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2 मार्च – पहले सुभाष चन्द्र बोस जी के साथ अंग्रेजो से लड़े, फिर कलम उठा कर चाटुकार इतिहासकारों से लड़े योद्धा पी एन ओक जयंती

इतिहास की लेखनी का वो विकृत समय था जब अकबर जैसे दरिंदो को पूज्यनीय बना कर पेश किया जाता था और भारत के महान व्यक्तित्वों को बौना दिखाया जाता था . अपनी परिपाटी और अपने ही पूर्वजो की धरोहर को विकृत किया जाता रहा और उसके विरुद्ध आवाज उठाने वाले को या तो पागल घोषित कर दिया जाता था और नहीं तो साम्प्रदायिक शक्तियों के रूप में परिभाषित किया जाता था . हैरानी की बात ये थी कि लेनिन की मूर्ति के लिए लड़ना राष्ट्रवाद बताया जाता था लेकिन भगवान श्रीराम के मन्दिर के लिए संघर्ष करने वालों को दंगाई तक बता डाला गया .

जिन मुगलों ने भारत को हवसी की तरह लूटा उनके गुणगान की गाथा को ऐसे पेश किया गया था जैसे वो भारत में विकास करवाने के लिए आये रहे हों . उस समय उस वामपंथी आंधी में एक नाम निकलता था जो इस उलटी धारा के विरुद्ध लड़ा और तमाम विरोधो के बाद भी आख़िरकार अपनी आवाज को जनता तक पहुचाने में सफल रहा . यद्दपि उनको गुमनाम कर दिया गया लेकिन आज उस गुमनाम कलम के सिपाही की जयंती है जिसको आप तक सुदर्शन न्यूज अपनी जिम्मेदारी मान कर पहुचा रहा है .

श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक का नाम राष्ट्रवादी इतिहासकारों में बहुत सम्मानित है। यद्यपि डिग्रीधारी इतिहासकार उन्हें मान्यता नहीं देते थे; क्योंकि उन्होंने इतिहास का विधिवत शिक्षण या अध्यापन नहीं किया था; पर उन्हें ऐसी दृष्टि प्राप्त थी, जिससे उन्होंने विश्व के इतिहास में खलबली मचा दी। उनका जन्म आज ही अर्थात 2 मार्च, सन 1917 को मध्य प्रदेश के इन्दौर नगर में श्री नागेश ओक एवं श्रीमती जानकी बाई के घर में हुआ था। तीन भाइयों में मंझले पुरुषोत्तम ओक की प्रतिभा के लक्षण बचपन से ही प्रकट होने लगे थे। उन्होंने 1933 में मैट्रिक, 1937 में बी.ए., 1939 में एम.ए. तथा 1940 में कानून की परीक्षा मुम्बई विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की।

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होने पर श्री ओक खड़की स्थित सैन्य प्रतिष्ठान में भर्ती हो गये। वहाँ आठ मास के प्रशिक्षण के बाद उन्हें सिंगापुर भेज दिया गया। वहाँ वे जापानियों द्वारा बन्दी बना लिये गये। पर कुछ समय बाद जब भारतीय सैनिकों ने जापान का सहयोग करने का निश्चय किया, तो सभी 60,000 बन्दियों को छोड़ दिया गया। श्री ओक सेगांव (वियतनाम) रेडियो से भारत की स्वतन्त्रता के लिए प्रचार करते रहे। आगे चलकर वे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के निकट सहयोगी बन गये।

स्वतन्त्रता के बाद श्री ओक पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरे। 1947 से 1953 तक वे हिन्दुस्तान टाइम्स एवं स्टेट्समैन के दिल्ली में संवाददाता रहे। 1954 से 1957 तक उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय में प्रचार अधिकारी के नाते कार्य किया। फिर 1959 से 1974 तक दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की सूचना सेवा में उप सम्पादक का काम सँभाला। इन सब कामों के बीच श्री ओक अपनी रुचि के अनुकूल इतिहास विषयक लेखन करते रहे।

श्री ओक का मत था कि भारत में जिन भवनों को मुगलकालीन निर्माण बताते हैं, वह सब भारतीय हिन्दू शासकों द्वारा निर्मित हैं। मुस्लिम शासकों ने उन पर कब्जा किया और कुछ फेरबदल कर उसे अपने नाम से प्रचारित कर दिया। स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने भी सच को सदा दबा कर रखा; पर श्री ओक ने ऐसे तथ्य प्रस्तुत किये, जिन्हें आज तक कोई काट नहीं सका है। श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक ने दो पुस्तकें मराठी में लिखीं। ‘हिन्दुस्थानाचे दुसरे स्वातन्त्रय युद्ध’ तथा ‘नेताजीच्या सहवासाल’। हिन्दी में उनकी पुस्तकें हैं: भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें; विश्व इतिहास के विलुप्त अध्याय; कौन कहता है अकबर महान था; दिल्ली का लाल किला हिन्दू कोट है; लखनऊ के इमामबाड़े हिन्दू राजमहल हैं; फतेहपुर सीकरी एक हिन्दू नगर।

आगरा का लाल किला हिन्दू भवन है; भारत में मुस्लिम सुल्तान (भाग 1 व 2); वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास (4 भाग); ताजमहल मंदिर भवन है; ताजमहल तेजो महालय शिव मन्दिर है; ग्रेट ब्रिटेन हिन्दू देश था; आंग्ल भाषा (शब्दकोश) हास्यास्पद है; क्रिश्चियनिटी कृष्ण नीति है। इनमें ताजमहल का सच उजागर करने वाली किताबें सर्वाधिक लोकप्रिय हुईं। इतिहास श्री ओक का प्रिय विषय था। सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद उन्होंने ‘इन्स्टीट्यूट फाॅर रिराइटिंग वर्ल्ड हिस्ट्री’ नामक संस्था की स्थापना की और उसके द्वारा नये शोध सामने लाते रहे। उनके निष्कर्ष थे कि ईसा से पूर्व सारी दुनिया में वैदिक संस्कृति और संस्कृत भाषा का ही चलन था।  4 दिसम्बर, 2007 को पुणे में उनका देहान्त हुआ।

आज कलम के उस सिपाही पी एन ओक की जयंती पर उनको सुदर्शन न्यूज बारंबार नमन करते हुए भारत के सच्चे इतिहास को स्वर्णिम रूप देने के लिए उनका आभार व्यक्त कर रहा है और उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है . साथ ही वामपंथ की विचारधारा से उठी उन कलमो और उनके कलमकारों से सवाल करता है कि उन्होंने भारत के इतिहास में भारत के सच्चे सपूतों और सच्चे बलिदानियों को कितना स्थान दिया .. ??

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