11 अक्टूबर: – जन्मजयंती भारतरत्न नाना जी देशमुख.. जीवन ही नही देह भी दान कर दी जिन्होंने देश के लिए देशवासियों के लिए.. जी हाँ, ये है संघ शिक्षा

राजनीति के शिखर पर पहुंचकर एक झटके से सब छोड़ देना तथा समाज सेवा के लिए जुट जाना बहुत कठिन होता है. आजाद भारत में इसके कम उदाहरण हैं जब किसी कोई व्यक्ति सत्ता के शिखर पर पहुंचा हो तथा उसने अचानक से राजनीति छोड़ने की घोषणा ये कहते हुए कर दी हो कि अब वह समाज सेवा करेंगे. लेकिन नानाजी देशमुख ने ऐसा किया था. चार दशक पहले नानाजी देशमुख ऐसा ही दुस्साहस करके गांवों के समग्र विकास का मॉडल खड़ा करने के लिए निकल पड़े थे. पिछले वर्ष नाना जी देशमुख को केंद्र सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत-रत्न से नवाजा.

नानाजी ने दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद दर्शन को धरातल पर उतारने का कठिनतम काम करने का बीड़ा उठाया था.उत्तर प्रदेश के गोंडा से शुरू हुई इस विकास यात्रा की पूर्णाहुति चित्रकूट के बहुआयामी ग्रामोदय प्रकल्प से हुई. आज नाना जी देशमुख की जन्मजयंती है. नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर सन 1916 को बुधवार के दिन महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के एक छोटे से गांव कडोली में हुआ था. इनके पिता का नाम अमृतराव देशमुख था तथा माता का नाम राजाबाई था. नानाजी के दो भाई एवं तीन बहने थीं. नानाजी जब छोटे थे तभी इनके माता-पिता का देहांत हो गया. बचपन गरीबी एवं अभाव में बीता. वे बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनिक शाखा में जाया करते थे. बाल्यकाल में सेवा संस्कार का अंकुर यहीं फूटा.

ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिए नानाजी ने स्नातक युवा दम्पत्तियों से पांच वर्ष का समय देने का आह्वान किया. पति-पत्नी दोनों कम से कम स्नातक हों, आयु 35 वर्ष से कम हो तथा दो से अधिक बच्चे न हों. इस आह्वान पर दूर-दूर के प्रदेशों से प्रतिवर्ष ऐसे दम्पत्ति चित्रकूट पहुंचने लगे. चयनित दम्पत्तियों को 15-20 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता था. प्रशिक्षण के दौरान नानाजी का मार्गदर्शन मिलता था. नानाजी उनसे कहते थे- “राजा की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में 11 वर्ष तक रह सकती है, तो आज इतने प्रकार के संसाधनों के सहारे तुम पांच वर्ष क्यों नहीं रह सकतीं?” ये शब्द सुनकर नवदाम्पत्य में बंधी युवतियों में सेवा भाव और गहरा हुआ तथा उनके कदम अपने सुनहरे शहर एवं घर की तरफ नहीं, सीता की तरह अपने पति के साथ जंगलों- पहाड़ों बीच बसे गांवों की ओर बढ़ गये. तब इनको नाम दिया गया – समाजशिल्पी दंपत्ति. प्रारम्भ में गांव वालों को समझ नहीं आया था कि ये पढ़े-लिखे युवक-युवतियां हमारे गांव की खाक क्यों छान रहे थे? किन्तु कुछ ही महीनों बाद उनके व्यवहार और कार्यों को देखकर गांव वाले अभिभूत हो गए. अनजानापन पारिवारिक निकटता में बदल गया. और यहीं से शुरू हुई उस गांव के विकास की यात्रा. जातिवाद व पार्टीवाद में बंटे लोगों को रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ना बड़ा दुष्कर काम था लेकिन नानाजी की जीवटता ने ये कर दिखाया.

जब वे 9वीं कक्षा में अध्ययनरत थे, उसी समय उनकी मुलाकात संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार से हुई. डा. साहब इस बालक के कार्यों से बहुत प्रभावित हुए. मैट्रिक की पढ़ाई पूरी होने पर डा. हेडगेवार ने नानाजी को आगे की पढ़ाई करने के लिए पिलानी जाने का परामर्श दिया तथा कुछ आर्थिक मदद की भी पेशकश की. लेकिन स्वाभिमानी नानाजी को आर्थिक मदद लेना स्वीकार्य न था. वे किसी से भी किसी तरह की सहायता नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने डेढ़ साल तक मेहनत कर पैसा इकट्ठा किया और उसके बाद 1937 में पिलानी गये. पढ़ाई के साथ-साथ निरंतर संघ कार्य में लगे रहे. कई बार आर्थिक अभाव से मुश्किलें पैदा होती थीं परन्तु नानाजी कठोर श्रम करते ताकि उन्हें किसी से मदद न लेनी पड़े.

