24 सितंबर: बलिदान दिवस वीरांगना प्रीतिलता वादेदार, जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ते हुए मात्र 21 वर्ष की आयु में दिया बलिदान.. सोचिये आजादी चरखे व अहिंसा से मिली या फिर ऐसे बलिदानों से ?

ये भारत की वो गुमनाम बलिदानी वीरांगना हैं जिनके गुमनामी के दोषी अंग्रेजो से ज्यादा वो नकली कलमकार हैं जिन्होंने इतिहास को मात्र कुछ गिने चुने लोगों की जागीर बना कर सैकड़ो पन्नों की मोटी मोटी किताबें मात्र 2 या 3 लोगों के ऊपर ऐसे लिख डाली कि उनके अलावा इस देश में कोई क्रांतिकारी ही नहीं था या फिर सिर्फ वहयी इस देश के भाग्य विधाता थे. ये एक साजिश है देशवासियों के विरुद्ध उन्हें उनके सच्चे वीरों की स्मृति से दूर रख कर उनके बारे में सीमित रखने की जिसके बाद उन्हें क्रांति नही बल्कि वो अदृश्य शांति दिखे जो असल मे होती ही नही है.

उन साजिशों के शिकार हुए तमाम ज्ञात अज्ञात क्रांतिकारियों में से एक हैं आज ही अमरता को प्राप्त करने वालीं भारतमाता की बेटी  प्रीतिलता वादेदार जी. प्रीतिलता वादेदार भारतमाता की वो वीरांगना बेटी थीं जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की आयु में इस हिंदुस्तान को अंग्रेजी गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था. प्रीतिलता का जन्म 1911 में गोलपाड़ा (चटगांव, वर्तमान बांग्लादेश) के एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहां लड़कियों की शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता था. उसके भाइयों को पढ़ाने के लिए घर में एक शिक्षक प्रतिदिन आते थे. प्रीतिलता भी जिदपूर्वक वहां बैठने लगी.

कुछ ही समय में घर वालों के ध्यान में यह आ गया कि प्रीतिलता पढ़ने में अपने भाइयों से अधिक तेज है। तब जाकर उसकी पढ़ाई का विधिवत प्रबन्ध किया गया. अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार ने उनके मन में स्वाधीनता की आग सुलगा दी. कोलकाता में स्नातक की पढ़ाई करते समय उन्होंने ‘छात्र संघ’ तथा ‘दीपाली संघ’ नामक दो क्रांतिकारी दलों की सदस्यता लेकर तलवार, भाला तथा पिस्तौल चलाना सीखा. स्नातक कक्षा पूर्ण कर वे चटगांव के नंदन कानन हाई स्कूल में अध्यापक और फिर प्रधानाध्यापक हो गयीं. उन दिनों विद्यालय में प्रार्थना के समय बच्चे ब्रिटिश सम्राट के प्रति निष्ठा की शपथ लेते थे; पर प्रीतिलता उन्हें भारत माता के प्रति निष्ठा की शपथ दिलवाने लगीं.

यहाँ शिक्षक की नौकरी उन्होंने इसलिए की ताकि परिवार का गुजारा ठीक से हो सके लेकिन उनकी दृष्टि में केवल कुटुंब ही नहीं था, पूरा देश था, देश की स्वतंत्रता थी. इसी दौरान उनका सम्पर्क क्रांतिवीर मास्टर सूर्यसेन से हुआ. प्रीतिलता जब सूर्यसेन से मिली तब वे अज्ञातवास में थे. उनका एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था. उनको फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी. उनसे मिलना आसान नहीं था लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली और किसी अधिकारी को उन पर सशंय भी नहीं हुआ. यह था, उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण.

इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व वाली इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बन गईं तथा शिक्षक की नौकरी छोड़ दी. अब वह पूरा समय क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाने लगीं।. मास्टर सूर्यसेन के आदेश पर कई बार वह वेश बदलकर जेल जाती थीं और वहां बंद क्रांतिकारियों से संदेशों का आदान-प्रदान करती थीं.

पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था. घिरे हुए क्रान्तिकारियो में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे. सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया. अपूर्वसेन और निर्मल सेन अंग्रेजों से लड़ते हुए बलिदान हो गये तो वहीं अंग्रेजी कैप्टन कामरान मारा गया. इस दौरान सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते-लड़ते वहां से बच निकले. प्रीतिलता ने साहसपूर्वक गोली चलाते हुए स्वयं को तथा अपने नेता को भी बचा लिया. क्रांतिकारी सूर्यसेन पर 10 हजार रूपये का इनाम घोषित था.

सूर्यसेन ने अपने साथियो का बदला लेने की योजना बनाई. योजना यह थी की पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच – गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए. प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी वह पहुचे. प्रीतिलता बचाव की अपेक्षा आक्रमण को अधिक अच्छा मानती थीं. अंग्र्रेज अधिकारी वहां एकत्र होकर खाते, पीते और मौजमस्ती करते हुए भारतीयों के दमन के षड्यन्त्र रचते थे. मास्टर सूर्यसेन ने शैलेश्वर चक्रवर्ती को इस हमले की जिम्मेदारी दी; पर किसी कारणवश यह अभियान हो नहीं सका. इस पर प्रीतिलता ने स्वयं आगे बढ़कर इस काम की जिम्मेदारी ली.

24 सितम्बर, 1932 की रात में यूरोपियन क्लब में एकत्र हुए अंग्रेज अधिकारी आमोद-प्रमोद में व्यस्त थे. प्रीतिलता के नेतृत्व में सैनिक वेशभूषा में भारतीय क्रांतिकारी दल वहां पहुंचा. हथियारों से लैस प्रीतिलता ने पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था. पूरी तैयारी के साथ वह क्लब पहुची. बाहर से खिड़की में बम लगाया. क्लब की इमारत बम के फटने और पिस्तौल की आवाज़ से कापने लगी. नाच – रंग के वातावरण में एकाएक चीखे सुनाई देने लगी. 13 अंग्रेज जख्मी हो गये और बाकी भाग गये. इस युद्ध में एक अंग्रेज की मौत भी हो गई.

इस दौरान अंग्रेजों की तरफ से प्रीतिलता तथा उनके साथी क्रांतिकारियों पर भी गोलियां बरसाईं जा रही थीं. अंग्रेजों की कई गोलियां प्रीतिलता को भी लगी. वे घायल अवस्था में भागीं तथा फिर पडीं. जब प्रीतिलता ने देखा कि उनका बचना असंभव है तथा उनके कारण क्रांतिकारी दल पर संकट आ सकता है, तो उन्होंने सभी साथियों को लौट जाने का आदेश दिया. उन्होंने अपने साथी क्रांतिवीरों से कहा कि वह वो सभी यहां से चले जाएँ तथा भारतमाता को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए लड़ाई को जारी रखें. उनके साथियों ने उन्हें अकेला छोड़ जाने से इंकार कर दिया तथा उनके साथ ही बलिदान देने की बात कही.

घायल अवस्था में पड़ी वीरांगना प्रीतिलता ने क्रांतिकारियों को समझाया कि उनको देश की स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखने के लिए यहां से जाना ही होगा तथा अगली बार और अधिक तैयारी के साथ अंग्रेजों पर हमला करना होगा. प्रीतिलता ने साथियों को समझाया कि वो सभी जाएँ तथा नए सिरे से अंग्रेजों का संहार करें तभी उनको संतुष्टि मिलेगी. फिर भी जब उनके साथी नहीं मानते दिखे तो प्रीतिलता अपनी जेब में रखी साइनाइड की गोली मुंह में रखकर आत्मोसर्ग के पथ पर चल पड़ीं. इस तरह  प्रीतिलता ने मात्र 21 वर्ष की आयु में राष्ट्र की सेवा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दे दिया.

आज आज़ादी की महानतम शक्तिपुंज वीरांगना प्रीतिलता को उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार बारंबार नमन करता है तथा उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प दोहराता है ..साथ ही उन नकली कलमकारों से सवाल करता है कि उन्होंने ऐसी शूरवीर वीरांगना को इतिहास में में उचित सम्मान व स्थान क्यों नहीं दिया ? आजादी का ठेकेदार कुछ कथित लोगों को ही क्यों बना दिया   आखिर क्यों 21 वर्ष की आयु में बलिदान देने वाली शक्तिस्वरूपा भारतपुत्री प्रीतिलता के बलिदान को देश के लोगों से  छिपाया गया.

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