20 जनवरी- 1857 से पहले ही भड़की थी बस्तर में क्रांति की ज्वाला और कई अंग्रेजों का वध कर आज ही अमर हो गए थे बलिदानी गेंदसिंह.. बस्तर के नक्सली इतिहास पढ़ें इनका

ऐसे अनंत बलिदानी हैं जिनके पराक्रम से ये समाज परिचित नही हूँ..असल मे इनके कार्य उस गाने को चुनौती दे रहे थे जो लोगों को बड़ी मेहनत से रटाये गए थे.. इनका शौर्य असल मे प्रश्नचिंह है उस गाने पर जिस में आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल के मिलने की बात कही गयी थी.. इनके पराक्रम से चरखे आदि की भी बातें झूठी साबित हो जातीं..इसीलिए इनका नाम लेना उन तथाकथित कलमकारों व स्वघोषित इतिहासकारों ने उचित नही समझा जिन्होंने भारत के इतिहास को लिखने के बाद उसको सेकुलर सरकार की प्रमाणिकता के साथ किताबों में छपवा लिया और बन बैठे भारत के भाग्य विधाता .. वो एक बार भी ये बताने को तैयार नहीं होते की उन किताबों को आज अमरता प्राप्त करने वाले वीर बलिदानी गेंदसिंह का नाम क्यों नहीं है ..

छत्तीसगढ़ राज्य का एक प्रमुख क्षेत्र है बस्तर। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चालों से बस्तर को अपने शिकंजे में जकड़ लिया था। वे बस्तर के वनवासियों का नैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण कर रहे थे। इससे वनवासी संस्कृति के समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा था। अतः बस्तर के जंगल आक्रोश से गरमाने लगे। उन दिनों परलकोट के जमींदार थे श्री गेंदसिंह। वे पराक्रमी, बुद्धिमान, चतुर और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। उनकी इच्छा थी कि उनके क्षेत्र की प्रजा प्रसन्न रहे। उनका किसी प्रकार से शोषण न हो। इसके लिए वे हर सम्भव प्रयास करते थे; पर इस इच्छा में अंग्रेजों के पिट्ठू कुछ जमींदार, व्यापारी और राजकर्मचारी बाधक थे। वे सब उन्हें परेशान करने का प्रयास करते रहते थे।

जब अत्याचारों की पराकाष्ठा होने लगी, तो श्री गंेदसिंह ने 24 दिसम्बर, 1824 को अबूझमाड़ में एक विशाल सभा का आयोजन किया। सभा के बाद गाँव-गाँव में धावड़ा वृक्ष की टहनी भेजकर विद्रोह के लिए तैयार रहने का सन्देश भेजा। वृक्ष की टहनी के पीछे यह भाव था कि इस टहनी के पत्ते सूखने से पहले ही सब लोग विद्रोह स्थल पर पहुँच जायें। 4 जनवरी, 1825 को ग्राम, गुफाओं और पर्वत शृंखलाओं से निकल कर वनवासी वीर परलकोट में एकत्र हो गये। सब अपने पारम्परिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे।

वीर गेंदसिंह ने सबको अपने-अपने क्षेत्र में विद्रोह करने को प्रेरित किया। इससे थोड़े ही समय में पूरा बस्तर सुलग उठा। सरल और शान्त प्रवृत्ति के वनवासी वीर मरने-मारने को तत्पर हो गये। इस विद्रोह का उद्देश्य बस्तर को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त कराना था। स्थान-स्थान पर खजाना लूटा जाने लगा। अंग्रेज अधिकारियों तथा राज कर्मचारियों को पकड़कर पीटा और मारा जाने लगा। सरकारी भवनों में आग लगा दी गयी। शोषण करने वाले व्यापारियों के गोदाम लूट लिये गये। कुछ समय के लिए तो ऐसा लगा मानो बस्तर से अंग्रेजी शासन समाप्त हो गया है।

इससे घबराकर अंग्रेज प्रशासक एग्न्यू ने अधिकारियों की एक बैठक में यह चुनौती रखी कि इस विद्रोह को कौन कुचल सकता है ? काफी देर तक बैठक में सन्नाटा पसरा रहा। गेंदसिंह और उनके वीर वनवासियों से भिड़ने का अर्थ मौत को बुलाना था। अतः सब अधिकारी सिर नीचे कर बैठ गये। एग्न्यू ने सबको कायरता के लिए फटकारा। अन्ततः चाँदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेबे ने साहस कर इस विद्रोह को दबाने की जिम्मेदारी ली और एक बड़ी सेना लेकर परलकोट की ओर प्रस्थान कर दिया।

वनवासियों और ब्रिटिश सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ। एक ओर आग उगलती अंग्रेज सैनिकों की बन्दूकें थीं, तो दूसरी ओर अपने धनुषों से तीरों की वर्षा करते वनवासी। बेचारे वनवासी इन आधुनिक शस्त्रों के सम्मुख कितनी देर टिक सकते थे ? फिर भी संघर्ष जारी रहा। 20 जनवरी, 1825 को इस विद्रोह के नेता और परलकोट के जमींदार गेंदसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।

कैप्टन पेबे इतना डरा  था कि उसने उन्हें बड़े अधिकारियों के सामने प्रस्तुत करने या न्यायालय में ले जाने का जोखिम उठाना भी उचित नहीं समझा। उसने उसी दिन श्री गेंदसिंह को उनके महल के सामने ही फाँसी पर चढ़ा दिया। वीर गेंदसिंह का यह बलिदान छत्तीसगढ़ की ओर से स्वतन्त्रता के लिए होने वाला प्रथम बलिदान था.. आज वीरता के उस प्रतिमूर्ति गेंदसिंह को उनके बलिदान दिवस पर शत शत नमन करते हुए उनके गौरवगान को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार दोहराता है ..साथ ही सवाल करता है भारत का इतिहास अपनी कलम से लिखने वाले उन तथाकथित इतिहासकारों से की उन्हें बलिदान की इस हस्ती से ऐसी क्या दिक्कत थी जो उनके लिए एक भी शब्द प्रमुखता से लिखना उन्हें गंवारा नही लगा .

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