सन् 1940 में उन्होंने नागपुर से संघ शिक्षा वर्ग का प्रथम वर्ष पूरा किया. उसी साल डाक्टर साहब का निधन हो गया. फिर बाबा साहब आप्टे के निर्देशन पर नानाजी आगरा में संघ का कार्य देखने लगे. आगरा में वे पहली बार दीनदयाल उपाध्याय से मिले. बाद में वे गोरखपुर गये और लोगों को संघ की विचारधारा के बारे में बताया. यह कार्य आसान नहीं था. संघ के पास दैनिक खर्च के लिए भी पैसे नहीं होते थे. नानाजी को धर्मशालाओं में ठहरना पड़ता था और लगातार धर्मशाला बदलना भी पड़ता था, क्योंकि एक धर्मशाला में लगातार तीन दिनों से ज्यादा समय तक ठहरने नहीं दिया जाता था. अन्त में बाबा राघवदास ने उन्हें इस शर्त पर ठहरने दिया कि वे उनके लिये खाना बनाया करेंगे. तीन साल के अन्दर उनकी मेहनत रंग लायी और गोरखपुर के आसपास संघ की ढाई सौ शाखायें खुल गयीं. नानाजी ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया. उन्होंने पहले सरस्वती शिशु मन्दिर की स्थापना गोरखपुर में की.

जब आर.एस.एस. से प्रतिबन्ध हटा तो राजनीतिक संगठन के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना का फैसला हुआ. श्री गुरूजी ने नानाजी को उत्तरप्रदेश में भारतीय जन संघ के महासचिव का प्रभार लेने को कहा. नानाजी के जमीनी कार्य ने उत्तर प्रदेश में पार्टी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी. १९५७ तक जनसंघ ने उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में अपनी इकाइयाँ खड़ी कर लीं. इस दौरान नानाजी ने पूरे उत्तरप्रदेश का दौरा किया जिसके परिणामस्वरूप जल्द ही भारतीय जनसंघ उत्तरप्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गयी..

उत्तरप्रदेश में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि, अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्व और नानाजी के संगठनात्मक कार्यों के कारण भारतीय जनसंघ महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गया. न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं से बल्कि विपक्षी दलों के साथ भी नानाजी के सम्बन्ध बहुत अच्छे थे. चन्द्रभानु गुप्त भी, जिन्हें नानाजी के कारण कई बार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था, नानाजी का दिल से सम्मान करते थे और उन्हें प्यार से नाना फड़नवीस कहा करते थे. डॉ॰ राम मनोहर लोहिया से उनके अच्छे सम्बन्धों ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी. एक बार नानाजी ने डॉ॰ लोहिया को भारतीय जनसंघ कार्यकर्ता सम्मेलन में बुलाया, जहाँ लोहिया जी की मुलाकात दीन दयाल उपाध्याय से हुई. फिर दोनों ने मिलकर कांग्रेस के कुशासन का पर्दाफाश किया.

१९६७ में भारतीय जनसंघ संयुक्त विधायक दल का हिस्सा बन गया और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार में शामिल भी हुआ. नानाजी के चौधरी चरण सिंह और डॉ राम मनोहर लोहिया दोनों से ही अच्छे सम्बन्ध थे, इसलिए गठबन्धन निभाने में उन्होंने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी जी का योगदान अद्भुत रहा. नानाजी, विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए. दो महीनों तक वे विनोबाजी के साथ रहे. वे उनके आन्दोलन से अत्यधिक प्रभावित हुए. जेपी आन्दोलन में जब जयप्रकाश नारायण पर पुलिस ने लाठियाँ बरसायीं उस समय नानाजी ने जयप्रकाश को सुरक्षित निकाल लिया.

इस दौरान नानाजी को चोटें आई और इनका एक हाथ टूट गया. जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई ने नानाजी के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की. जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर उन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति को पूरा समर्थन दिया. जनता पार्टी से संस्थापकों में नानाजी प्रमुख थे. कांग्रेस को सत्ताच्युत कर जनता पार्टी सत्ता में आयी. आपातकाल हटने के बाद चुनाव हुए, जिसमें बलरामपुर लोकसभा सीट से नानाजी सांसद चुने गये. उन्हें पुरस्कार के तौर पर मोरारजी मंत्रिमंडल में बतौर उद्योग मन्त्री शामिल होने का न्यौता भी दिया गया, लेकिन नानाजी ने साफ़ इनकार कर दिया. नाना जी ने कहा कि 60 साल से अधिक आयु वाले सांसद राजनीति से दूर रहकर संगठन और समाज कार्य करें.

