राष्ट्रप्रेम व धर्मरक्षा के लिए जीवन समर्पित कर करोड़ों को सन्मार्ग दिखाने वाले पूर्व सर संघचालक वंदनीय रज्जू भैया की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन है..

संगठन केवल व्याख्यान से उत्पन्न नहीं होता. उसमें सजीव अंतःकरणों को एक साँचे में ढालना होता है. एक ही ध्येय के लिए, एक ही मार्ग पर चलनेवाले लाखों तरुणों को एक ही सूत्र में बाँधना होता है. यही लक्ष्य लेकर परमपूज्य केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी. अपने ५ साथियों के साथ डॉक्टर हेडगेवार जी ने जिस आरएसएस की स्थापना की थी वो आरएसएस आज दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है जो पूरी तरह से राष्ट्रप्रेम तथा धर्म रक्षा के लिए समर्पित है. आज संघ जिस मुकाम पर, वहां तक संघ को ले जाने में परमपूज्य राजेंद्र प्रसाद सिंह उर्फ़ रज्जू भैया का अनमोल योगदान है जो आरएसएस के चतुर्थ सरसंघचालक थे. रज्जू भैया इलाहाबाद विश्वविद्यालय में १९३९ से १९४३ तक विद्यार्थी रहे. तत्पश्चात् १९४३ से १९६७ तक भौतिकी विभाग में पहले प्रवक्ता नियुक्त हुए, फिर प्राध्यापक और अन्त में विभागाध्यक्ष हो गये.

रज्जू भैया भारत के महान गणितज्ञ हरीशचन्द्र के बी०एससी० और एम०एससी० (भौतिक शास्त्र) में सहपाठी थे. रज्जू भैया की संघ यात्रा असामान्य है. वे बाल्यकाल में नहीं युवावस्था में सजग व पूर्ण विकसित मेधा शक्ति लेकर प्रयाग आये. सन् १९४२ में एम.एससी. प्रथम वर्ष में संघ की ओर आकर्षित हुए और केवल एक-डेढ़ वर्ष के सम्पर्क में एम.एससी. पास करते ही वे प्रयाग विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद पाने के साथ-साथ प्रयाग के नगर कायर्वाह का दायित्व सँभालने की स्थिति में पहुँच गये. १९४६ में प्रयाग विभाग के कार्यवाह, १९४८ में जेल-यात्रा, १९४९ में दो तीन विभागों को मिलाकर संभाग कार्यवाह, १९५२ में प्रान्त कार्यवाह और १९५४ में भाऊराव देवरस के प्रान्त छोड़ने के बाद उनकी जगह पूरे प्रान्त का दायित्व सँभालने लगे. १९६१ में भाऊराव के वापस लौटने पर प्रान्त-प्रचारक का दायित्व उन्हें वापस देकर सह प्रान्त-प्रचारक के रूप में पुन:उनके सहयोगी बने. भाऊराव के कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ तो पुन: १९६२ से १९६५ तक उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक, १९६६ से १९७४ तक सह क्षेत्र-प्रचारक व क्षेत्र-प्रचारक का दायित्व सँभाला. १९७५ से १९७७ तक आपातकाल में भूमिगत रहकर लोकतन्त्र की वापसी का आन्दोलन खड़ा किया. १९७७ में सह-सरकार्यवाह बने तो १९७८ मार्च में माधवराव मुले का सर-कार्यवाह का दायित्व भी उन्हें ही दिया गया. १९७८ से १९८७ तक इस दायित्व का निर्वाह करके १९८७ में हो० वे० शेषाद्रि को यह दायित्व देकर सह-सरकार्यवाह के रूप में उनके सहयोगी बने. १९९४ में तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने अपने गिरते स्वास्थ्य के कारण जब अपना उत्तराधिकारी खोजना शुरू किया तो सबकी निगाहें रज्जू भैया पर ठहर गयीं और ११ मार्च १९९४ को बाला साहेब ने सरसंघचालक का शीर्षस्थ दायित्व स्वयमेव उन्हें सौंप दिया, अब रज्जू भैया आरएसएस के प्रमुख बन चुके थे.

नि:स्वार्थ स्नेह और निष्काम कर्म साधना के कारण रज्जू भैया सबके प्रिय था. संघ के भीतर भी और बाहर भी. पुरुषोत्तम दास टण्डन और लाल बहादुर शास्त्री जैसे राजनेताओं के साथ-साथ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जैसे सन्तों का विश्वास और स्नेह भी उन्होंने अर्जित किया था. बहुत संवेदनशील अन्त:करण के साथ-साथ रज्जू भैया घोर यथार्थवादी भी थे. वे किसी से भी कोई भी बात निस्संकोच कह देते थे और उनकी बात को टालना कठिन हो जाता था. आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार में जब नानाजी देशमुख को उद्योग मन्त्री का पद देना निश्चित हो गया तो रज्जू भैया ने उनसे कहा कि नानाजी अगर आप, अटलजी और आडवाणीजी – तीनों सरकार में चले जायेंगे तो बाहर रहकर संगठन को कौन सँभालेगा? नानाजी ने उनकी इच्छा का आदर करते हुए तुरन्त मन्त्रीपद ठुकरा दिया और जनता पार्टी का महासचिव बनना स्वीकार किया. चाहे अटलजी हों, या आडवाणीजी; अशोकजी सिंहल हों, या दत्तोपन्त ठेंगडीजी – हरेक शीर्ष नेता रज्जू भैया की बात का आदर करता था; क्योंकि उसके पीछे स्वार्थ, कुटिलता या गुटबन्दी की भावना नहीं होती थी. इस दृष्टि से देखें तो रज्जू भैया सचमुच संघ-परिवार के न केवल बोधि-वृक्ष अपितु सबको जोड़ने वाली कड़ी थे, नैतिक शक्ति और प्रभाव का स्रोत थे. रज्जू भैया ने पूरा जीवन राष्ट्र प्रेम तथा धर्म रक्षा को समर्पित कर दिया.

२९ जनवरी १९२२ जो जन्मे परम पूज्य रज्जू भैया ने १४ जुलाई २००३ को अपना शरीर छोड़ दिया तथा स्वर्गवासी हो गए.  उनके चले जाने से केवल संघ ही नहीं अपितु भारत के सार्वजनिक जीवन में एक युग का अन्त हो गया है. रज्जू भैया केवल हाड़-माँस का शरीर नहीं थे. वे स्वयं में ध्येयनिष्ठा, संकल्प व मूर्तिमन्त आदर्शवाद की साक्षात प्रतिमूर्ति थे. इसलिए रज्जू भैया सभी के अन्त:करण में सदैव जीवित रहेंगे. वे चिन्तक थे, मनीषी थे, समाज-सुधारक थे, कुशल संगठक थे और कुल मिलाकर एक बहुत ही सहज और सर्वसुलभ महापुरुष थे. ऐसा व्यक्ति बड़ी दीर्घ अवधि में कोई एकाध ही पैदा होता है. आज सुदर्शन परिवार आरएसएस के चतुर्थ संघचालक, भारतमाता के लाड़ले परमपूज्य रज्जू भैया को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन करता है. 

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