4 मार्च- गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े 70 देशभक्तों का आज गुरुद्वारे में हुआ था नरसंहार.. उन 70 बलिदानियों का इतिहास में नाम क्यों नहीं ?

क्या देशभक्ति को भी 2 तराजू से तौला जा सकता हूं, क्या राष्ट्र प्रेम का भी कोई पैमाना हो सकता है.. यकीनन आपका ही नही सबका जवाब होगा कि कतई नहीं..लेकिन ऐसा न जाने कौन सा मीटर था एक समय कुछ आज़ादी के तथाकथित ठेकेदारों के पास कि वो नाप लिया करते थे कि इसको राष्ट्रप्रेमी की लिस्ट में डालना है या नहीं .. मसलन सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, खुदीराम बोस, उधम सिंह, मदनलाल ढींगरा, मंगल पांडेय आदि उनके हिसाब महान देशभक्तो में नही रहे होंगे क्योंकि उन्होंने उनके हिसाब से काम नही किया..और वो अहिंसा के नए रास्ते को त्याग कर के हथियार उठा लिए थे जो कुछ लोगों को किसी भी सूरत में नागवार गुजरा था ..

लेकिन उनके साथ क्यों दोगलापन दिखाया गया जो उनके ही राह पर, उनके ही साथ चल रहे थे ? उन्हें क्यों नही समान सम्मान दिया गया जो अहिंसा की राह पर चलते हुए पलट कर एक पत्थर भी नहीं फेंके और खुद का बलिदान उनके कहने पर इसलिए दे दिया कि ऐसा करने से आज़ादी आएगी.. सिर्फ जलियांवाला बाग नरसंहार को प्रसिद्धि शायद इसलिए मिली क्योंकि उसका बदला उधम सिंह ने लन्दन जा कर ले लिया था.. लेकिन उसके बाद उधम सिंह के साथ जो सलूक किया गया वो रुला देने के लिए काफी है.. ये सलूक किसी और ने नही बल्कि खुद भारत के ही आज़ादी के ठेकेदारों ने किया था.. आज अर्थात 4 मार्च 1921 को भी एक बहुत बड़ा नरसंहार हुआ था लेकिन उनकी आवाज को दबा दिया गया और शायद ही किसी को ये पल याद हो कि आज अहिंसा की राह पर चलते राष्ट्र के 70 बलिदानियों ने अपने प्राण इस देश की आज़ादी के लिए त्याग दिए थे ..

पाकिस्तान का ननकाना साहिब गुरुद्वारा सिखों के सबसे अहम तीर्थ स्थलों में से एक है। आज से करीब 97 साल पहले अंग्रेजों ने यहां भयानक नरसंहार को अंजाम दिया था, जिसमें 70 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। पंजाब प्रांत के ननकाना साहिब जिले में मौजूद ये गुरुद्वारा सिखों के पहले गुरु यानी गुरु नानक के नाम पर है। उनका जन्म इसी शहर में हुआ था.. बात 1921 की है, जब देश में अंग्रेज शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू ही हुआ था। ननकाना साहिब गुरुद्वारे में स्थानीय लोगों ने मिलकर शांतिपूर्ण ढंग से एक सभा का आयोजन किया था। सभा चल ही रही थी कि ब्रिटिश सैनिक यहां पहुंच गए और गोलियां चला दीं। सभा में मौजूद 70 लोगों की जान गई। इस गोलीबारी की बहुत निंदा हुई थी. इस गोली को चलवाने वाले ब्रिटिश अफसर का कभी उतना विरोध नही किया गया कुछ आज़ादी के ठेकेदारों द्वारा जितना उन्होंने राष्ट्र के लिए एक एक सांस दे देने वाले सुभाषचंद्र बोस का किया था .. सत्ता की भूख भी ऐसी रही कि बंटवारे के बाद उस पवित्र व देशभक्तो के खून से सिंचित भूमि को पाकिस्तान को सौंप दिया गया था..

सन 1921 में अंग्रेज अफसर रीडिंग को भारत का वायसराय बनाए जाने पर दमनचक्र और बढ़ गया था.. ये ध्यान रखने  योग्य है कि इसी रीडिंग को भारत के कुछ कथित आज़ादी के ठेकेदार लार्ड कह कर बुलाया करते थे..सिवाय हथियार उठा चुके क्रांतिकारियों को छोड़ कर.. जलियांवाला बाग हत्याकांड के 2 साल के अंदर ही हुए इस हत्याकांड के बाद अंग्रेज सरकार के खिलाफ प्रदर्शन और भी हिंसक हो गए।यद्द्पि इसके बाद भी भारत वालों स्व शांति , प्रेम, भाईचारे, अहिंसा आदि की अपील होती रही और बताया जाता रहा कि उनकी गोलियों के आगे पलट कर तुम एक पत्थर भी मत मारो क्योंकि ऐसे ही आज़ादी आती है ..यद्द्पि आज़ादी के धर्मयुद्ध में बलिदान हुए उन सभी 70 बलिदानियों का नाम और पता तक ठीक से नही उजागर किया भारत के तथाकथित कलमकारों ने और उसके बाद उन्हें गुमनाम रखा गया.. ऐसा उन कलमकारों व इतिहासकारों ने क्यों किया ये समझ से परे है लेकिन इतना तो तय है कि उनकी कलम ने न्याय नही किया .. आज असहयोग आंदोलन में बलिदान हुए उन सभी 70 राष्ट्रभक्तों को उनके बलिदान दिवस पर बारंबार नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सुदर्शन परिवार सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है ..

 

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