8 फरवरी – क्रान्तिपुत्री कल्पना दत्त पुण्यतिथि… इन्होंने लूट लिए थे अंग्रेजों के हथियार और बांट दिए थे क्रांतिकारियों में

जब जब भारत की आज़ादी की किताबों के अनुसार चर्चा होती है तब तब केवल कुछ लोगों को महिमामण्डित किया जाता है और ऐसे दिखा दिया जाता है कि बाकी तमाम ने जंग लड़ने के बजाय केवल हंसी ठिठोली की रही होगी ..लेकिन सच ये है कि अगर उनका असल इतिहास सामने लाया जाता तो खड्ग ढाल वाले गीत पर सवाल खड़ा हो जाता ..

भगत, बिस्मिल, आज़ाद, खुदीराम जैसे अनंत बलिदानियों के बीच कुछ नाम नारी शक्ति के भी थे लेकिन झोलाछाप व बिकी कलम के इतिहासकार उन्हें आगे लाते तो वो नमक के बजाय उन तलवों का कर्ज शायद न अदा कर पाते जिसे वो चाट कर झूठे सम्मान पाए थे ..वो सम्मान जिसे वो कभी हिन्दू एकता को असहिष्णुता का नाम दे कर बदनाम कर सकें ..

खैर उन्ही तमाम ज्ञान और अज्ञात नारी शक्ति के प्रतीकों में से एक क्रान्तिपुत्री थी आज स्वर्ग सिधार गयी कल्पना दत्त जी जिनकी आज़ाद भारत मे मृत्यु भी रही थी गुमनामी के अंधेरे में क्योंकि ढोल केवल कुछ परिवारों के ही पीटने की अनुमति थी ..यद्द्पि सुदर्शन न्यूज़ बताएगा आपका गौरवशाली इतिहास जिसकी एक अंग हैं बलिदानी कल्पना दत्त जी..

कल्पना दत्त जी का जन्म 27 जुलाई, 1913 को चटगांव (अब बांग्लादेश) के श्रीपुर गांव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। चटगांव में आरम्भिक शिक्षा के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आईं। प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों की जीवनियाँ पढ़कर वह प्रभावित हुईं और शीघ्र ही स्वयं भी कुछ करने के लिए आतुर हो उठीं। 18 अप्रैल, 1930 ई. को ‘चटगांव शस्त्रागार लूट’ की घटना होते ही कल्पना दत्त कोलकाता से वापस चटगांव चली गईं और क्रान्तिकारी सूर्यसेन के दल से संपर्क कर लिया। वह वेश बदलकर इन लोगों को गोला-बारूद आदि पहुँचाया करती थीं। इस बीच उन्होंने निशाना लगाने का भी अभ्यास किया।

कल्पना दत्त जी देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाली महिला क्रांतिकारियों में से एक थीं। उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए क्रांतिकारी सूर्यसेन के दल से नाता जोड़ लिया था। 1933 ई. में कल्पना दत्त पुलिस से मुठभेड़ होने पर गिरफ़्तार कर ली गई थीं। कल्पना और उनके साथियों ने क्रान्तिकारियों का मुकदमा सुनने वाली अदालत के भवन को और जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई। लेकिन पुलिस को सूचना मिल जाने के कारण इस पर अमल नहीं हो सका। पुरुष वेश में घूमती कल्पना दत्त गिरफ्तार कर ली गईं, पर अभियोग सिद्ध न होने पर उन्हें छोड़ दिया गया। उनके घर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया। लेकिन कल्पना पुलिस को चकमा देकर घर से निकलकर क्रान्तिकारी सूर्यसेन से जा मिलीं। सूर्यसेन गिरफ्तार कर लिये गए और मई, 1933 ई. में कुछ समय तक पुलिस और क्रान्तिकारियों के बीच सशस्त्र मुकाबला होने के बाद कल्पना दत्त भी गिरफ्तार हो गईं। मुकदमा चला और फ़रवरी, 1934 ई. में सूर्यसेन तथा तारकेश्वर दस्तीकार को फाँसी की और 21 वर्ष की कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सज़ा हो गई.. यहां ध्यान रखने योग्य है कि कल्पना जी व क्रांतिकारी सूर्यसेन जी को गिरफ्तार करने वाले पुलिसकर्मियों में कई हिंदुस्तानी सिपाही थे जो केवल वेतन और मेडल पाने के लिए अंग्रेजो की रक्षा कर रहे थे ..

जेल से छूटने के बाद उन्होंने सामाजिक कार्य किये और महिलाओं के शसक्तीकरण की दिशा में भी बहुत कार्य किया ..आखिरकार स्वतंत्र भारत मे आज ही के दिन अर्थात 8 फरवरी 1995 में को आज़ादी की ज्वाला मानी जा सकने वाली ये महान क्रान्तिपुत्री एक गुमनाम मृत्यु को प्राप्त हुई उस भारत मे जिसकी स्वतन्त्रता का श्रेय एक प्रकार से कुछ लोगों द्वारा हाईजैक कर लिया गया था …आज उस महान क्रांति की ज्वाला कल्पना दत्त जी को उनकी पुण्यतिथि पर सुदर्शन परिवार का शत शत नमन है और उनकी गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प भी ..

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