क्या क्यों पहनते थे हमारे पूर्वज चरण पादुका कही जाने वाली वो “खड़ाऊँ” .. पढ़िए इसे वैज्ञानिक लाभ और ” गर्व से कहो हम हिन्दू हैं “

आज हम अपने पूर्वजों द्वारा आविष्कार की गई खड़ाऊ के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। गुरुत्वाकर्षण और ऊष्मा का जो सिद्धांत वैज्ञानिकों ने अब हमें बताया है इसे हमारे ऋषि पूर्वज बहुत पहले से जानते थे। सिर पर चोटी रखना, यज्ञोपवीत धारण करना, रक्षा सूत्र बांधना आदि का आविष्कार हमने अपने शारीरिक सौंदर्य के लिए या अपना ‘ट्रेडमार्क’ निश्चित करने के लिए नहीं किया था, अपितु अपनी सभ्यता को उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए किया था।

हमने जीवन को अंतरतम की सौंदर्य पूर्ण उत्कृष्टता में ढालने के लिए सभ्यता को अपनाया , जबकि पश्चिमी जगत ने बाह्य सौंदर्य मैं खोकर जीवन को विलासिता में डुबोकर उसे मारने के लिए सभ्यता का विकास किया । यदि बात खड़ाऊ की करें तो इनके प्रयोग में भी यह बात स्पष्ट परिलक्षित होती है । शरीर में व्याप्त विद्युत तरंग गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। यह प्रक्रिया यदि निरंतर चले तो शरीर की जैविक शक्ति क्षीण होने लगती है । ऊष्मा को अवशोषण से बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने लकड़ी की चरण पादुका अर्थात खड़ाऊ को पहनना आरंभ किया । इससे शरीर का रक्त संचार भी ठीक रहता है, और पैरों की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है।

रीढ की हड्डी मजबूत होती है और “स्लिप डिस्क “का कोई खतरा नहीं होता,। यह थी हमारी खड़ाऊ पहनने की सभ्यता , जो कि हमारे स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। अब आते हैं आज के पश्चिमी जगत की सभ्यता पर जिसने हमें सभ्यता सिखाने का ठेका ले लिया है और जिसके दीवाने आजकल हमारे देश में भी बड़ी संख्या में हैं । उन्होंने खड़ाऊ के स्थान पर जूते का आविष्कार किया ।

जूते में गुरुत्वाकर्षण और ऊष्मा का सिद्धांत काम नहीं करता । यही कारण है कि जूते का प्रयोग करके हम प्रसन्न नहीं रहते। हमारा स्वास्थ्य चौपट हो रहा है । रीढ की हड्डी और पैरों की मांसपेशियों की दुर्बलता की बीमारी लोगों को घेर रही हैं। पैरों की गर्मी से सिर की बीमारियां बनती जा रही हैं। महिलाएं ऊंची एडी की चप्पलों व जूतों के प्रयोग से ब्लड प्रेशर की शिकार हो रही हैं । जिससे चिकित्सकों की चांदी कट रही है ।मेडिकल क्षेत्र में नई नई दवाओं के आविष्कार हो रहें हैं। पर सबके सब अंततः मनुष्य को मारने वाले ही सिद्ध हो रहे हैं , फिर भी हम महंगे जूते पहनने को ही अपनी शान का प्रतीक मान रहे हैं ।

इन जूतों ने गाय जैसे कितने ही चौपायों को समाप्त कर दिया है और पर्यावरण संतुलन के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है। मनुष्य अपने मरने का अपने आप ही सामान जोड़ रहा है । हम मरने को के उपायों को ही सभ्यता माने बैठे हैं। इसे विडंबना कहें या आत्मप्रवंचना? हम जूते नहीं छोड़ सकते तो इतना तो कर ही लें कि अधिक से अधिक समय अपने पैरों को खुली हवा में रखेंगे । विश्व गुरु भारत के निर्माण के लिए अपने ऋषियों की जीवन शैली को ही अपनाना होगा । 

साभार-

श्री राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत समाचार

www.ugtabharat.com

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