे और उनके पास न तो अच्छे हथियार थे और न ही वहां के ठंडे हालात के अनुसार कपड़े ही मौजूद थे. जोगिंदर सिंह जानते थे कि वे यहां सिर्फ अपने साहस के दम पर ही टिके रह सकते हैं, इसलिए वे लगातार सैनिकों का साहस बढ़ाते रहे.

अब 23 अक्टूबर की सुबह 4.30 बजे चीनी सेना ने मोर्टार और एंटी-टैंक बंदूकों का मुंह खोल दिया ताकि भारतीय बंकर नष्ट किए जा सकें. फिर 6 बजे उन्होंने असम राइफल्स की पोस्ट पर हमला बोला. सुचा सिंह ने वहां मुकाबला किया लेकिन फिर अपनी टुकड़ी के साथ आईबी रिज की पलटन के साथ आ मिले. सुबह की पहली किरण के साथ फिर चीनी सेना ने आईबी रिज पर आक्रमण कर दिया ताकि ट्विन पीक्स को हथिया लिया जाए. जोगिन्दर सिंह की पलटन के पास सिर्फ चार दिन का राशन था. उन लोगों के जूते और कपड़े सर्दियों और उस लोकेशन के हिसाब से अच्छे नहीं थे. हिमालय की ठंड रीढ़ में सिहरन दौड़ाने वाली थी लेकिन जोगिंदर ने अपने आदमियों को प्रोत्साहित किया, उनको फोकस बनाए रखने के लिए प्रेरित किया. इतना तैयार किया कि वे अऩुभवी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों को यादगार टक्कर दें.

उनके पास गोलियां कम थीं इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों से कहा कि हर गोली का हिसाब होना चाहिए. जब तक दुश्मन रेंज में न आ जाए तब तक फायर रोक कर रखो उसके बाद चलाओ. जल्द ही इस फ्रंट पर लड़ाई शुरू हो गई. पहले हमले में करीब 200 चीनी सैनिक सामने थे, वहीं भारतीय पलटन छोटी सी. लेकिन बताया जाता है कि जोगिंदर सिंह और उनके साथियों ने चीनी सेना का बुरा हाल किया. उनके बहुत सारे सैनिक घायल हो गए. उनका जवाब इतना प्रखर था कि चीनी सेना को पहले छुपना पड़ा और उसके बाद पीछे हटना पड़ा. लेकिन इसमें भारतीय पलटन को भी नुकसान पहुंचा. इसके बाद जोगिंदर ने टॉन्गपेंग ला के कमांड सेंटर से और गोला-बारूद भिजवाने के लिए कहा.

ये हो रहा था कि 200 की क्षमता वाली एक और चीनी टुकड़ी फिर से एकत्रित हुई और दूसरी बार फिर से आक्रमण कर दिया. इस बीच भारतीय पलटन की नजरों में आए बगैर एक चीनी टोली ऊपर चढ़ गई. भयंकर गोलीबारी हुई. जोगिंदर को मशीनगन से जांघ में गोली लगी. वे एक बंकर में घुसे और वहां पट्टी बांधी. एकदम विपरीत हालात में भी वे पीछे नहीं हटे और अपने साथियों को चिल्लाकर निर्देश देते रहे. जब उनका गनर शहीद हो गया तो उन्होंने 2-इंच वाली मोर्टार खुद ले ली और कई राउंड दुश्मन पर चलाए. उनकी पलटन ने बहुत सारे चीनी सैनिकों को मार दिया था लेकिन उनके भी ज्यादातर लोग मारे जा चुके थे या बुरी तरह घायल थे.

कुछ विराम के बाद चीनी फौज की 200 सैनिकों की टुकड़ी फिर इकट्ठी हो चुकी थी और वे आईबी रिज को छीनने जा रहे थे. डेल्टा कंपनी के कमांडर लेफ्टिनेंट हरीपाल कौशिक ने आने वाला खतरा भांपते हुए रेडियो पर संदेश भेजा जिसे रिसीव करके सूबेदार जोगिंदर सिंह ने ‘जी साब’ कहा, जो अपनी पलटन को भेजे उनके आखिरी शब्द थे. कुछ देर बाद उनकी पलटन के पास बारूद खत्म हो चुका था. सूबेदार सिंह ने इसके अपनी पलटन के बचे-खुचे सैनिकों को तैयार किया और आखिरी धावा शत्रु पर बोला. बताया जाता है कि उन्होंने अपनी-अपनी बंदूकों पर बेयोनेट यानी चाकू लगाकर, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के नारे लगाते हुए चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया और कईयों को मार गिराया. लेकिन चीनी सैनिक आते गए. बुरी तरह से घायल सूबेदार जोगिंदर सिंह को युद्धबंदी बना लिया गया. वहां से तीन भारतीय सैनिक बच निकले थे जिन्होंने जाकर कई घंटों की इस लड़ाई की कहानी बताई.

उसके कुछ ही देर बाद चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बंदी के तौर पर सूबेदार जोगिंदर सिंह की मृत्यु हो गई. सूबेदार जोगिंदर सिंह को उनके अदम्य साहस, समर्पण और प्रेरक नेतृत्व के लिए मरणोपरांत भारत का सबसे ऊंचा वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र प्रदान किया गया. जब चीनी आर्मी को पता चला कि सूबेदार सिंह को परमवीर चक्र का अलंकरण मिला है तो वे भी सम्मान से भर गए. चीन ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ 17 मई 1963 को उनकी अस्थियां उनकी बटालियन के सुपुर्द कर दीं. उनका अस्थि कलश मेरठ में सिख रेजीमेंट के सेंटर लाया गया. अगले दिन गुरुद्वारा साहिब में उनकी श्रद्धांजलि सभा हुई. फिर एक सैरेमनी आयोजित की गई जहां पर वो कलश उनकी पत्नी गुरदयाल कौर और बेटे को सौंप दिया गया. सूबेदार जोगिन्दर सिंह पर 2018 में एक फिल्म भी बनाई गई थी.

 

जन्मजयंती पर सुदर्शन परिवार उन्हें बारंबार नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है .. जय हिंद की सेना 

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