12 दिसंबर – ब्रिटिश बंदूकों के विरुद्ध मेघालय में तीरों से लड़े गए युद्ध के महानायक थोगम संगमा बलिदान दिवस. महिलाओं – बच्चों ने भी कटाये थे शीश पर उन्हें नहीं मिला इतिहास में स्थान

ये सर्वविदित है कि देश को उस के वास्तविक इतिहास से वंचित रखने के तमाम प्रयास किये गए हैं .., केवल एक या दो लोगों के इर्द गिर्द सारे इतिहास को समेट देने वालों ने इस से क्या हासिल किया ये तो यकीनन विचार का विषय है पर इतना तो तय है कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान भारत की आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ा था जो अपने ही गौरवशाली पूर्वजों के बारे में जानने से वंचित रह गये हैं और बरछी, तीर , तलवार से लड़े गए युद्धों के बजाय आज़ादी का पूरा श्रेय चरखा और अहिंसा को खुद से ही देते आ रहे हैं .. तथाकथित इतिहासकारों व नकली कलमकारों के इस अक्षम्य पाप का दंड देश की एक बड़ी संख्या में तैयार नई पौध भुगत रही है जिनको तमाम लोग गुमराह कर के राष्ट्रहित के बजाय स्वयं के कार्यों में प्रयोग कर रहे हैं और नुकसान हो रहा है समूचे राष्ट्र का..

आईये आज जानते हैं कि न सिर्फ तथाकथित इतिहासकारों द्वारा बल्कि मीडिया के एक खास वर्ग द्वारा विस्मृत कर दिए गए मेघालय के एक ऐसे शूरवीर के बारे में जिसने अपने तीरों से भेद दिया था अंग्रेजो की वो छाती जिसे फ्रांसीसी व पुर्तगाली सैनिक बड़े बड़े हाथियारो से भी नही भेद पाए थे ..अपनो की गद्दारी के चलते 1857 के स्वाधीनता समर में भारतीयों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली; फिर भी संघर्ष लगातार जारी रहा। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र यद्यपि शिक्षा और आर्थिक स्थिति में दुर्बल था, फिर भी वहाँ के वीरों ने इस संघर्ष की अग्नि को धीमा नहीं पड़ने दिया।  अंग्रेज मेघालय स्थित गारो पहाड़ को अपने कब्जे में करना चाहते थे; पर स्थानीय वनवासी वीरों ने अपने मुखिया थोगन नेगमेइया संगमा के नेतृत्व में उन्हें नाकों चने चबवा दिये। संगमा ने स्थानीय युवकों को संगठित कर अंग्रेजों से लम्बा संघर्ष किया।

थोगन संगमा का जन्म ग्राम छिद्दुलिबरा, जिला सिंगसान गिरी (वर्तमान नाम विलियम नगर) में हुआ था। बचपन से ही उनमें नेतृत्व के गुण थे, अतः वह कई गाँवों के मुखिया बन गये। वे एक कुशल प्रशासक थे। उन्होंने उन गाँवों के लोगों को कठोर दण्ड दिया, जिन्होंने विदेशी और विधर्मी अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इससे उनकी धाक सब ओर जम गयी। थोगन संगमा ने ने गाँव-गाँव घूमकर युवकों को संघर्ष के लिए तैयार किया। इस कार्य में दालबोट सिरा नामक वनवासी वीर उनका सहयोगी था; पर इससे अंग्रेज संगमा को अपनी आँख का काँटा समझने लगे।

गारो पहाड़ पर अधिकार करने के लिए अंग्रेजों ने एक साथ तीन ओर से हमला किया। पहला वर्तमान बंगलादेश में स्थित जिला मैमनसिंह, दूसरा ग्वालपाड़ा और तीसरा धावा बर्मा की ओर से बोला गया। अंग्रेज आधुनिक हथियारों से लैस थे, जबकि वनवासियों के पास उनके पारम्परिक तीर-कमान आदि ही थे। बांग्लादेश की ओर से आ रहे कैप्टन डली को सबसे कम दूरी तय करनी थी, अतः उसने सोमेश्वरी नदी के तट पर अपनी छावनी बनायी और शेष दोनों टुकड़ियों की प्रतीक्षा करने लगा।  जब थोगन के साथियों को यह पता लगा कि कैप्टन डली की टुकड़ी अपने अन्य साथियों की प्रतीक्षा कर रही है, तो उन्होंने पहले हमला करने की रणनीति अपनायी और धावा बोलकर छावनी में आग लगा दी; पर अंग्रेजों की बन्दूकों और आधुनिक शस्त्रों के आगे वनवासियों के हथियार बेकार सिद्ध हुए। अतः उनका हमला विफल रहा; पर थोगन और उसके साथियों ने हार नहीं मानी। वे साहस के साथ नये संघर्ष की तैयारी करने लगे।

अंग्रेजों को भी सब सूचना मिल रही थी। इधर कैप्टन केरी और कैप्टन विलियम की टुकड़ियाँ भी आ पहुँची। इससे अंग्रेजों की शक्ति बढ़ गयी। उन्होंने तूरा पर नया हमला किया। अब थोगन ने लोहे के गरम तवों को केले के तनों से ढाँपकर ढाल और कवच बनाये; पर इससे क्या होने वाला था ? फिर भी संगमा ने अच्छी टक्कर ली। अनेक अंग्रेज सैनिक हताहत हुए। अंग्रेज अधिकारी इससे घबरा गये। अब उन्होंने धोखे का सहारा लिया। उन्होंने सूचना भेजकर 12 दिसम्बर, 1872 को वीर थोगन संगमा को बातचीत के लिए बुलाया। सरल चित्त संगमा उनके शिविर में चला गया।  पर धूर्त अंग्रेजों ने वहां उसे गोली मार दी। यह समाचार जैसे ही उनके साथियों को मिला, सब अंग्रेजों पर पिल पड़े। केवल बड़े ही नहीं, तो बच्चे भी अपने हथियार लेकर मैदान में आ गये; लेकिन अन्ततः वे सब भी वीरगति को प्राप्त हुए और अंग्रेजों ने सम्पूर्ण गारो पहाड़ पर अधिकार कर लिया।

आज भी 12 दिसम्बर को वीर थोगन संगमा की स्मृति में गारो क्षेत्र में ‘स्वातंत्र्य सैनिक दिवस’ मनाया जाता है। आज 12 दिसम्बर को मेघालय के उस महाबलिदानी, स्वतंत्रता सेनानी के बलिदान दिवस पर शत शत नमन करते हुए उनके साथ युद्ध लड़ कर अमर हुए सभी वीरों को सुदर्शन परिवार बारम्बार नमन करता है और उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प दोहराता है .. साथ ही सवाल छोड़ कर जाता है उन नकली कलमकारों के लिए की देश के लिए लड़े ऐसे परमवीरों को विस्मृत करने और चरखे के साथ मात्र एक ही परिवार के इर्द गिर्द घूमने के पीछे उनकी मंशा क्या थी और साथ ही क्या वो वर्तमान पीढ़ी से अपने कृत्य के लिए क्षमा याचना करने को तैयार हैं?

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