1980 में साठ साल की उम्र में उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर आदर्श की स्थापना की तथा अपना पूरा जीवन सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगा दिया. १९८९ में वे पहली बार चित्रकूट आये और अन्तिम रूप यहीं बस गये. उन्होंने भगवान श्रीराम की कर्मभूमि चित्रकूट की दुर्दशा देखी. वे मंदाकिनी के तट पर बैठ गये और अपने जीवन काल में चित्रकूट को बदलने का फैसला किया. चूँकि अपने वनवास-काल में प्रभु श्रीराम ने वनवासियों के उत्थान का कार्य यहीं रहकर किया था, अत: इससे प्रेरणा लेकर नानाजी ने चित्रकूट को ही अपने सामाजिक कार्यों का केन्द्र बनाया. उन्होंने सबसे गरीब व्यक्ति की सेवा शुरू की. वे अक्सर कहा करते थे कि उन्हें राजा राम से वनवासी राम अधिक प्रिय लगते हैं अतएव वे अपना बचा हुआ जीवन चित्रकूट में ही बितायेंगे. ये वही स्थान है जहाँ राम ने अपने वनवास के चौदह में से बारह वर्ष गरीबों की सेवा में बिताये थे. उन्होंने अपने अन्तिम क्षण तक इस प्रण का पालन किया. नानाजी ने यूपी और मध्यप्रदेश के लगभग 500 गांवों की सूरत बदलने का काम किया. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया था. वाजपेयी जी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालम्बन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिये पद्म विभूषण भी प्रदान किया.

नानाजी देशमुख को जब पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने नानाजी देशमुख और उनके संगठन दीनदयाल शोध संस्थान की प्रशंसा की. इस संस्थान की मदद से सैकड़ों गाँवों को मुकदमा मुक्त विवाद सुलझाने का आदर्श बनाया गया. अब्दुल कलाम ने कहा-“चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और उनके साथियों से मुलाकात की. दीन दयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है. यह प्रारूप भारत के लिये सर्वथा उपयुक्त है. विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में भी मदद करता है. मैं समझता हूँ कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गाँव मुकदमें बाजी से मुक्त है. इसके अलावा इन गाँवों के लोगों ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया है कि किसी भी विवाद का हल करने के लिये वे अदालत नहीं जायेंगे. यह भी तय हुआ है कि सभी विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिये जायेंगे. जैसा नानाजी देशमुख ने हमें बताया कि अगर लोग आपस में ही लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिये समय कहाँ बचेगा?” कलाम के मुताबिक, विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है. शोषितों और दलितों के उत्थान के लिये समर्पित नानाजी की प्रशंसा करते हुए कलाम ने कहा कि नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं उसे देखकर अन्य लोगों की भी आँखें खुलनी चाहिये.

कर्मयोगी नानाजी ने 27 फ़रवरी, 2010 को अपनी कर्मभूमि चित्रकूट में भारत के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय (जिसकी स्थापना उन्होंने खुद की थी) में रहते हुए अंतिम सांस ली. उन्होंने देह दान का संकल्प पत्र बहुत पहले ही भर दिया था. अतः देहांत के बाद उनका शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को दान दे दिया.

दधीचि देह दान समिति’ के अध्यक्ष आलोक कुमार के अनुसार- ‘नानाजी ने सन् 1997 में इच्छा जताई थी कि उनकी मृत्यु के पश्चात् उनकी देह का उपयोग चिकित्सा शोध कार्य के लिए किया जाए. उनकी इच्छा के अनुसार 11 अक्टूबर, 1997 को देहदान की एक वसीयत तैयार की गई, जिस पर उन्होंने साक्षी के रूप में श्रीमती कुमुद सिंह तथा हेमंत पाण्डे की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए थे. दोनों को नानाजी अपना पुत्र व पुत्री मानते थे. आलोक कुमार ने बताया कि उनके हर अंग का देशहित में उपयोग हो, यही उनकी अंतिम इच्छा थी. कुमार ने कहा कि हमने यह निश्चित किया था कि मृत्यु के पश्चात् नानाजी की देह को दिल्ली स्थित ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ में शोध कार्य के लिए दिया जाएगा. उन्होंने भावविह्वल होकर बताया कि नानाजी प्रवास पर रहते थे, ऐसे में मृत्यु होने पर उनकी पार्थिव देह दिल्ली लाने में कोई व्यवधान न हो, इस हेतु नानाजी ने दधीचि देहदान समिति को 11,000 रुपए दिए, उनका कहना था कि मैं हमेशा प्रवास पर रहता हूँ, इसलिए मेरी मृत्यु कहीं भी हो सकती है. यह रुपए मेरी देह को कहीं से भी दिल्ली पहुँचाने की व्यवस्था के लिए हैं.

ऐसे थे भारतमाता के अमर सपूत नानाजी देशमुख.जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में खपा दिया. सच्चे अर्थों में देखा जाए तो नाना जी न सिर्फ भारतरत्न हैं बल्कि वह ईश्वर की वो अनमोल कृति थे, जिन्हें विशेष प्रयोजन के लिए ईश्वर ने पावन भारतभूमि पर भेजा था. जन्मजयन्ती पर शत-शत नमन नानाजी.. सुदर्शन हमेशा आपके पदचिन्हों पर चलता रहेगा.


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