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आज जन्म दिवस है उस दानवीर का जो जड़ में था गौरवगाथा हल्दीघाटी युद्ध के ..

वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला ।
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला ।।
आज अर्थात 29 अप्रैल को धर्म और राष्ट्र के प्रति अथाह प्रेम और दानवीरता के लिए कुछ चाटुकार इतिहासकारों के तमाम साजिश के बाद भी सदा के लिए अमर हो चुके भामाशाह का जन्मदिवस है जिन्हें सुदर्शन न्यूज़ शत शत नमन , वन्दन व अभिनंदन करता है ।।
गौरवमय इतिहास को विलोप करने की साज़िश के चलते इतिहास में कहीं भी बाल्यकाल से महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार रहे इस राष्ट्रभक्त दानवीर के बारे में ना तो सुनने को मिला ना ही पढने को.. धर्म और राष्ट्र के सम्मान की लड़ाई घास की रोटी खा कर लड़ रहे महाराणा प्रताप के हाथों में अपनी सब जमा पूँजी अर्पित करने वाले इस दानवीर का जन्म अलवर, राजस्थान में 29 अप्रैल 1547 को जैन समाज में हुआ था .. इनके पिता श्री का नाम भारमल्ल तथा माता श्रीमती कर्पूरदेवी जी था। इनके पिता श्री भारमल्ल राणा साँगा के समय रणथम्भौर के किलेदार थे, जिन्हें बाद में राणा उदयसिंह ने अपना  प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।
भामाशाह मेवाड़ राज्य के एक महान योद्धा, सलाहकार और मंत्री के रूप में उभरे, जिन्हें उनकी निस्वार्थ सेवाओं के चलते बाद में महाराणा प्रताप ने अपना प्रधानमंत्री भी नियुक्त किया। अपने छोटे भाई ताराचंद के  साथ भामाशाह ने मेवाड़ के लिए कितनी ही लड़ाइयों में भाग लिया।  भामाशाह से चार वर्ष छोटे ताराचंद भी एक योग्य प्रशासक और जुझारू योद्धा थे, जिन्होंने कई अवसरों पर अपने बड़े भाई की तरह मेवाड़ की सेना का नेतृत्व किया था। 
अपने पिता की तरह भामाशाह भी राणा परिवार के लिए समर्पित थे। अपरिग्रह को जीवन का मूलमंत्र मानकर संग्रहण की प्रवृत्ति से दूर रहने की चेतना जगाने में भामाशाह अग्रणी हैं| एक समय ऐसा आया जब अकबर से लड़ते हुए राणा प्रताप को अपनी प्राणप्रिय मातृभूमि का त्याग करना पड़ा। वे अपने परिवार सहित जंगलों में रह रहे थे। महलों में रहने और सोने चाँदी के बरतनों में स्वादिष्ट भोजन करने वाले महाराणा के परिवार को अपार कष्ट उठाने पड़ रहे थे। राणा को बस एक ही चिन्ता थी कि किस प्रकार फिर से सेना जुटाएँ, जिससे अपने देश को मुगल आक्रमणकारियों से चंगुल से मुक्त करा सकें। इस समय राणा के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या धन की थी। उनके साथ जो विश्वस्त सैनिक थे, उन्हें भी काफी समय से वेतन नहीं मिला था। कुछ लोगों ने राणा को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी; पर राणा जैसे देशभक्त एवं स्वाभिमानी को यह स्वीकार नहीं था। 
ऐसे में भामाशाह और ताराचंद का निष्ठापूर्ण सहयोग महाराणा प्रताप के जीवन में महत्वपूर्ण और निर्णायक साबित हुआ जब मातृ-भूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप का सर्वस्व होम हो जाने के बाद भी उनके लक्ष्य को सर्वोपरि मानते हुए भामाशाह ने अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा अर्पित कर दी। भामाशाह को जब राणा प्रताप के इन कष्टों का पता लगा, तो उनका मन भर आया। उनके पास स्वयं का तथा पुरखों का कमाया हुआ अपार धन था, जो सब का सब उन्होंने  राणा के चरणों में अर्पित कर दिया। मातृभूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप का सर्वस्व होम हो जाने के बाद भी उनके लक्ष्य को सर्वोपरि मानते हुए भामाशाह ने अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा उन्हें अर्पित कर दी। 
वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ प्रताप की सेवा में आ उपस्थित हुए और उनसे मेवाड़ के उद्धार की याचना की।  इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने 25 लाख रूपये  तथा 20,000 अशर्फी राणा को दीं। माना जाता है कि यह सम्पत्ति इतनी अधिक थी कि उससे वर्षों तक 25,000 सैनिकों का खर्चा पूरा किया जा सकता था। राणा ने आँखों में आँसू भरकर भामाशाह को गले से लगा लिया। मेवाड़ के अस्मिता की रक्षा के लिए दिल्ली गद्दी का प्रलोभन भी ठुकरा कर महाराणा प्रताप को दी गई इनकी हरसम्भव सहायता ने मेवाड़ के आत्म सम्मान एवं संघर्ष को नई दिशा दी| 
आत्मसम्मान और त्याग की यही भावना आपको स्वदेश, धर्म और संस्कृति की रक्षा करने वाले देश-भक्त के रुप में शिखर पर स्थापित कर देती है । आज  भी धन अर्पित करने वाले किसी भी दानदाता को दानवीर भामाशाह कहकर उसका स्मरण-वंदन किया जाता है | इस  घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह को अपना प्रधानमंत्री और ताराचंद को गोडवाड़ का राज्यपाल नियुक्त किया। ताराचंद ने मृत्यपर्यन्त इस भूमिका को अत्यंत योग्यतापूर्वक निभाया। 
महाराणा के देहान्त के बाद भामाशाह ने  उनके पुत्र अमरसिंह के राजतिलक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इतना ही नहीं, जब उनका अन्त समय निकट आया, तो उन्होंने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह अमरसिंह के साथ सदा वैसा ही व्यवहार करे, जैसा उन्होंने राणा प्रताप के साथ किया है। आदिनाथ भगवान के भक्त भामाशाह का सन  1600 ईसवी में निधन हो गया पर उनकी कई पीढियां उदयपुर के महाराणाओं के यहाँ प्रधानमंत्री के रूप में सेवाएं देती रहीं।
 उदयपुर, राजस्थान में राणाओं  की समाधि स्थल के मध्य भामाशाह की भी समाधि बनी है, जो हमें इस दानवीर की याद दिलाती है।
सुदर्शन न्यूज ऐसे दानवीर को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है ।।
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