17 जून: बलिदान दिवस तृतीय सरसंघचालक परमपूज्य बाला साहब देवरस जी.. भारतमाता के वो सपूत जिनका जीवन ज्वलंत प्रेरणा है धर्मपत पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण के कार्यों की

संगठन केवल व्याख्यान से उत्पन्न नहीं होता. उसमें सजीव अंतःकरणों को एक साँचे में ढालना होता है. एक ही ध्येय के लिए, एक ही मार्ग पर चलनेवाले लाखों तरुणों को एक ही सूत्र में बाँधना होता है. यही लक्ष्य लेकर परमपूज्य केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी. अपने ५ साथियों के साथ डॉक्टर हेडगेवार जी ने जिस आरएसएस की स्थापना की थी वो आरएसएस आज दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है जो पूरी तरह से राष्ट्रप्रेम तथा धर्म रक्षा के लिए समर्पित है. आज संघ जिस मुकाम पर, वहां तक संघ को ले जाने में परमपूज्य बालासाहब देवरस जी का अनमोल योगदान है जो आरएसएस के तृतीय सरसंघचालक थे.

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श्री बाला साहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर 1915 को नागपुर में हुआ था. उनके पिता सरकारी कर्मचारी थे और नागपुर इतवारी में आपका निवास था. यहीं देवरस परिवार के बच्चे व्यायामशाला जाते थे 1925 में संघ की शाखा प्रारम्भ हुई और कुछ ही दिनों बाद बालसाहेब ने शाखा जाना प्रारम्भ कर दिया. स्थायी रूप से उनका परिवार मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के आमगांव के निकटवर्ती ग्राम कारंजा का था. उनकी सम्पूर्ण शिक्षा नागपुर में ही हुई. न्यू इंगलिश स्कूल मे उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई. संस्कृत और दर्शनशास्त्र विषय लेकर मौरिस कालेज से बालसाहेब ने 1935 में बीए किया. दो वर्ष बाद उन्होंने विधि (लॉ) की परीक्षा उत्तीर्ण की। विधि स्नातक बनने के बाद बालसाहेब ने दो वर्ष तक ‘अनाथ विद्यार्थी बस्ती गृह’ मे अध्यापन कार्य किया. इसके बाद उन्हें नागपुर मे नगर कार्यवाह का दायित्व सौंपा गया. 1965 में उन्हें सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया जो 6 जून 1973 तक उनके पास रहा.

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संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरू जी के स्वर्गवास के बाद 6 जून 1973 को सरसंघचालक के दायित्व को ग्रहण किया. उनके कार्यकाल में संघ कार्य को नई दिशा मिली. उन्होंने सेवाकार्य पर बल दिया परिणाम स्वरूप उत्तर पूर्वाचल सहित देश के वनवासी क्षेत्रों के हजारों की संख्या में सेवाकार्य आरम्भ हुए. 1937 के पुणे संघशिक्षा वर्ग में बालासाहब मुख्य शिक्षक बनकर गए. उस समय उनकी आयु मात्र 22 वर्ष थी. उन्होंने यह दायित्व उत्तम प्रकार से निर्वाह किया. शिक्षा वर्ग से लौटने के बाद उन्हें नागपुर का कार्यवाह नियुक्त किया गया. 1939 में की ऐतिहासिक सिंदी बैठक में बाला साहब देवरस भी उपस्थित रहे थे. उसके बाद उन्हें प्रचारक के रूप में कलकत्ता भेजा गया. पिताजी नाराज हुए किन्तु माताजी ने स्थिति संभाल ली.

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डाक्टर साहब का स्वास्थ्य अधिक खराब होने के चलते बालासाहब को 1940 में कलकत्ता से वापस बुला लिया गया. देशभर के विभिन्न स्थानों पर प्रचारक भेजने की जिम्मेदारी नागपुर शाखा की ही सर्वाधिक रहती थी, स्वयंसेवक को उस हेतु गढ़ना, किसे कहाँ भेजना यह जिम्मेदारी बाला साहब उत्तम रीति से संभालते थे. डाक्टर जी के निर्देश पर 1937 से 1940 के बीच गुरूजी संघ कार्य में पूरी तरह डूब गए थे. उस समय के नवयुवक कार्यकर्ताओं को नजदीक से देखकर उनकी क्षमता व योग्यताओं का आंकलन श्री गुरूजी ने बहुत बारीकी से किया था. डाक्टर जी का अनुशरण किसने कितनी मात्रा में किया है, यह बात भी गुरूजी के निरीक्षण में आई. इसी भाव को प्रदर्शित करते हुए श्रीगुरूजी ने 1943 के पुणे संघ शिक्षा वर्ग में बाला साहब का परिचय करते हुए कहा कि, “आप लोगों में अनेक स्वयंसेवक ऐसे होंगे जिन्होंने डाक्टर जी को नहीं देखा होगा लेकिन देवरस में डॉक्टर साहब की छबि दिखती है.

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1940 के बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा. इस दौरान उन्होंने नागपुर के काम को आदर्श रूप में खड़ा किया. देश भर के संघ शिक्षा वर्गों में नागपुर से शिक्षक जाते थे. नागपुर से निकले प्रचारकों ने देश के हर प्रान्त में जाकर संघ कार्य खड़ा किया. 1965 में वे सरकार्यवाह बने. शाखा पर होने वाले गणगीत, प्रश्नोत्तर आदि उन्होंने ही शुरू कराये. संघ के कार्यक्रमों में डा0 हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के चित्र लगते हैं. बालासाहब के सरसंघचालक बनने पर कुछ लोग उनका चित्र भी लगाने लगे; पर उन्होंने इसे रोक दिया. यह उनकी प्रसिद्धि से दूर रहने की वृत्ति का ज्वलन्त उदाहरण है.

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1973 में श्री गुरुजी के देहान्त के बाद वे संघ के तृतीय सरसंघचालक बने. 1975 में संघ पर लगे प्रतिबन्ध का सामना उन्होंने धैर्य से किया. वे आपातकाल के पूरे समय पुणे की जेल में रहे, पर सत्याग्रह और फिर चुनाव के माध्यम से देश को इन्दिरा गांधी की तानाशाही से मुक्त कराने की इस चुनौती में संघ सफल हुआ. इस दौरान उन्होंने संघ कार्य में अनेक नये आयाम जोड़े. इनमें सबसे महत्वपूर्ण निर्धन बस्तियों में चलने वाले सेवा के कार्य हैं. इससे वहाँ चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी. स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गयी थी. बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया. मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक उन्होंने यह दायित्व निभाया लेकिन ज्यादा स्वास्थय ख़राब होने पर उन्होंने 1994 में प्रो. राजेन्द्र प्रसाद उर्फ़ रज्जू भैया को संघ का चतुर्थ सरसंघचालक नियुक्त कर दिया. 17 जून 1996 को उनका स्वर्गवास हो गया. आज पूज्य बाला साहब देवरस जी की पुण्यतिथि पर सुदर्शन उनको शत शत नमन करता है तथा उनके आदर्शों पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण का संकल्प लेता है.

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