12 मार्च- इस्लामिक आतंक के आज ही शिकार बने मुंबई 1993 ब्लास्ट के 257 दिवंगतो को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि, लेकिन इंसाफ अभी बाकी है


कोई मस्जिद गिरने से आतंकी बन गया तो कोई थप्पड़ पड़ें तो हथियार उठा लिया .. भारत की कथित तुष्टिकरण की राजनीति के जनको द्वारा ऐसे बयान आप ने आये दिन सुने होंगे लेकिन कभी उनसे सवाल कीजिएगा कि १९९३ में जिस मुंबई में धर्मनिरपेक्षता को धारण किये 250 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गये उनके परिवारों में से कोई आतंकी तो दूर दंगाई तक नहीं बना . ऐसा क्यों ? वो परिवार अभी भी भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर विश्वास करते हुए न्याय की आशा लगाए हैं .

आज का ही दिन है वो जब इस्लामिक आतंक के वीभत्सतम रूप को दुनिया ने देखा था लेकिन मुंबई ने झेला था . भारत के लिए इस से बड़ा कंलकित दिन कम से कम आज़ादी के बाद कोई और नहीं है लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि सिर्फ मुजफ्फरनगर और गुजरात रटने वालों को कभी मुंबई की याद नहीं आई जिसने एक साथ सैकड़ों निरपराध लोगों का लहू अपने सीने पर महज एक दिन में झेला था . आज का दिन भारत के इतिहास में ब्लैक फ्राइडे के रूप में जाना जाता है.

1993 में इस दिन मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 257 लोग मारे गए और करीब 800 जख्मी हुए.मुंबई को लहू लुहान करते हुए ये धमाके दिसंबर.आज ही के दिन अर्थात १२ मार्च १९९३ . एकतरफा हिन्दू इलाकों को निशाना बना कर पूरी तरह से सोची समझी साजिश के तहत किये गये इस ब्लास्ट में लगभग 257 लोगों की मौत हुई थी, जबकि इसके बाद फैले दंगो में हजारों लोग बेघर भी हुए. इसमें हिन्दू समाज के ही लोग अधिकता में थे..

असल में इस्लामिक आतंकियों ने इन बारूदों को सोच समझ कर और चुन कर ऐसी जगहों पर लगाया था जिस से ज्यादा लहू हिन्दू समाज के निर्दोषों का ही बहे . इन हमलों की साजिश सोने के तस्कर और गैंगस्टर टाइगर मेमन ने रची थी जिसने भारत के सबसे बड़े दुश्मन दाऊद इब्राहीम की मदद से इस पाप को अंजाम दिया था.यद्दपि आतंकी हरकत से भी ज्यादा दर्दनाक और शर्मनाक पल इस पूरी घटना में आया था जो उस घटना से भी बड़ा इतिहास बन गया हिया .

वो पल जब तमाम प्रयासों के बाद भारत की सरकार और अभियोजन पक्ष ने इस ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन को फांसी के दिन तक लाने में सफलता पाई थी . लेकिन एक आतंकी के लिए आधी रात को अदालत खुलवाई गयी और कोर्ट से उस आतंकी के लिए दया मांगी गयी जो किसी भी हाल में दया का पात्र नहीं था .. इतना ही नहीं , उस आतंकी की मौत के बाद उसके जनाज़े में एक विशाल याकूब समर्थको का हुजूम निकला जो खुद को टी वी तक पर देशभक्त बताया करते हैं .

आज भी आधिकारिक रूप से घोषित उन २५७ लोगों की आत्मा भारत की व्यवस्था से और आतंकियों के पैरोकारों से सवाल करती है कि उनको न्याय कब मिल पायेगा . क्या वो न्याय दिला पायेंगे जो कभी ओसमा बिन लादेन को जी तो कभी अजहर मसूद को जी कहा करते हैं . आज 12 मार्च को इस्लामिक आतंक के शिकार हुए उन सभी ज्ञात अज्ञात बलिदानियों को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन करते हुए उनको न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते रहने का संकल्प लेता है .


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