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संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि बौद्धों को एक करने व् रोहिंग्या का संहार करने के पीछे म्यांमार सेना से भी ज्यादा कोई और है जिम्मेदार

वो पूरी दुनिया के लिए एक बड़े आश्चर्य का विषय था कि कैसे संसार के सबसे शांतिप्रिय कहे जाने वाले बौद्ध हथियार उठा लिए और किस ने उन्हें एक सूत्र में पिरो दिया उन दुर्दांत आतंकियों के लिए जिन्हें रोहिंग्या नाम से जाना जाता है . वो कौन है जिसने म्यन्मार के हर कोने में रहने वाले बौद्ध के मन में इन दुर्दांत आतंकियों , आये दिन हत्या , ब्लास्ट और बलात्कार करने वाले नरपिशाचो के प्रति जगाया और फिर सघर्ष करने के लिए प्रेरित किया .

ध्यान देने योग्य है कि अन्तराष्ट्रीय समुदाय भी अब मान रहा है कि म्यन्मार में रोहिंग्या के खिलाफ बौद्धों को जगाने और एक साथ खड़े होने के लिए सोशल मीडिया ने सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है . इसमें से सबसे ज्यादा फेसबुक का योगदान रहा है . मुस्लिम देशो का भी मानना है कि रोहिंग्या की बर्बादी की कहानी फेसबुक से ही शुरुआत हुई है . यहाँ तक कि खुद संयुक्त राष्ट्र का भी कहना है कि रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ गुस्सा भड़काने में फ़ेसबुक की “निश्चित भूमिका” थी.

मानवाधिकार वालों ने तो फेसबुक को एक जानवर के रूप में परिभाषित कर डाला . मार्च में म्यांमार में मानवाधिकारों पर यूएन के नियुक्त विशेष दूत यांगी ली ने कहा था, “मुझे डर है कि फ़ेसबुक अब एक जानवर में तब्दील हो गया है जो इसकी असली मंशा नहीं थी.” यद्दपि इजिप्ट की हिंसक क्रान्ति भी फेसबुक से ही शुरू हुई थी जिसमे कई लोग मारे गये थे और एक पूरा का पूरा देश ही सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजरा पर उस समय इन मानवाधिकार वालों ने इस पर ज्यादा चर्चा नहीं की . थेट स्वीई विन का मानना ​​है कि पहले जनसंख्या के बड़े हिस्से को इंटरनेट का थोड़ा ही अनुभव था, इसलिए तब वे दुष्प्रचार और ग़लत जानकारी के जाल में फंस जाते थे. ध्यान ये भी देने योग्य है कि लगभग 5 करोड़ की आबादी में वाले म्यांमार में 1 करोड़ 8 लाख के करीब नियमित फ़ेसबुक यूज़र्स हैं.

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