9 दिसम्बर – प्रभु श्रीकृष्ण कृपापात्र महाकवि सूरदास जयंती की राष्ट्र को शुभकामनाएं

वो कहते है की उन्होंने इतिहास बड़े सलीके से लिखा है लेकिन अकबर की जय आज भी दिन रात बोल रहे चाटुकारों ने प्रभु श्रीकृष्ण जी के परम भक्त और कृपा पात्र महान कवि सूरदास जी का पावन इतिहास संसार से क्यों छिपाया इसका उनके पास कोई जवाब नहीं . जबकि इस महानतम कवि श्रेष्ठ जी सर्वोपरि रखा गया और इतना ही नहीं श्री सूरदास जी वात्सल्य एवं श्रंगार में महाकवि सूरदास हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कवि हैं | सूरदास हिन्दी साहित्य के ऐसे सूर्य हैं जिन्होंने ब्रज भाषा को हिन्दी काव्य में साहित्यिक रूप प्रदान किया | सूरदास जी के लिए कहा गया है कि- कृष्ण भक्ति में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। वह एक कवि, संत और एक महान संगीतकार थे।


उन्होंने इन सभी रोल को अपने जीवन में बखूबी निभाया। उनके जीवनकाल से संबंधित कोई भी पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते। महाकवि सूरदास के जन्म और मृत्यु दोनों को लेकर कई भ्रांतियां हैं। उनके पिता रामदास गायक थे। उनके गुरु का नाम श्री वल्लभाचार्य था। यह भी माना जाता है कि वह अपने गुरु से महज दस दिन छोटे थे। सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में आगरा-मथुरा रोड पर स्थित रुनकता नामक गांव में हुआ था।वहीं कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि उनका जन्म एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में दिल्ली के पास सीही नामक गांव में 1479 ईस्वी में हुआ था। इसी तरह उनकी मृत्यु के संबंध में भी दो मत हैं।सूरदास जन्म से ही नेत्रहीन थे, इस कारण उन्हें उनके परिवार ने छोड़ दिया था। उन्होंने महज छह साल की उम्र ही ही घर त्याग दिया था।


जन्म से अंधे होने के बावजूद भी उनकी कविता में प्रकृति और दृश्य जगत की अन्य वस्तुओं का इतना सूक्ष्म और अनुभवपूर्ण चित्रण मिलता है कि उनके जन्म से अंधे होने पर सहज विश्वास नहीं होता। सूरदास की तथाकथित रचना ‘साहित्य लहरी’ के एक पद में तो उन्हें चंदबरदायी का वंशज माना गया है और उनका वास्तविक नाम सूरजचंद बताया गया है। 18 साल की उम्र में सूरदास गऊघाट (यमुना नदी के तट पर पवित्र स्नान स्थल) गए। यहां पर ही वह महान संत श्री वल्लभाचार्य के संपर्क में आए और उनसे गुरु दीक्षा ली। वल्लभाचार्य ने ही उन्हें ‘भागवत लीला’ का गुणगान करने की सलाह दी। इसके बाद उन्हें श्रीकृष्ण का गुणगान शुरू कर दिया और जीवन में कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इससे पहले वह केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। उनके पदों की संख्या ‘सहस्राधिक’ कही जाती है, जिनका संग्रहीत रूप ‘सूरसागर’ के नाम से प्रसिद्ध है।


सूरदास जी द्वारा लिखित पांच ग्रन्थ बताएं जाते हैं। जिनमें से सूर सागर, सूर सारावली और साहित्य लहरी के प्रमाण मिलते हैं। जबकि नल-दमयन्ती और ब्याहलो का कोई प्रमाण नहीं मिलता। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के 16 ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। सूरसागर में करीब एक लाख पद होने की बात कही जाती है। वर्तमान संस्करणों में करीब पांच हजार पद ही मिलते हैं। सूर सारावली में 1107 छन्द हैं। इसकी रचना संवत 1602 में होने का प्रमाण मिलता है। वहीं साहित्य लहरी 118 पदों की एक लघु रचना है। रस की दृष्टि से यह ग्रन्थ श्रृंगार की कोटि में आता है। झूठी धर्मनिरपेक्षता के चलते जन्म और स्वर्गारोहण दोनों विवादित बना दिए गये चाटुकार इतिहासकारों और नकली कलमकारों के शिकार इस महान कवि श्रेष्ठ को आज उनके जन्म दिवस पर सुदर्शन परिवार बारम्बार नमन और वन्दन करता है और उनके पावन इतिहास को सच्चे रूपों में संसार के आगे लाने का संकल्प दोहराता है . 

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