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28 मार्च- आज अमरता को प्राप्त हुए थे दो भाई नीलाम्बर- पीताम्बर अंग्रेजों से लड़ कर. क्यों छिपाया गया हमसे, हमारे ही इन पूर्वजों का गौरवशाली इतिहास ?


भले ही लाख ढोल पीटा गया हो बिना खड्ग बिना ढाल का और लाख किताबें लिख डाली गयी हों चरखे की महिमा पर लेकिन सच्चाई कब तक छिपती . वो सच जिसे झोलाछाप इतिहासकारों और बिके हुए कलमकारों ने दबा कर रखा वो एक एक कर के सामने लाने का उत्तरदायित्व एक धर्म कार्य समझ कर सुदर्शन न्यूज ने उठाया है और वो उन तमाम बलिदानियों को दुनिया के आगे लाएगा जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान इस देश की स्वतंत्रता और अखंडता को बनाए रखने के लिए दिया था .. उन तमाम वीर बलिदानियों में से एक हैं नीलाम्बर और पीताम्बर जिनके बारे में शायद कोई जानता भी न हो ..

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भले ही झोलाछाप इतिहासकारों ने अपनी हर साजिश को आजमाया हो सत्य को दबाने के लिए लेकिन जब जब स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होगी तब तब पलामू की धरती पर जन्मे वीर और अमरता प्राप्त बलिदानी नीलांबर और पीतांबर का नाम जरूर आएगा .बलिदानी नीलांबर-पीतांबर बड़े पराक्रमी धीर-वीर तथा प्रबल राष्ट्रभक्त थे. इनके पिता चेमु सिंह बड़े ही पराक्रमी जागीरदार थे. इनका बनाव कंपनी सरकार से कभी नहीं था, इसके बावजूद कंपनी सरकार ने इन्हें नाम मात्र के शुल्क पर दाे जागीरें उपलब्ध करवा रखी थीं, ताकि खरवार जाति के पराक्रमी जागीदार काे शांत रखा जा सके. नीलांबर-पीतांबर के नेतृत्व में पूरे पलामू में विद्राेह की ज्वाला धधक रही थी.

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स्वतंत्रता सेनानियों काे स्थानीय जागीरदाराें तथा अन्य लाेगाें का समर्थन प्राप्त था. कहा जाता है कि इनका संपर्क रांची के प्रमुख क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ शाही एवं पांडेय गणपत राय से बना रहता था, जिससे घबराकर कमिश्नर डालटन ने मद्रास इंफेंट्री के 140 सैनिक, रामगढ़ घुड़सवार की छाेटी टुकड़ी तथा पिठाैरिया परगणैत के नेतृत्व में उसके कुछ बंदुकची के साथ 16 जनवरी 1858 काे पलामू के लिए कूच किया. वह 21 जनवरी काे मनिका पहुंच कर ले. बाद में यही ग्राहम से मिला एवं दूसरे दिन पलामू किला से विद्राेह का संचालन कर रहे नीलांबर-पीतांबर पर चढ़ाई कर दी. सैन्य क्षमता अधिक हाेने के कारण नीलांबर-पीतांबर काे पलामू किला छाेड़ना पड़ा. किला छाेड़ने के समय विद्राेही अपना ताेप, भारी मात्रा में गाेला बारूद, असबाव, रसद एवं मवेशी अपने साथ नहीं ले जा सके. ले. डाल्टन काे वहां बाबू कुंवर सिंह की एक चिट्ठी मिली.

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निलांबर एवं नकलाैत मांझी के नाम लिखे इस पत्र में बाबू कुंवर सिंह ने अविलंब सहयाेग करने की बात लिखी थी. इससे घबरा कर डाल्टन ने कुंवर सिंह से मदद मिलने से पूर्व ही विद्राेहियाें काे कुचल देने की रणनीति बनायी. कमिश्नर डाल्टन ने लेस्लीगंज में रुक कर युद्ध की तैयारी किया. उसने युद्ध के लिए गाेला-बारूद तथा रसद जुटाये साथ ही क्षेत्रीय जागीरदाराें काे सैन्य सहायता उपलब्ध कराने का हुक्म दिया. अफ़सोस की बात ये रही कि अंग्रेजों के आगे तमाम जमीदार जयचंद की भूमिका में आ गये और बहुत सारे जागीरदार ने अंग्रेजों के उस आदेश का पालन कर के देश के इतिहास में कलंक के रूप में दर्ज हो गये लेकिन उसी समय पलामू राजा से संबंध रखनेवाले प्रमुख चेराे जागीरदार भवानी बक्स राय ने नीलांबर-पीतांबर का समर्थन करते हुए डाल्टन का आदेश नहीं माना. 10 फरवरी काे घाटी के हरिनामाड़ गांव में विद्राेहियाें द्वारा विराेधियाें पर कार्रवाई करने की खबर पर डाल्टन ने ले. ग्राहम काे रामगढ़ सेना एवं देव राजा के सैनिकाें के साथ हरिनामाड़ भेजा.

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