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प्रकाश पर्व: नमन है उन गुरु गोविन्द सिंह जी को, जिन्होंने मुग़ल आक्रान्ताओं से लड़ने को नारा दिया था “सवा लाख से एक लड़ाऊं”

“सवा लाख ते एक लड़ाऊं, तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं”… ये महज एक पंक्ति ही नहीं, अन्याय के खिलाफ वह आवाज है जिसकी प्रेरणा से वीर जांबाजों ने मुग़ल आक्रान्ताओं के होश फाख्ता कर दिए. ये आवाज थी पराक्रम, शौर्य, त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति सिखों के 10वें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी. वो गुरु गोविन्द सिंह जी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र-धर्म की रक्षा और मानवता को समर्पित कर दिया. गुरु गोविन्द सिंह जी महान हिंदुस्तान के गौरवशाली इतिहास का वो नाम हैं जिनका स्मरण आते ही जहाँ धर्म रक्षकों की धमनियों में लहू लावा बनकर दौड़ने लगता है तो वहीं मुगल  समर्थकों के होश फाख्ता हो जाते हैं.

आज गुरु गोविन्द सिंह जी के प्रकाश पर्व पर पूरा राष्ट्र उनको याद कर रहा है, उन्हें नमन वंदन कर रहा है. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार गुरु गोविंद सिंह का जन्म पौष माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को 1723 विक्रम संवत को हुआ था. इस साल यह तिथि 13 जनवरी को आई है. गुरु गोविंद सिंह एक महान कर्मप्रणेता, अद्वितीय धर्मरक्षक, ओजस्वी वीर रस के कवि के साथ ही संघर्षशील वीर योद्धा भी थे. उनमें भक्ति और शक्ति, ज्ञान और वैराग्य, मानव समाज का उत्थान और धर्म और राष्ट्र के नैतिक मूल्यों की रक्षा हेतु त्याग एवं बलिदान की मानसिकता से ओत-प्रोत अटूट निष्ठा तथा दृढ़ संकल्प की अद्भुत प्रधानता थी, तभी स्वामी विवेकानंद ने गुरुजी के त्याग एवं बलिदान का विश्लेषण करने के पश्चात कहा है कि ऐसे ही व्यक्तित्व के आदर्श सदैव हमारे सामने रहना चाहिए.

सिख धर्म के दसवें गुरु गोबिंद सिंह बचपन ने बहुत ही ज्ञानी, वीर, दया धर्म की प्रतिमूर्ति थे. उन्होंने सिख धर्म के लोगों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित किया जिसके लिए उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की. लोगों की भलाई के लिए उन्होंने अपनी जान की बाजी लगाने की कोई परवाह नहीं की. मुग़ल आक्रान्ता औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों पर किये जा रहे जुल्म तथा धर्मान्तरण को रोकने में में गुरु गोविन्द सिंह जी के पिता ने अपना बलिदान दे दिया, तब मात्र 9 वर्ष की आयु में गुरु गोविन्द सिंह जी को सिखों के 10वें गुरु की पदवी सौंपी गई.

गुरु गोबिन्द सिंह ने 1699 ई. में धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही ख़ालसा पंथ की स्थापना की थी. ख़ालसा यानि ख़ालिस (शुद्ध), जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो. ख़ालसा का अर्थ है ख़ालिस अर्थात् विशुद्ध, निर्मल और बिना किसी मिलावट वाला व्यक्ति। इसके अलावा हम यह कह सकते हैं कि ख़ालसा हमारी मर्यादा और भारतीय संस्कृति की एक पहचान है, जो हर हाल में प्रभु का स्मरण रखता है और अपने कर्म को अपना धर्म मान कर ज़ुल्म और ज़ालिम से लोहा भी लेता है. गुरु जी द्वारा ख़ालसा का पहला धर्म है कि वह देश, धर्म और मानवता की रक्षा के लिए तन-मन-धन सब न्यौछावर कर दे. निर्धनों, असहायों और अनाथों की रक्षा के लिए सदा आगे रहे. जो ऐसा करता है, वह ख़लिस है, वही सच्चा ख़ालसा है. ये संस्कार अमृत पिलाकर गोबिन्द सिंह जी ने उन लोगों में भर दिए, जिन्होंने ख़ालसा पंथ को स्वीकार किया था. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने कहा था कि जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है.

गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी जिंदगी में वह सब देखा था जिसे देखने के बाद शायद एक आम मनुष्य अपने मार्ग से भटक या डगमगा जाए लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ. परदादा गुरु अर्जुनदेव की शहादत, दादा गुरु हरगोविंद द्वारा किए गए युद्ध, पिता गुरु तेगबहादुर की शहीदी, चार में से बड़े दो पुत्रों (साहिबजादा आजीत सिंह एवं साहिबजादा जुझार सिंह) का चमकौर के युद्ध में शहीद होना और छोटे दो पुत्रों (साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह) को जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाना, माँ गुजरी जी को सरहिंद के किले के बुर्ज से गिराकर शहीद कर देना, वीरता व बलिदान की विलक्षण मिसालें हैं. इस सारे घटनाक्रम में भी अड़िग रहकर गुरु गोबिंद सिंह संघर्षरत रहे, धर्मरक्षा के लिए लड़ते रहे. आज प्रकाश पर्व पर सुदर्शन परिवार गुरु गोविन्द सिंह जी को नमन वंदन करता है तथा उनसे प्रेरणा लेकर हमेशा धर्मरक्षा के लिए तत्पर रहने का संकल्प लेता है.

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