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20 नवम्बर: तमाम इस्लामिक मुल्कों से अकेले लड़ कर जीते इजरायल ने आज 1949 में गिनी थी यहूदियों की जनसंख्या, जो बची थी मात्र 10 लाख.. उसके बाद उठाया बड़ा कदम खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए


दुनिया के अगर सबसे खुद्दार देशों की और सबसे खुद्दार जनता की लिस्ट बनाई जाए तो यकीनन उसमें इजरायल के नाम को काफी ऊपर लिखा जाएगा..ये वो देश है जॉन सिर्फ अपने दुश्मनों को तेजी से समय रहते खत्म कर रहा था बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ता जा रहा था ..एक समय इसकी घटती जनसँख्या इसके अस्तित्व के लिये बड़ा सवाल बन गई थी लेकिन इस देश के यहूदियों ने हिम्मत नही  हारी और फिर से खुद को एकत्रित किया .. हिटलर ने बड़ी सँख्या में यहूदियों का नरसंहार करवाया था .. उसके बाद यहूदियों को अरबों अर्थात इस्लामिक देशों के सामूहिक हमले का सामना करना पड़ा था ..लेकिन इसके बाद भी इजरायलियों ने हिम्मत नहीं हारी और सबका सामना करते हुए जीत हासिल की .. लेकिन उसके बाद इन्होंने ध्यान दिया तो अपनी तेजी से कम हुई जनसँख्या पर जो युद्ध लड़ते लड़ते बची थी मात्र 10 लाख . ये गिनती आज ही के दिन अर्थात 20 नवम्बर 1949 को हुई थी जिसके बाद इजरायल ने तेजी से बढ़ रही अरबो की आबादी के मुकाबले अपनी भी संख्या बढ़ाई.

अपने देश मे बाकी मज़हबी लोगो की आबादी पर सरकारी नियम बना कर प्रभावी अंकुश लगाने वाले इजरायल ने यहूदियों की संख्या तेजी से बढाई जो वर्तमान समय मे 10 लाख से बढ़ कर लगभग 70 लाख हो चुकी है जो यहूदियों के लिहाज से सेफ आंकड़ा है यद्द्पि अभी भी वो 3 से अधिक की दर से अपनी संख्या को बढ़ा रहे हैं ..इजरायल में 20 % के आस पास मुस्लिम भी हैं लेकिन उनकी आबादी के साथ उनके रहन सहन आदि पर भी प्रभावी अंकुश इजरायल ने लगा रखा है .. भारत मे हिंदुओं, सिखों की तेजी से घटती आबादी व अन्य मत मज़हब वालों की उतनी ही तेजी से बढ़ रही जनसँख्या से आने वाले खतरे को भांप कर राष्ट्र निर्माण संस्था के अध्यक्ष श्री सुरेश चव्हाणके जी ने पूरे देश मे कभी अपने टी वी शो तो कभी जनजागरण यात्रा के रूप में अभियान छेड़ रखा है जिसके अंतर्गत सभी मत मज़हब वालो को जनसँख्या के लिए एक कानून लागू करने की मांग की जा रही हो जिसे कड़ाई से लागू किया जाय व सबको मानना ही पड़े ..भारत को भी हिन्दू विहीन करने के लिए कभी कश्मीर को, कभी आसाम को , कभी नोवाखाली को, कभी मोपला को निशाना बनाया जाता रहा जिसके असर भारत मे कई इलाकों से हिंदुओं का पलायन के रूप में देखने को मिल रहा .. यही नही भारत के हिन्दू आंतरिक समस्याओं सभी जूझ रहे जिसमे लव जिहाद, धर्मान्तरण, लैंड जिहाद जैसी साजिशें भी शामिल हैं जो भारत की एक खास कथित तुष्टिकरण गैंग के चलते और भी गति पा रही हैं ..

1948 के आख़िर में इसराइल के अरब पड़ोसियों ने हमला कर दिया था. इनकी कोशिश इसराइल को नष्ट करने की थी, लेकिन वे नाकाम रहे. अरब और इसराइल के संघर्ष की छाया मोरोक्को से लेकर पूरे खाड़ी क्षेत्र पर है. इस संघर्ष का इतिहास काफ़ी पुराना है. 14 मई 1948 को पहला यहूदी देश इसराइल अस्तित्व में आया. यहूदियों और अरबों ने एक-दूसरे पर हमले शुरू कर दिए. लेकिन यहूदियों के हमलों से फ़लस्तीनियों के पाँव उखड़ गए और हज़ारों लोग जान बचाने के लिए लेबनान और मिस्र भाग खड़े हुए. 1948 में इसराइल के गठन के बाद से ही अरब देश इसराइल को जवाब देना चाहते थे. इसराइल और इसके पड़ोसियों के बीच बढ़ते तनाव का अंत युद्ध के रूप में हुआ. यह युद्ध 5 जून से 11 जून 1967 तक चला और इस दौरान मध्य पूर्व संघर्ष का स्वरूप बदल गया.  अपनी बढ़ी जनसँख्या के चलते यहूदियों ने अरबियों को ग़ज़ा से, सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट और पूर्वी यरुशलम से धकेल दिया. इसके कारण पाँच लाख और फ़लस्तीनी बेघरबार हो गए.

साल 1948 तक इजराइल और फिलिस्तीन की वास्तविक सीमा रेखा निर्धारित नहीं हो पाई थी। अब यहूदियों और फिलिस्तीनी अरबों में खूनी टकराव शुरू हो गया। 14 मई 1948 को यहूदियों ने स्वतन्त्रता की घोषणा करते हुए ‘इजराइल’ नाम के एक नए देश का ऐलान कर दिया। अगले ही दिन अरब देशो ने मिलकर इजराइल पर हमला कर दिया। इसे ‘1948 का युद्ध’ कहा गया और यही से अरब इजराइल युद्ध की शुरुवात हो गई। जून 1948 में एक युद्ध विराम ने अरबों और इजराइलियों दोनों दोबारा तैयारियां करने का मौका दिया। अब युद्ध का पलड़ा इजराइलियों की तरफ झुक गया और अंततः इजराइलियों की जीत हुई। इजरायल के अपनी जनसँख्या व वजूद बचाने के तमाम प्रयासों की सराहना करते हुए भारत मे भी एक समान जनसँख्या कानून बनाने व हिन्दू समाज के हितों की रक्षा करने की मांग आज राष्ट्र निर्माण संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सुरेश चव्हाणके जी फिर दोहराते हैं और इस कानून के लागू होने तक अपने संघर्ष को जारी रखने का संकल्प दोहराते हैं.


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