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बलिदान दिवस उड़ीसा के क्रांतिवीर सुरेंद्र साय

भारत माँ की आज़ादी हेतु अपने जीवन के 37 साल जेल में काट दिए, फिर भी गुमनाम रहे। फिर भी इतिहास में जगह नहीं। ऐसे अमर बलिदानी सुरेंद्र साय को आज उनके बलिदान दिवस 28 फरवरी को सुदर्शन न्यूज की तरफ़ से भावभीनी व् अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

ये भूल अक्षम्य नहीं तो क्या ? ये चाटुकारिता के कारण गौरवमय संस्कृति का अपमान नहीं तो क्या ?

क्रांतिवीर सुरेन्द्र साय का जन्म खिण्डा सम्बलपुर उड़ीसा में 23 जनवरी, 1809 को हुआ था। अंग्रेजों के अत्याचार से त्रस्त से उड़ीसा के जमींदारों ने मिलकर इसका सशस्त्र विरोध करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने सुरेन्द्र साय को अपना सेनापति बनाया। धीरे-धीरे इनके संघर्ष एवं प्रतिरोध की गति बढ़ने लगी। इससे अंग्रेज अधिकारी परेशान हो गये।

अपनों की ग़द्दारी के चलते मुखबिरी होने पर अंग्रेजों ने तब धावा बोला जब सुरेन्द्र साय, उदन्त साय, बलराम सिंह तथा लखनपुर के जमींदार बलभद्र देव मिलकर डेब्रीगढ़ में कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे ।। क्रूर अंग्रेजों ने बलभद्र देव की वहीं निर्ममता से हत्या कर दी; पर बाकी तीनों लोग बचने में सफल हो गये।

इस हमले के बाद गतिविधियाँ निर्वाध चलती रहीं। अंग्रेज भी इनके पीछे लगे रहे। एक बार फिर अपनों की ही ग़द्दारी के चलते 1840 में सुरेन्द्र साय, उदन्त साय तथा बलराम सिंह अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गये। तीनों को आजन्म कारावास का दण्ड देकर हजारीबाग जेल में डाल दिया गया। ये तीनों आपस में रिश्तेदार थे।

पूरी ब्रिटिश हुकूमत लन्दन तक तब थर्रा उठी थी जब 30 जुलाई 1857 को हजारों क्रान्तिवीरों ने हजारीबाग जेल पर धावा बोला और सुरेन्द्र साय और उनके 32 साथियों को छुड़ा कर ले गये। सुरेन्द्र साय ने सम्बलपुर पहुँचकर फिर से अपने राज्य को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए सशस्त्र संग्राम शुरू कर दिया।

अंग्रेज पुलिस जिसमे ज्यादातर मात्र वेतन के लालची हिंदुस्तानी सिपाही थे, और क्रांतिकारी सुरेन्द्र साय के सैनिकों में लगातार झड़प होती रही। सुरेन्द्र साय और उनके साथियों ने अंग्रेजों को चैन की नींद नहीं सोने दिया। 23 जनवरी, 1864 को जब सुरेन्द्र साय अपने परिवार के साथ सो रहे थे, तब एक बार फिर अपनों की ही मुखबिरी भारत की आज़ादी पर भारी पड़ी।

अंग्रेज पुलिस ने छापा मारकर सुरेंद्र साय को पकड़ लिया। अंग्रेजो के मन में उनको ले कर कितनी दहशत थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रात में ही उन्हें सपरिवार रायपुर ले जाया गया और फिर अगले दिन नागपुर की असीरगढ़ जेल में बन्द कर दिया।

जेल में बेहद क्रूर यातना के बाद भी सुरेन्द्र ने विदेशी शासन के आगे नहीं झुके और अपने जीवन के 37 साल जेल में बिताने वाले उस महावीर वीर ने आज 28 फरवरी, 1884 को असीरगढ़ किले की जेल में ही अन्तिम साँस ली ..

पर एक सवाल अभी भी कायम है —
**क्या सच में हमें आज़ादी मिली बिना खड्ग बिना ढाल ??**

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