राष्ट्रगान के रचेयता साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर सुदर्शन न्यूज परिवार की तरफ से शत् शत् नमन….

जब भी कही पर राष्ट्रगान होता है तो हर भारतीय सभी काम छोड़कर राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा हो जाता है। सभी के दिल में देश के लिए प्रेम उमर आता है। राष्ट्रगान हर भारतीय के जीवन में अहम भूमिका रखता है। आज 7 मई को राष्ट्रगान के रचियेता रवींद्रनाथ टैगोर का जन्मदिवस है। रवींद्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे। रवींद्रनाथ टैगोर मात्र ऐसे भारतीय है जिन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला है।

रवींद्रनाथ टैगोर प्रथम एशियाई और यूरोपीय साहित्यकार थे जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था। वह दुनिया के एक मात्र ऐसे कवि है जिनकी दो रचनांए दो देशों भारत व बांग्लादेश का राष्ट्रगान है। रवींद्रनाथ टैगोर को गुरूदेव के नाम से भी जाना जाता है। गुरूदेव ने बांग्ला साहित्य और संगीत को एक नई दिशा दी। रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय सभ्यता की अच्छाइयों को पश्चिम में ले जाने के लिए प्रभावशाली भूमिका निभाई।

वह राष्ट्रवादी थे और ब्रिटिश राज की भर्त्सना करते हुए देश की आजादी की मांग की। जलियांवाला बाग कांड के बाद उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए गए नाइटहुड का त्याग कर दिया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। गुरुदेव के पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। रविन्द्रनाथ टैगोर अपने माता पिता की तरह संतानों में सबसे छोटे थे। जब गुरुदेव छोटे थे तभी उनकी माँ का देहांत हो गया. गुरुदेव जी के पिता अपने काम से बहार रहते थे, इसलिए गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर का लालन-पालन नौकरों ने किया।

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के सबसे बड़े भाई द्विजेन्द्रनाथ एक दार्शनिक और कवि थे। उनके एक दूसरे भाई सत्येन्द्रनाथ टैगोर इंडियन सिविल सेवा में शामिल होने वाले पहले भारतीय थे। गुरुदेव को पारंपरिक शिक्षा पद्धति उन्हें नहीं भाती थी इसलिए कक्षा में बैठकर पढना पसंद नहीं था। रविंद्रनाथ टैगोर अपने भाई बहनों के साथ अपनी जागीर पर घूमा करते थे। गुरुदेव को शुरू से ही उनके बड़े भाइयों ने पढ़ाया। गुरुदेव ने अपने बड़े भाइयों से इतिहास, भूगोल, साहित्य, गणित, संस्कृत और अंग्रेजी भी सीखा।

रविंद्रनाथ टैगोर ने अपने पिता के साथ भारत भ्रमण भी किया। गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर हिमालय स्थित पर्यटन-स्थल डलहौज़ी पहुच कर इतिहास, खगोल विज्ञान, आधुनिक विज्ञान, संस्कृत, जीवनी का अध्ययन किया और कालिदास के कविताओं की विवेचना की। इसके बाद रविंद्रनाथ जोड़ासाँको लौट आये और सन 1877 तक अपनी कविताओं की रचना की। उनके पिता देबेन्द्रनाथ उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने रविंद्रनाथ को वर्ष 1878 में इंग्लैंड भेज दिया।

उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में लॉ की पढाई के लिए दाखिला लिया पर कुछ समय बाद उन्होंने पढाई छोड़ दी और शेक्सपियर और कुछ दूसरे साहित्यकारों की रचनाओं का स्व-अध्ययन किया। सन 1880 में बिना लॉ की डिग्री के वह बंगाल वापस लौट आये। वर्ष 1883 में उनका विवाह मृणालिनी देवी से हुआ। भारत आने के बाद उन्होंने कई रचनाएँ की। 14 नवम्बर 1913 को रविंद्रनाथ टैगोर को उनके साहित्य में योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। ब्रिटिश सरकार ने रविंद्रनाथ को वर्ष 1915 में नाइटहुड प्रदान किया जिसे रविंद्रनाथ ने 1919 के जलियांवाला बाग कांड के बाद छोड़ दिया।

रविंद्रनाथ ने अपने जीवन के अंतिम 4 साल बड़ी पीड़ा और बीमारी में बिताये। वर्ष 1937 के अंत में वो अचेत हो गए। लगभग तीन सालों के बाद एक बार फिर से वो सही हुए। इस दौरान उन्होंने कई कविताओं की रचना की। इस दौरान लिखी गयीं कविताएं उनकी बेहतरीन कविताओं में से एक हैं। वहीं, लम्बी बीमारी के बाद 7 अगस्त 1941 गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर का निर्धन हो गया।

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