24 मार्च- स्वतंत्रता के बाद भी आज ही नेहरु ने माऊंटबेटन को बना दिया था भारत का गवर्नर जनरल लेकिन जिन्ना ने उसी माऊंटबेटन को दूर रखा पाकिस्तान से - Hindi News, हिंदी समाचार, Samachar, Breaking News, Latest Khabar -

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24 मार्च- स्वतंत्रता के बाद भी आज ही नेहरु ने माऊंटबेटन को बना दिया था भारत का गवर्नर जनरल लेकिन जिन्ना ने उसी माऊंटबेटन को दूर रखा पाकिस्तान से


आज इतिहास का वो दिन है जो मंथन योग्य है भले ही उस समय इस पर विचार भी आपत्तिजनक माना गया. वह सर्वविदित है कि पं. नेहरू तथा माउन्टबेटन के परस्पर विशेष सम्बंध थे, जो किसी भी भारतीय कांग्रेसी या मुस्लिम नेता के आपस में न थे। नेहरू के प्रयासों से ही माउन्टबेटन को स्वतंत्र भारत का पहला गर्वनर जनरल बनाया गया, जबकि जिन्ना ने माउन्टबेटन को पाकिस्तान का पहला गर्वनर जनरल मानने से साफ इन्कार कर दिया, जिसका माउन्टेबटन को जीवन भर अफसोस भी रहा।

माउन्टबेटन 24 मार्च, 1947 से 30 जून, 1948 तक भारत में रहे। इन पन्द्रह महीनों में वह न केवल संवैधानिक प्रमुख रहे बल्कि भारत की महत्वपूर्ण नीतियों का निर्णायक भी रहे।  नेहरू उन्हें सदैव अपना मित्र, मार्गदर्शक तथा महानतम सलाहकार मानते रहे।  नेहरू की शख्सियत को डिकी और एडविना दोनों ही पसंद करते थे और शायद इसका फायदा आज के हिंदुस्तान को विभाजन के वक्त भी मिला. जब बात कश्मीर पर आकर रुकी, तब एडविना ने एक अहम किरदार निभाया.

मॉर्गन जेनेट ने अपनी किताब ‘एडविना माउंटबेटन: अ लाइफ ऑफ़ हर ओन’ में लिखा है कि वे नेहरू को समझाने मशोबरा – एक हिल स्टेशन – ले गईं. इस वाकये को एडविना ने अपनी चिट्ठी में क़ुबूल किया है, ‘तुम्हें (जवाहर ) मशोबरा ले जाकर तुमसे बात करना मेरा जूनून बन गया है.. नेहरू और एडविना का रिश्ता माउंटबेटन की जिंदगी के सबसे बड़े काम यानी विभाजन को आसान बना रहा था. वे यह भी समझते थे कि नेहरू के लिए एडविना उन्हें छोड़ नहीं सकतीं. इसलिए कहीं न कहीं वे इसे बढ़ावा भी दे रहे थे.

ब्रिटिश इतिहासकार फिलिप जिएग्लर ने माउंटबेटन की जीवनी में एक चिट्ठी का जिक्र किया है जो डिकी ने अपनी बेटी पेट्रिशिया को लिखी थी. इसमें उन्होंने लिखा था – ‘तुम किसी से इसका ज़िक्र न करना पर यह हक़ीक़त है कि एडविना और जवाहर एक साथ बड़े अच्छे दिखते हैं और दोनों एक-दूसरे पर अपना स्नेह भी व्यक्त करते हैं. मैं और पामेला (उनकी दूसरी बेटी) वह सब कुछ कर रहे हैं जो उनकी मदद कर सकता है. मम्मी इन दिनों काफ़ी खुश रहती हैं…’ भारत विभाजन के बाद भी आखिरकार नेहरु ने भारत का पहला गर्वनर जनरल माऊंटबेटन को बनाया और बहुसंख्यक जनता से उन्हें लार्ड जैसे शब्द सम्बोधित करवाते रहे.

लेकिन वहीँ जिन्ना की कहानी इस से एकदम उलट थी. जिन्ना ने माऊंटबेटन को सीधा सा जवाब दिया जिसके बाद वो पाकिस्तान से दूर रहे. इस मामले में भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ में विशेष सचिव रहे और पाकिस्तान के शासकों पर किताब ‘पाकिस्तान एट द हेल्म’ लिखने वाले तिलक देवेशर बताते हैं, ‘1947 में भारत पाकिस्तान की आज़ादी से एक महीने पहले लॉर्ड माउंटबेटन ने जिन्ना को भारत पाकिस्तान के संयुक्त गवर्नर जनरल के लिए राज़ी करने की कोशिश की थी.’

इस मामले में मोहम्मद अली जिन्ना की दलील थी कि अगर आप पाकिस्तान के गवर्नर जनरल बनते हैं तो आपका अधिकार क्षेत्र सीमित हो जाएगा. जिन्ना का जवाब था, आप उसकी फ़िक्र मत करिए. मेरा प्रधानमंत्री वहीं करेगा जो मैं कहूँगा. मैं उन्हें सलाह दूंगा और वो उस पर अमल करेंगे.’ यहाँ तक कि सत्ता के हस्तांतरण के समय जिन्ना ने ख़्वाहिश प्रकट की थी कि उनकी कुर्सी लार्ड माउंटबेटन की कुर्सी के ऊपर रखी जाए. आज उस इतिहास को सुदर्शन न्यूज़ आप सभी के आगे रखते हुए बीते कल से सबक लेने की आशा करता है.


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