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क्या आपको पता है आज है ऐसे क्रांतिकारी का जन्मदिवस जिन्होंने जीवन के 30 साल बिताए जेल में आपके और हमारे लिए

भारत की धरती पर ना जाने कितने ऐसे महापुरूषों ने जन्म लिया है। जिन्होंने अपने देश को ही अपनी जवानी माना, देश को ही अपनी माँ माना, देश को ही अपना सबसे अच्छा दोस्त माना, देश उनके लिए सब कुछ था। उनका एक मकसद था देश को अजाद कराना चाहें उसके लिए उन्हें कुछ भी कीमत चुकानी पड़ी हो। ऐसे महापुरूषों में कुछ ऐसे भी है जिनका अस्तिव वर्तमान की चकाचौंद में ओझल हो गया। ऐसे ही एक संघर्षशील व्यक्तिव त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती जी का आज जन्मदिवस है। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती एक ऐसे देश भक्त थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश के नाम कर दिया था। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती अपने जीवन के तीस वर्ष और वो भी जवानी के उन्होंने देश के नाम कर जेल की कालकोठरी में काट दिये।

अपने जीवन के तीस बसंत जेल में काट देना कोई असान बात नहीं है ये काम वो ही कर सकता है जो अपने देश से सच्चा प्यार करता हो जिसकी हर धड़कन के साथ देश के लिए उसका प्रेम बढ़ता जाता हो। उस व्यक्ति को जीवनदानी कहना ही उचित होगा जिसने जिन्दगी के बेहतरीन तीस वर्ष देश को आजाद कराने के लिये जेल की काल कोठरियों में बिता दिये हो। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती एक ऐसे ही जीवनदानी थे। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ने अपने देश को आजाद कराने के लिये अपनी महत्वाकांक्षओं का त्याग कर दिया और एक ही धैर्य अपनाया, उसे आजीवन निभाया, क्योंकि उनका एक ही सपना था देश की अजादी और अजादी के बाद स्वराज्य और सुराज्य की स्थापना।

पूर्वी बंगाल के मेमनसिंह जिले के किशोरगंज सब डिवीजन के एक ग्राम में 5 मई 1888 में त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती का जन्म हुआ। वे जब स्कूल में थे तभी से ही अपने देश के लिए कुछ करने की तमन्नाएँ उठने लगीं थी। देश को आजाद कराने की चिंता उनके रोम रोम में ज्वार बन प्रबल वेग से उमड़ने लगी थी। बस एक रास्ते की दरकरार थी। वो रास्ता बंगाल के तत्कालीन क्रान्तिकारी अनुशीलन दल ने दिखाया और वे स्वतंत्रता के लिए लड़े जाने वाले लम्बे संग्राम के एक स्थायी सैनिक बन गये।

त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती पढ़ने लिखने में बहुत तेज थे। हमेशा कक्षा में प्रथम आते थे। वो चाहते भी थे कि वे ख़ूब पढ़े पर जब घर में आग लगी हो तो उस समय आग बुझाने के अलावा कुछ और सोच भी नहीं सकता है। ऐसा ही हाल तत्कालीन भारत का था सभी देश को आजाद कराने के लिए कुछ ना कुछ कर रहे थे तो त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती भी अपने भविष्य को भुल कर देश को आजाद कराने के लिए निकल पड़े। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ने अपनी बाल अवस्था से ही कई ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जिन कार्य को बड़े भी करने से पहले दस बार सोचते हो। शीर्घ ही त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती का नाम ब्रिटिश शासन की अधिकारीयों के बीच गुजने लगा। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती को पकड़ने के लिए कई तरह की कोशिश की जाने लगी।

सन् 1902 में त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती को ढाका के निकट गिरफ्तार कर लिया गया। जब त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया गया तब वह इन्टर की परीक्षा देने जा रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बारस्याल षड़यंत्र केस में आजीवन काले पानी की सजा सुनाई। 1913 में उन्हें अण्डमान की काल कोठरियों में नारकीय यातनाएं सहने के लिये भेज दिया गया। पन्द्रह वर्ष तक वे वहाँ पर रहे। वहाँ पर उन्हें तरह तरह की यातनाएं दी गई। कोई और होता तो एक दो दिन में ही इस जीवन को अलविदा कह देता पर त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ने वहाँ पन्द्रह वर्ष बिताने के बाद भी पूरे बयासी वर्ष तक अपने र्दद को सहन किया।

अण्डमान द्वीप भारतवर्ष से अलग एक सागर के बीच में है। उसकी जलवायु इतनी विषम है कि वहाँ पर रहना स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक होता है। अब तो वहाँ लोग रहने भी लगे पर जब वहाँ कोई नहीं रहता था। फिर वहाँ की कालकोठरियों में क्रन्तिकारियों के साथ भी खतरनाक अपराधियों जैसा ही कठोर व्यवहार किया जाता था। कठोर श्रम कराया जाता था और जिसे पशु भी न खाये ऐसा खाना दिया जाता था। दिन में आठ घण्टे कोल्हू पेरने की हाड़ तोड़ मेहनत करने पर खाने को सड़े आटे की रोटियाँ और कीड़ो वाले चावलों का भात मिलता था। ऐसे जगह पर रहने के बाद और भी कई जेलों में रहे और एक दिन यातनाएं झेलते झेलते त्रैलोक्यनाथ चक्रवती इस दुनिया को अलविदा कह गये। ऐसे महापुरूष को शत् शत् नमन।

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