बंगाल की भूमि पर जन्म ले कर कश्मीर के लिए बलिदान दे कर भारत की अखंडता बचा गए बलिदानी श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्म दिवस पर बारम्बार अभिनंदन .

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी , वो कश्मीर हमारा है ,

वो कश्मीर हमारा है , वो सारा का सारा है . ..-

—यकीनन आप ने भी इस नारे को कभी पूरे जोश के साथ गाय होगा यदि आप सेना के साथ होंगे और पत्थरबाजों के खिलाफ …. 

अपने रक्त से भारत की अखंडता को सींच कर चले गए , कश्मीर को भारत से सांस्कृतिक , आध्यत्मिक रूप से जोड़ने वाले अमर बलिदानी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आज उनके जन्म दिवस पर सुदर्शन न्यूज उन्हें बारम्बार नमन , वंदन और अभिनन्दन करता है .

आज कश्मीर पर भारत के वर्तमान वजूद के पीछे इस परम बलिदानी के बलिदान को कभी किसी भी काल में भुलाया नहीं जा सकता है .श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का जन्म आज ही के दिन अर्थात 6 जुलाई सन 1901 को वर्तमान पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ था . इनके पिता जी का नाम श्री आशुतोष मुखर्जी व् माता जी का नाम श्रीमती योगमाया देवी जी था . शिक्षा इनको जन्म से ही विरासत में मिली क्योंकि इनके पता श्री आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्थापक उपकुलपति थे जिनका देहांत 1924 में  हो गया .

पिता जी की मृत्यु के बाद इन्होने मात्र 23 वर्ष की आयु में विश्वविद्यालय की प्रबन्ध समिति में सदस्य्ता ले ली … अपनी कर्मठता व कुशलता के चलते मात्र 33 वर्ष की अवस्था में ये कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति की अपनी पिता की छोड़ी कुर्सी पर सुशोभित हुए … इनका वहां कार्यकाल महज ४ वर्ष तक ही था पर इस काल में विश्वविद्ध्यालय ने चहुँमुखी प्रगति की …डॉ . मुखर्जी को याद करने का सबसे बड़ा और महान कारण  है जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की माँग को लेकर उनके द्वारा दिया गया बलिदान।

भारत की आज़ादी के सन 1947 में भारत सरकार के गृहमन्त्री श्री सरदार पटेल जी के अथक संघर्ष से तमाम रियासतों ने अपना विलय भारत में स्वेच्छा से करा लिया पर ना जाने क्यों प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया और ये हस्तक्षेप बाद में एक भयंकर और ऐतिहासिक भूल साबित हुयी और वही भूल आज तमाम जवानो के बलिदान के साथ पाकिस्तानी हस्तक्षेप और आतंकवाद का कारण बन चुकी है ….

नेहरू के ही हस्तक्षेप के चलते जम्मू कश्मीर भारत में पूरी तरह से विलय नहीं हो पाया और इतना ही नहीं उन्होंने वहां के कुशल हिन्दू शासक राजा हरिसिंह जी को हटा कर शेख अब्दुल्ला के हवाले कश्मीर कर दिया . वही शेख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर को इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में मिलाने का हर संभव प्रयास करने लगा … अत्याचार और साजिश की शुरुआत शेख अब्दुल्ला ने तब शुरू कर जी जब उसने जम्मू कश्मीर में आने वाले प्रत्येक हिंदुस्तानी को उनसे अनुमति लेना जरूरी कर दिया जिसको नेहरू अपनी आँखों से देख रहे थे और पूरी तरह से खामोश रहे और उनकी मूक सहमित सत्ता की ख़ामोशी का कारण बनी रही ….

इस एकतरफा अत्याचार का सन 1953 में संगठन  प्रजा परिषद तथा भारतीय जनसंघ ने अब्दुल्ला के अन्याय और नेहरू की इस ख़ामोशी को अपने आंदोलन से चुनौती दी . अफ़सोस इस आंदोलन के खिलाफ नेहरू और शेख एक हो गए और उन्होंने हर ताकत लगा दी इस आंदोलन को कुचल देने की . लेकिन यहाँ भावनाये राष्ट्रप्रेम से जुडी थी इसलिए नेहरू और अब्दुल्ला सफल नहीं हो सके …इस आंदोलन के चलते भारत भर में एक नारा गूँज गया कि– एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान: नहीं चलेंगे ,नहीं चलेंगे। अगर देखा जाय तो ये आंदोलन नेहरू की ही बादशाहत कश्मीर में स्थापित करने के लिए था पर ना जाने नेहरू को वो कौन सा प्रेम था अब्दुल्ला से जो उन्होंने एक प्रकार से कश्मीर को उन्हें दान ही कर रखा था अपने हिसाब से चलाने के लिए …..

