अघासुर जैसे गौभक्षकों को मृत्युदंड देने वाले योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्णजन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं… प्रेरणा लें उनसे गौसेवा व पाप के नाश की

आज हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि दुनियाभर के सनातनी महाप्रतापी, बलशाली, धर्मरक्षक योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान के जन्मोत्सव के जश्न में डूबे हुए हैं. आज का दिन ही वो शुभ दिन है जब मथुरा में वसुदेव व देवकी के यहाँ पाप का विनाश करने के लिए श्रीकृष्ण जी अवतरित हुए तथा आपने अवतरण के समय से ही उन्होंने अधर्म को कुचलना शुरू कर दिया. योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जहाँ गौभक्षक अघासुर का वध करके गौसेवा तथा गौरक्षा के प्रति आपने समर्पण का परिचय दिया तो वहीं दानव कंस का वध करके धर्म रक्षा की. द्रोपदी का चीरहरण होने के बचाया वहीं महाभारत के महासमर में अर्जुन का सारथी बनकर गीता का वो सन्देश दिया जिसे आत्मसात कर अर्जुन ने बड़े बड़े सेनापतियों से सजी कौरव सेना को नेस्तनाबूद कर दिया तथा धर्म साम्राज्य स्थापित किया. श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि हे पार्थ! ये धर्मयुद्ध है और धर्मयुद्ध में वीर का एक ही लक्ष्य होना चाहिए और वो लक्ष्य है विजय या वीरगति . श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि अर्जुन अधर्म तथा अनीति को कुचलने के लिए जो करना पड़े कर, जो धर्म के रास्ते में अवरोध बने उसका वध कर. इसके बाद जो हुआ वो युगों-युगों तक हम सबके लिए प्रेरणा बना रहेगा.

आज योगेश्वर श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर हम सबको श्रीकृष्ण को जानना तथा उनको समझना जरूरी है. योगेश्वर श्रीकृष्ण भारतवर्ष की महानतम विभूतियों में से एक थे .  उनका जीवन समस्त मनुष्यमात्र के लिए प्रेरणास्त्रोत है. जिन्हें हम वैदिकधर्मी ‘महापुरूष’ मानते हैं और उनके उज्वल चरित्र से अपने गुण कर्म स्वभाव सुधारना ही उनकी वास्तविक पूजा मानते हैं. उनका जीवन अद्भुत गुणों का सागर है अब हम उस सागर से कुछ गुणरूपी बूंदों से आपको परिचित् करवाते हैं. श्रीकृष्ण जी एक आदर्श मित्र थे. सुदामा जी के साथ तो आप उनकी मित्रता से परिचित है ही परन्तु वो युधिष्ठिर से भी अर्जुन के सम्बन्ध में (महाभारत भीष्मपर्व १०७/३३) कहते हैं…

“तव भ्राता मम सखा सम्बन्धी शिष्य एव च । मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फाल्गुनार्थे महीपते ।।” अर्थात् तुम्हारा भाई अर्जुन मेरा मित्र, सम्बन्धी और शिष्य हैं । उसके हित के लिए मैं अपना मांस(शरीर का टुकड़ा) भी काटकर दे सकता हूँ ।

इसके अलावा श्रीकृष्ण जी स्वभाव से बहुत ही विनम्र थे तथा वे अपनो से बड़ो का पूरा सम्मान करते थे और वे जब वेदव्यास, धृतराष्ट्र, कुन्ती और युधिष्ठर आदि बड़ो से मिलते तो उनके चरण छूते थे ।

“ततोSब्रवीद् वासुदेवोSभिगम्य कुन्तीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम्। कृष्णोSहमस्मीति निपीड्य पादौ युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ।।” (महा० आदि० १९०/२०)

‘मैं कृष्ण हूँ’, ऐसा कहकर उन्होनें आजमीढवंशी राजा युधिष्ठर के चरण-स्पर्श किये ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण जुए के घोर विरोधी थे तथा जुए को एक बहुत ही बुरा व्यसन मानते थे. जब वे काम्यक वन में धर्मराज युधिष्ठिर से मिले तो उन्होनें युधिष्ठर को कहा…

“आगच्छेयमहं द्यूतमनाहूतोSपि कौरवैः । वारयेयमहं द्यूतं बहून् दोषान् प्रदर्शयन् ।।” (महा० वनपर्व १३/१,२)

अर्थात् हे राजन् ! यदि मैं पहले द्वारका में या उसके निकट होता तो आप इस भारी संकट में न पड़ते | मैं कौरवों के बिना बुलाये ही उस द्यूत-सभा में जाता और जुए के अनेक दोष दिखाकर उसे रोकने की पूरी चेष्टा करता ।

श्रीकृष्ण मदिरापान के घोर विरोधी थे. महाभारत मौसलपर्व १/२९,३०,३१ के अनुसार उन्होनें मदिरापान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया था और उसका सेवन करनेवाले के लिए मृत्युदण्ड की व्यवस्था की थी.

