22 दिसंबर – बलिदान दिवस क्रांतिवीर तारकनाथ दास. जब देश मे कुछ के द्वारा गाये जा रहे थे अहिंसा के तराने तब PHD उपाधि धारक ये वीर विदेश में जमा कर रहा था हथियार

इनके वंशज कभी नही आये आज़ादी की ठेकेदारी लेने.. ये तो जन्म ही लिए थे भारत मां की सेवा करने के लिए और आखिरकार उन्होंने इस कर्तव्य को बाखूबी निभाया भी.. कुछ आज़ादी के नकली ठेकेदारों की तरह न किसी से ये गिला कि उन्हें चुनाव में सीटें कम क्यों जिताई या किसी से ये शिकवा भी नहीं कि उन्हें प्रधानमंत्री पद पर क्यों नहीं बिठाया.. और तो और कभी ये परिवार टी वी तो दूर रेडियो पर भी नही दिखे ये बताते हुए कि स्वतंत्रता के असल हकदारों में उनके महान पूर्वज का भी नाम होना चाहिए था .. यहां तक कि उन्होंने एक या दो लोगों के आस पास भटकते इतिहास लिखने वालों को भी माफ कर दिया क्योंकि वो समझ गए होंगे कि उनके शब्द राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा से नहीं बल्कि पेट पालने की प्रेरणा से लिखे गए हैं ..और वही सत्य अब देश भी समझ रहा..

आज ही बलिदान हुए महान क्रांतिकारी तारक नाथ भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में से एक गिने जाते हैं। अरविन्द घोष, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा चितरंजन दास इनके घनिष्ठ मित्रों में से थे। क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण इन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी, लेकिन बाद में पुन: अध्ययन प्रारम्भ कर इन्होंने पी.एच. डी. की उपाधि प्राप्त की थी। तारकनाथ दास पर अमेरिका में मुकदमा चला था, जहाँ इन्हें क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी।

तारकनाथ दास का जन्म 15 जून, 1884 ई. में बंगाल के 24 परगना ज़िले में हुआ था। तारकनाथ दास बड़े प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। छात्र-जीवन में ही उनका संपर्क अरविन्द घोष, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और चितरंजन दास जैसे नेताओं से हुआ। देशभक्ति के रंग में रंगे इन नेताओं के सम्पर्क में आकर तारकनाथ दास क्रान्तिकारी आंदोलन में सम्मिलित हो गए और देश के क्रान्तिकारी सिपाही बन गए। उन्होंने अपना अध्ययन बीच में ही छोड़ दिया और ‘अनुशीलन समिति’ तथा ‘युगांतर पार्टी’ के कार्यों में सक्रिय भाग लेने लगे, लेकिन शीघ्र ही अंग्रेज़ पुलिस उनके पीछे पड़ गई। प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ होने पर वे शोध-कार्य के बहाने जर्मनी आ गए और वहाँ से भारत में ‘अनुशीलन पार्टी’ के अपने साथियों के लिए हथियार भेजने का प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने यूरोप और एशिया के अनेक देशों की यात्रा की।

बाद में जब वे अमेरिका पहुँचे तो उनकी गतिविधियों की सूचना अमेरिका को भी हो गई। इस पर तारकनाथ दास पर अमेरिका में मुकदमा चला और उन्हें 22 महीने की क़ैद की सज़ा भोगनी पड़ी। आज ही के दिन अर्थात 22 दिसंबर 1958 को आज़ादी का ये महायोद्धा अपने द्वारा ही स्वतंत्र करवाये गए भारत मे एक गुमनाम मृत्यु को प्राप्त हुआ था जिनके पार्थिव देह पर उस समय के कोई भी बड़े यहां तक कि बहुत बड़े नाम गए भी नहीं थे क्योंकि लोगों को पता चल जाता कि स्वतंत्रता के लिए उनके द्वारा फैलाये गए भ्रम की सच्चाई कुछ लोग तो जरूर जान जाते..यहां तक कि आजादी के बाद 11 साल जीवित रहे इस महावीर को किसी भी बड़े आयोजन में याद तक भी नही किया गया क्योंकि सबकी जुबान ओर था कि आजादी अहिंसा से मिली है जबकि तारकनाथ दास का मार्ग अत्याचारी व अन्यायी के विरुद्ध शस्त्र धारण करने का था..आज आज़ादी के उस महान शक्तिपुंज को उनके बलिदान दिवस पर बारंबार नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार लेता है और देश से सवाल करता है कि वो क्रांतिकारियों का नाम गुमनाम रखने वालों के विरुद्ध क्या सोचते हैं ?

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