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कभी दिल्ली में छा जाने का दावा करने वाले केजरीवाल आज लड़ रहे हैं तीसरे नंबर पर आने की लड़ाई

वो कभी खुद से खुद को दिल्ली का बेताज बादशाह समझने लगे थे . उन्होंने सोचा था कि जनता से ज्यादा वो समझदार हैं . पर यकीनन जनता से पार पाना किसी के भी बस की बात नहीं ये बात शायद आज अरविन्द केजरीवाल को समझ में आ जाए . 

दिल्ली को प्रचंड बहुमत से जीत कर वो निकल पड़े थे काशी में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने . वहाँ उन्हें बुरी हार मिली . फिर वो दिल्ली को उसी हालत में छोड़ कर पंजाब निकल गए . उन्हें आशा थी कि उन्हें पंजाब में भी वैसे ही जीत मिलेगी साथ में एक निशाना गोवा पर भी लगाया , दिल्ली जैसे और जहाँ थी वैसे ही वही रह गयी . पंजाब और गोवा ने उन्हें किनारे कर दिया . श्याद उन्हें दिल्ली के लोगों की हालत से कुछ सबक मिला होगा . 

फिर आया MCD चुनाव , यहाँ वो फिर से अचानक ही भूली बिसरी दिल्ली पर ढेर सारा स्नेह लुटाने लगे . दिल्ली से ढेर सारे वादे एक बार फिर से होने लगे, शायद उन्हें पता रहा होगा कि दिल्ली वाले उन पर नज़र नहीं रख रहे . पर असल में वो गलत थे . इस बार दिल्ली वालों के हाथ में एक बार फिर उनका ब्रह्मास्त्र अर्थात वोट का अधिकार था और उन्होंने उसे चलाया भी . वो की चोट से बड़े बड़े आहत हो चुके हैं , वही आघात केजरीवाल को भी लगा .

अब तक की वोटिंग के रुझान ये हैं कि आम आदमी पार्टी जो कभी कांग्रेस को खत्म हो चुकी पार्टी मानती थी , उसी पार्टी से उसे दूसरे और तीसरे नंबर के पायदान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है . दिल्ली के इस जनादेश के बाद शायद केजरीवाल जी इस जनादेश से कुछ समझ सकें और अपने द्वारा छेड़ी गयी एक बिलकुल नयी प्रकार की राजनीति पर कुछ आत्ममंथन कर के अपने लड़खड़ाते ढाँचे को सुधार सकें . 

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