इस आंदोलन के समय डॉ. मुखर्जी जनसंघ के अध्यक्ष थे , एक प्रकार से माना जाय कि वो ही इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे . .उन्होंने ऐसे विषम हालत में ही शेख के आदेश को ना मानते हुए बिना शेख से अनुमति लिए जम्मू कश्मीर चले गए जहाँ शेख अब्दुल्ला ने उन्हें गिरफ्तारक कर के जेल में दाल दिया गया … जेल में श्री मुखर्जी को हर तो प्रताड़ना दी गयी जो कभी अंग्रेज काला पानी के कैदियों को दिया करते थे .

बताया जाता है कि उनके लिए देश में बन रहे व्यापक जनसमर्थन से घबरा आकर अब्दुल्ला ने उन्हें रास्ते से हटाने का पूरा प्लान बना डाला था और इस प्लान को अमल में लाया गया  20 जून 1953 को ..इस दिन श्यामा प्रसाद जी की तबियत खराब कुछ ख़राब हो गयी , शायद उन्हें खाने में कुछ ऐसा दिया गया था . तबियत ख़राब होने के बाद जब उन्होंने जेल प्रशासन से दवाएं मांगी तो उन्हें कुछ ऐसी दवा दी गयी जिसको खा कर उनकी सेहत और भी बिगड़ने लगी … इतने बुरे हालत के बाद भी उन्हें २ दिन और रोक कर रखा गया पर जब उनकी तबियत नाजुक होने की जानकारी जनता में पहुंची तब 22 जून को उन्हें अनमने ढंग से अस्पताल में भर्ती कराया गया …..

इस आंदोलन में उनके साथ जो उनके साथ जेल में थे उन्हें उसके साथ नहीं जाने दिया गया और अस्पताल में किसी से मिलने भी नहीं दिया गया ….उसी रात में अस्पताल से खबर आयी कि डाक्टर श्यामा प्रसाद जी अब नहीं रहे और उनकी मृत्यु हो चुकी है …अब्दुल्ला और नेहरू शासन ने उनके पार्थिव शव को को अम्बाला और जालन्धर मार्ग से उनके पैतृक कोलकाता भेजा …24 जून को दिन में लगभग ११ बजे उनकी शव यात्रा निकली जो भीड़ के चलते तीन बजे शमशान पहुँची। उनके अंतिम दर्शन हजारों लोगों ने किये . अब तक किसी ने नहीं बताया कि उनकी तबियत खराब होने पर उन्हें कौन सी दवाये दी गयी ….

अभी भी ये माना जाता है कि उनकी चिकित्सीय ह्त्या की गयी थी कश्मीर में नेहरू और अब्दुल्ला को मनमानी करने की स्वतंत्रता के कारण ..कश्मीर ही नहीं भारत के किसी भी मुद्दे पर किसी और का हस्तक्षेप और अपने विरुद्ध आवाज को नेहरू अपने लिए एक चुनौती जैसे मान गए . उन्हें एक छत्र राज्य चाहिए था और आज अभिव्यक्ति के साथ हर प्रकार की संवैधानिक स्वतन्त्रता मांगने वाले लोग कभी भी संवैधानिक तरीके से भारत के ही अंग को भारत में मिले रहने देने की कामना ले का जेल काट रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत पर एक शब्द नहीं बोलते .

यकीनन डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने खुद को स्वाहा कर के जम्मू-कश्मीर को बचा लिया अन्यथा शेख अब्दुल्ला हर वो कोशिश कर रहा था जिसके चलते कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाए ….

सुदर्शन न्यूज आज ऐसे परम बलिदानी को उनके जन्म दिवस पर बारम्बार नमन वंदन और अभिननदन करता है …कश्मीर में गद्दारों का दमन कर के वहां के मूल निवासियों की पुनर्वापसी ही उनके गौरवमय जीवन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी …. 

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