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14 जनवरी- पानीपत के तीसरे युद्ध में लुटेरे अब्दाली से लड़ कर राष्ट्र व धर्म की रक्षा हेतु हुतात्मा हुए हजारों मराठा सैनिकों को भावभीनी श्रद्धांजलि


निश्चित रूप से आज का दिन बहुत कम लोगो को पता होगा .. पता न होने की वजह ये है कि जिनकी जिम्मेदारी इसको बताने की थी उनके दृष्टिकोण में अहमदशाह अब्दाली उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता के खुद से रचे गए सिद्धांतों में एकदम फिट बैठता है ..जहां तक रही मराठो की बात तो उनके द्वारा बोला जाने वाला जय भवानी शब्द उन स्वघोषित सेकुलरों के कानों में पिघले शीशे की तरह चुभता रहा होगा और इसीलिए उन्होंने एक नया नाम दिया है ऐसा करने वालों को जिसको कहा जाता है “साम्प्रदायिक शक्तियां” ..अन्यथा आज देश व धर्म की रक्षा हेतु दिवंगत हुए उन हजारों मराठो का पावन इतिहास स्वर्ण के अक्षरों में दर्ज होता ..

उन सभी को चिंता थी भारत की पवित्र भूमि पर पड़े अब्दाली के नापाक कदमो की..उन्हें जल्दबाजी भी थी उन कदमो को उखाड़ फेंकने की जिनके चलते यहां की प्रजा को ग़ज़नवी, बाबर, तैमूर व औरंगज़ेब जैसे क्रूर दरिंदों को सैकड़ो वर्षों तक झेलना पड़ा .. वो जानते थे कि अहमदशाह अब्दाली भी उसी दरिंदगी से भरा हुआ है और उनका भारत भूमि पर आना इतिहास की पुनरावृत्ति होगा.. बस इसी सोच के चलते उन्होंने अपनी असंगठित ही सही पर रही सही शक्ति के साथ आज ही के दिन पानीपत के मैदान में उस दरिंदे अब्दाली से जंग लड़ी और संख्या में कम होने के कारण तब तक मैदान में डटे रहे जब तक कि उनमें से एक एक योद्धा अपनी अंतिम सांस नही ले लिया ..यद्द्पि असंगठित हिन्दू शक्ति के चलते उन्हें अंत मे वीरगति प्राप्त हुई पर उन्होंने अब्दाली जैसे दरिंदे को इतना कमजोर कर दिया था कि उसके पांव सदा के लिए लड़खड़ाते रहे ..

वो मकर संक्रांति का दिवस था.. सन था 1761 जब करोड़ो हिन्दू श्रद्धालु प्रस्थान कर रहे थे विभिन्न पवित्र नदियों की तरफ स्नान , पूजन व ध्यान आदि करने के लिए , ठीक उसी समय मराठा सैनिको ने भी इस पवित्र दिन को चुना था भारत की पवित्र भूमि को लुटेरे व आक्रांता अब्दाली से मुक्त करने के लिए..पानीपत की धरती पर 256 साल पहले मराठा सेना को अफगानिस्तान के हमलावर अहमद शाह अब्दाली से नहीं बल्कि अकाल से हारना पड़ा था। पानीपत के तीसरे युद्ध में मिली हार से जहां उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य का हमेशा के लिए पतन हो गया था। वहीं भारत में अंग्रेजी शासन तेजी से पैर पसारने लगा क्योकि मराठो से लड़ कर अब्दाली भी टूट चुका था..

इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि पानीपत के तीसरा युद्ध की नींव 10 जनवरी सन् 1760 को अफगानी हमलावर अहमद शाह अब्दाली द्वारा दिल्ली में हिन्दू सेनापति दत्ताजी सिंधिया की हत्या कर दिल्ली पर कब्जा करने के साथ ही रखी गई थी। दत्ताजी की हत्या व दिल्ली हाथ से निकल जाने की सूचना से मराठा पेशवा बालाजीराव आगबबूला हो उठे और उन्होंने, अब्दाली को हराने के लिए अपने चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ व अपने पुत्र विश्वास राव के नेतृत्व में विशाल सेना, दिल्ली को जीतने के लिए भेजी। मराठा सेना ने दो अगस्त सन् 1760 को दिल्ली को अब्दाली के कब्जे से मुक्त करवा लिया। दिल्ली हाथ से चले जाने की सूचना से अब्दाली बौखला उठा और मराठा सेना के साथ दिल्ली पर कब्जे के लिए युद्ध करने की ठान ली।

मराठा सेना को हराने के लिए अब्दाली, शुजाउद्दौला व नजीब की सेनाएं एक जुट हो गई और तीनों की सेना को इस्लामिक सेना का नाम दिया गया। इधर, अब्दाली अपनी सेना के साथ यमुना नदी पार कर पानीपत में मैदान में आ डटा और इसके साथ ही युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो गई। अकाल से त्रस्त मराठा सेना के सामने करो या मरो के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। विकट हालत में वीर मराठाओं ने अब्दाली से युद्ध करने का निर्णय लिया और 14 जनवरी सन् 1761 की सुबह करीब आठ बजे मराठा सेना ने अब्दाली की फौज पर भयंकर मिला बोल दिया। करीब नौ घंटे चले युद्ध में मराठा सेना, दुश्मन पर हावी रही। युद्ध के दौरान पेशवा के पुत्र विश्वाराव शहीद हो गए। विश्वासराव की मौत की सूचना से सेनापति सदाशिव भाऊ आपा खो बैठे और घोडे पर सवार होकर अब्दाली की सेना पर टूट पडे। भाऊ भी वीरगति को प्राप्त हुए। पहले विश्वासराव और फिर भाऊ के बलिदान के बाद मराठा जीते हुए युद्ध को हार गए.

इतिहासविद् डॉ.बिजेंद्र बालियान बताते है कि मराठा सेना अकाल का शिकार हो गई।मराठा सेना ने कुंजपुरा (वर्तमान में करनाल का गांव) को भी अब्दाली के चुंगल से मुक्त करवा लिया। इस दौरान दिल्ली से कई-कई सौ किलोमीटर क्षेत्र में सूखा पड़ गया और मराठा सेना को रसद मिलनी बंद हो गई। रसद नहीं मिलने के कारण मराठा सेना की भूखों मरने की नौबत आ गई थी. आज दिवंगत हुए उन सभी मराठा सैनिको को सुदर्शन परिवार बारंबार नमन व वंदन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है ..


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