बात जब सदाचार की आती है इसमें श्रीकृष्ण से बड़ा उदहारण कोई नहीं हो सकता. श्रीकृष्ण सदाचार की मूर्ति थे. वे मन की पवित्रता के पोषक थे. उन्होनें गीता १६/२१ में नरक (दुःखों) के तीन दरवाजे बताए हैं– काम, क्रोध और लोभ अतः इन तीनों को छोड़ देना को कहा है. गीता में उनके उपदेश ये कथनमात्र ही नहीं हैं, अपितु श्रीकृष्ण जी ने इनको जीवन में भी ढाला था. महाभारत का युध्द आरम्भ होने से पहले उन्होनें अश्वत्थामा से कहा था कि…

“ब्रह्मचर्यं महद् घोरं तीर्त्त्वा द्वादशवार्षिकम् । हिमावत्पार्श्वामास्थां यो मया तपसार्जितः ।। समानव्रतचारिण्यां रूक्मिण्यां योSन्वजायत । सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ।।(सौप्तिकपर्व १२/३०.३१)

मैंने १२ वर्ष तक रूक्मिणी के साथ हिमालय में ठहरकर महान् घोर ब्रह्मचर्य का पालन करके सनत्कुमार के समान तेजस्वी प्रद्युम्न नाम के पुत्र को प्राप्त किया था.   विवाह के पश्चात् १२ वर्ष का घोर ब्रह्मचर्य को धारण करना उनके संयम का महान् उदाहरण है. यही कारण है श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है.

भगवान श्रीकृष्ण धर्म और न्याय के पक्षधर थे. उनके जीवन का लक्ष्य था– सज्जन पुरूषों की रक्षा और दुष्टों का विनाश. पाण्डव धर्मपरायण थे, इसीलिए उन्होने उनका साथ दिया और उनकी जीत कराई. इसके अलावा श्रीकृष्ण जी में लोभ लेश मात्र भी नहीं था. उन्होंने कंस को मारा, परन्तु उसका राज्य अपने हाथ में नहीं लिया तथा उग्रसेन को राजा बनाया. जब जरासन्ध को मार दिया गया तब श्रीकृष्ण ने उसके बेटे सहदेव का राज्याभिषेक किया. इसी प्रकार शिशुपाल और भौमासुर को मारने के पश्चात् भी उनके पुत्रो को ही वहा का राजा नियुक्त किया ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं ईश्वरोपासक थे तथा नित्यप्रति सन्धया, हवन और गायत्री–जाप किया करते थे. दूतकर्म पर जाते समय मार्ग में सूर्यास्त के समय उन्होंने रथ रूकवाकर सन्ध्या की.

“अवतीर्य रथात् तूर्णं कृत्वा शौचं यथाविधि । रथामोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेश ह ।।” (महा० उद्योगपर्व ८४/२१)

जब सूर्यास्त होने लगा तब श्रीकृष्ण ने शीघ्र ही रथ से उतकर रथ खोलने का आदेश दिया और पवित्र होकर सन्ध्योपासना में लग गये ।

मित्रो! ऐसे थे हमारे आदर्श श्रीकृष्ण जी जिन्होंने आपने जन्म के समय से ही पाप तथा पापियों का विनाश किया. शिशुपाल जैसे दुष्टों को सुधरने का पूरा मौक़ा दिया लेकिन जब वो नहीं  माना तो खुद उसका वध किया. आजीवन धर्मरक्षा के लिए संघर्ष करते रहे रहे. हमे भी अब उनके चरित्र की पूजा कर वैसा ही बनने का प्रण लेना चाहिए और पुनः एक अखण्ड भारत “आर्यवर्त” के निर्माण में जुट जाना चाहिए. आज की स्थिति भी बिल्कुल महाभारत की तरह ही हो रही हैं जब विधर्मियों की संख्या बढ़ती जा रहीए है, पाप, अनाचार, दुराचार, अत्याचार लगातार बढ़ता जा रहा है, ऐसे मैं आज जरूरत है तो श्रीकृष्ण को जानने की, उनके दिए गीता के ज्ञान को आत्मसात करने की. अगर श्रीकृष्ण जी के चरित्र से प्रेरणा ले पाए, उनके गीतोपदेश को आत्मसात करके धर्म पथ पर चल पाए तो निश्चित ही अखंड भारत “आर्यावर्त” का निर्माण होगा तथा भारतमाता विश्व गुरु की पदवी पर विराजमान होगी.

जय श्रीकृष्ण….जय आर्यावर्त !!

सुदर्शन परिवार की तरफ से आप सभी को चक्रधारी, गौरक्षक, धर्मरक्षक, पाप विनाशक योगेश्वर श्री कृष्ण जी के जन्मोत्सव की हार्दिक बधाइयाँ..!!

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