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19 जनवरी – 1990 में आज ही कश्मीर से भगा दिए गए थे लाखों हिन्दू जिनके पास सिर्फ 2 रास्ते थे. धर्म का त्याग या फिर मौत..


आज खामोश हैं स्वघोषित सेकुलर व तथाकथित बुद्धिजीवी..उनके लिए फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेरा के इतिहास को जानना व उनका महिमामंडन करना जरूरी होता है जिनका भारत भूमि से दूर दूर तक कोई रिश्ता नही है..जबकि उनकी संस्कृति भी भारत से कहीं से भी मेल नही खाती है..फिर भी उनके लिए लेनिन की मूर्ति कश्मीरी अर्थात उनके ही देश के लाखों हिंदुओं के प्राण, मान व स्वाभिमान से ज्यादा जरूरी लगती है..इसीलिए वो कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार व उनके पलायन पर एक भी शब्द नही बोलते हैं जबकि लेनिन की मूर्ति पर उंगली उठती है तो तड़प जाते हैं..फिर भी इनकी जिद होती है कि उनको जबरन या किसी भी रूप में सब देशभक्त कहें और इस देश की बागडोर उनके हाथों में दें..

उनके हालात की कल्पना कीजिये जब उनके घरों में सामान बिखरा पड़ा था. गैस स्टोव पर देग़चियां और रसोई में बर्तन इधर-उधर फेंके हुए थे. घरों के दरवाज़े खुले थे. हर घर में ऐसा ही समां था. ऐसा लगता था कि कोई बहुत बड़ा भूकंप के कारण घर वाले अचानक अपने घरों से भाग खड़े हुए हों..कश्मीरी पंडित हिंसा, आतंकी हमले और हत्याओं के माहौल में जी रहे थे. सुरक्षाकर्मी थे लेकिन उन्हें किस ने  मना किया था चुप रह कर सब देखते रहने के लिये ये आज तक रहस्य है ..शुरू में उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं. “जम्मू में पहले हम सस्ते होटल में रहे, छोटी-छोटी जगहों पर रहे. बाद में एक धर्मशाला में रहे.. इतना  ही नही, उनके पेट भीख माग कर भी  पले..

देश की आजादी के बाद धरती के जन्नत कश्मीर में जहन्नुम का मौहाल बन चुका था। 19 जनवरी 1990 की काली रात को करीब तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपना आशियाना छोड़कर पलायन को मजबूर होना पड़ा था। अलगावादियों ने हिन्दुओ के घर पर एक नोटिस चस्पा की गई। जिसपर लिखा था कि ‘या तो मुस्लिम बन जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ…या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ’. हिन्दुओ की बहू, बेटियों के साथ उन्मादी नारो के बीच बलात्कार और लूट-पाट की वारदात को अंजाम दिया गया. हर तरफ कत्लेआम हो रहा था। जन्नत में हर ओर मौत और दहशत का मंजर था। कश्मीर में हथियारबंद आंदोलन शुरु होने के बाद उसी रात तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित अपने परिवार के साथ अपना घर, अपनी जन्मभूमि छोड़ने पर मजबूर हो गए.

सुप्रीम कोर्ट में 27 साल पहले हुए पंडितों पर नरसंहार की जांच करने से इनकार कर दिया। रुट्स ऑफ कश्मीर संगठन ने कोर्ट से 1990 में कश्मीरी पंडितों की हत्या की 215 घटनाओं जांच की मांग की थी। जिसमें 700 लोगों की मौत हुई थी। संस्था ने कहा कि दोषी उस समय कश्मीर से भाग गए थे इसलीए जांच नहीं हो सकी। इसपर चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा कि इतने साल से आप कहां थे, अब 27 साल बाद इन मामलों में सबूत कैसे मिलेंगे?  कुल मिला कर अब वो सभी हिन्दू कम से कम भारत के तंत्र से न्याय से सदा वंचित ही रहेंगे जबकि अदालत ने ही लगभग 30 साल पुराने मेरठ के हाशिमपुरा दंगो में मारे गए मुस्लिमों के केस में कई PAC के जवानों को सज़ा दी..


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