5 दिसंबर – कांगो की जमीन पर अकेले 40 दुश्मनों को मार गिराते हुए आज ही सदा के लिए अमर हो गए थे कैप्टन गुरुबचन सिंह सलारिया

भारत भूमि पर जन्म लिया वो महायोद्धा जो विदेशी धरती पर जा कर वहां के आतताईयों को सबक सिखाया..इतना ही नही , एक अकेला योद्धा 40 दुश्मनों को मार गिराया और मात्र 16 हिंदुस्तानी जवानों को साथ लेते हुए 100 दुश्मनों को भागने पर मजबूर कर दिया.. उस परमवीर का नाम है कैप्टन गुरुबचन सिंह सलारिया जिनका आज बलिदान दिवस है ..भारत की शान व विदेश में भारत के शौर्य के प्रतीक इस जांबाज़ ने कांगो में आज ही के दिन प्राप्त की थी अमरता और कांगो की धरती आज भी याद करती है उस अद्भुद पराक्रम को , भले ही चरखे आदि के गाने गुनगुनाने वाले कुछ लोग अपने ही देश मे उन्हें भूल चुके हों ..

1935 की बात है, देश अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. पूरे देश में जगह–जगह अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन जारी थे. इन्हीं सब के बीच 29 नवंबर 1935 को शंकरगढ़ के (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) मुंशी राम सालरिया की पत्नी धन देवी ने एक बच्चे को जन्म दिया. यह बालक कोई और नहीं बल्कि ‘गुरबचन सिंह सालरिया’ ही थे. गुरबचन सिंह को उनकी माता धन देवी बचपन में पिता के बहादुरी के किस्से सुनाती थीं. गुरबचन पिता के बहादुरी के किस्से सुनते-सुनते ही बड़े हुए और फिर क्या, इस बहादुरी की छाप तो गुरबचन पर पड़नी ही थी, सो उन्होंने भी अपने पिता की तरह से फ़ौज में जाने का मन बना लिया.

गुरबचन सिंह फौज में जाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करने लगे.  15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद तो हो गया, लेकिन इसके दो टुकड़े हो चुके थे. बंटवारे के समय इनकी जन्मभूमि शंकरगढ़ भी पाकिस्तान में चला गया.इन सब के बीच फ़ौजी बनने का सपना पाले गुरबचन सिंह ने पढ़ाई नहीं छोड़ा. और उसी किंग जॉर्ज रॉयल मिलिट्री कॉलेज की जालंधर शाखा में एडमिशन ले लिया.  गुरबचन सिंह का फौज में जाने का सपना 1957 में जाकर पूरा हो गया.1957 की शुरुआत में गुरबचन सिंह 2/3 गोरखा राइफ़ल्स में बतौर कमांडिंग ऑफिसर शामिल हो गए और 1960 में गोरखा राइफल्स में स्थानांतरित कर कैप्टन बना दिए गए.

उनका कैडेट नंबर 1317 था।  1961 बेल्जियन्स से स्वतंत्र होने के बाद कांगो में गृह युद्ध के हालात हो गये थे। संयुक्त राष्ट्र ने हालात से निबटने के लिये सैन्य हस्तक्षेप को जरुरी समझा। इस सैन्य मिशन पर भारत ने भी कांगो की जनता के जान माल की सुरक्षा के लिए मानवीय आधार पर अपने 3000 सैनिकों का एक दस्ता रवाना किया। संयुक्त राष्ट्र के इस हस्तक्षेप से अलगाववादी विद्रोही बुरी तरह तिलमिला गये और वे संयुक्त राष्ट्र सैनिकों के विरुद्ध बेहद हिंसक हो गये।

5 दिसंबर 1961 को गोरखा राइफल को विद्रोहियों के बनाये एक रोड ब्लॉक को ध्वस्त करने और संयुक्त राष्ट्र के रोड ब्लॉक स्थापित करने का आदेश प्राप्त हुआ। जब कैप्टेन सलारिया अपनी एक छोटी टुकड़ी के साथ ब्लॉक के नजदीक पहुंचे तो विद्रोहियों ने अत्याधुनिक हथियारों के साथ उनकी पलटन पर भयंकर घातक हमला कर दिया। सलारिया की टुकड़ी में सैनिकों की तादात विद्रोहियों के मुकाबले में बेहद कम थी, इसके वाबजूद सलारिया क्षात्र धर्म के अनुरूप शौर्य प्रदर्शित करते हुए बिना रुके, बिना घबराये अपने सैनिकों के साथ ना केवल आगे बढ़ते रह,े बल्कि दुश्मन का सफाया भी करते रहे। सलारिया की टुकड़ी में उनके सहित 26 सैनिक थे, जबकि दुश्मन की संख्या 90 थी।

दुश्मन के पास दो हथियारबंद गाड़ियां और अत्याधुनिक हथियार थे, जबकि गुरखा सैन्य दल के पास खुखरी, हेंड ग्रेनेड जैसे हल्के हथियार थे। लेकिन सलारिया के नेतृत्व में गोरखा राइफल की ये टुकड़ी अत्यंत वीरता से लड़ी। सलारिया की टुकड़ी ने कुछ ही समय की मुठभेड़ में 40 से ज्यादा विद्रोहियों को खत्म कर दिया, उनकी दो गाड़ियों को ध्वस्त कर दिया। इससे विद्रोहियों के हौसले पस्त हो गये।

ईसी दौरान दुश्मन की एक गोली सलारिया की गर्दन पर आकर लगी। उनके जख्मों से खून बहने लगा लेकिन उस क्षत्रिय शेर ने हौसला नहीं खोया। वह लड़ता रहा और दुश्मनों को मारता रहा, जबतक उसके शरीर से खून की एक एक बूँद रिस नहीं गयी और वो बेदम नहीं हो गया। सलारिया की टुकड़ी ने विद्रोहियों को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया। लेकिन शौर्य के प्रतीक अपने सेनानायक को नहीं बचा सके, वह मानवीय मूल्यों की रक्षा करते हमेशा के लिए अमर हो गया। कैप्टेन सलारिया के इस साहसिक कृत्य ने विद्रोहियों को मुख्य बटालियन तक पहुँचने से रोक दिया। साथ ही साथ संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय को भी विद्रोहियों के हमले से बचा लिया।

कैप्टेन गुरबचन सिंह सलारिया के अद्भुत साहस, वीरता, शौर्य, कर्तव्यपरायणता ने उनका नाम भारतीय शूरवीरों के इतिहास में स्वर्णाक्षर में दर्ज करवा दिया है। भारत के राष्ट्रपति ने 26 जनवरी 1962 को कैप्टन गुरबचन सिंह सालरिया को अदम्य साहस और शौर्य के लिए भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से वीरगति उपरांत सम्मानित किया..आज वीरता के उस शक्तिपुंज को उन के बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार बारम्बार नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प दोहराता है .. जय हिंद की सेना ..

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