पहली बार जालियांवाला बाग़ नरसंहार के लिए एक ईसाई पादरी ने मांगी है माफी

जलियांवाला बाग़.. ये शब्द जेहन में आते ही भारतीयों की आँखों में आक्रोश की ज्वाला भड़क उठती है. ये वो जगह है जहाँ 1919 में अंग्रेजों क्रूरता तथा हैवानियत का नंगानाच करते हुए भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के हजारों क्रांतिकारियों को गोलियों से भून दिया था. इस घटना को 100 साल हो चुके हैं तथा भारत की अब अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो चुका है तथा दुनिया में नई महाशक्ति के रूप में उभर कर सामने आ रहा है.

जलियांवाला बाग़ नरसंहार के 100 साल बाद पहली बार किसी ब्रिटिश ईसाई पादरी ने इस क्रूरतम नरसंहार के लिए माफी माँगी है. खबर के मुताबिक़, ब्रिटिश ईसाई आर्कबिशप ऑफ कैंटरबरी जस्टिन वेलबी मंगलवार को जलियांवाला बाग मेमोरियल गए. ब्रिटिश ईसाई पादरी ने वहां पर सिर झुकाकर भारतीय बलिदानियों को श्रद्धांजलि दी. इसके बाद उन्होंने कहा कि यहां पर जो अपराध हुआ था उसके लिए मैं शर्मसार हूं और माफी मांगता हूं. एक पादरी होने के नाते मैं इस त्रासदी पर बेहद दुखी हूं.

उन्होंने कहा कि मैं ब्रिटिश सरकार की तरफ से नहीं बोल सकता क्योंकि मैं कोई सरकारी अधिकारी नहीं हूं. लेकिन प्रभु यीशु की तरफ से जरूर बोल सकता हूं. उन्होंने लोगों को धन्यवाद दिया कि आप लोगों ने शहीदों को याद रखा है. उन्होंने शहीदों की आत्मा की शांति के लिए संग्रहालय में प्रार्थना भी क विजिटर बुक में  जस्टिन वेलबी ने लिखा-इस जगह पर सौ साल पहले जो अत्याचार हुए वो बेहद शर्मसार कर देने वाले हैं. मैं शहीदों के रिश्तेदारों और उनके वंशजों के लिए प्रार्थना करता हूं.

ब्रिटिश ईसाई पादरी ने कहा कि साथ ही इस बात के लिए भी भारत के उम्दा लोगों के साथ हमारे संबंध बेहतर हों. लेकिन यह प्रार्थना मुझे यह भी बताती है कि हमें इतिहास से सीखना होगा. अपने भीतर की नफरत को समाप्त करना होगा. वैश्विक शांति के लिए काम करना होगा. भारत यात्रा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यह यात्रा मेरे लिए बेहद शिक्षा देने वाली है. मैं इसे कभी नहीं भूलूंगा. इस देश के लोगों ने दुनिया को जो कुछ दिया है मैं उसके लिए धन्यवाद देता हूं.

बता दें कि 13 अप्रैल 1919 के दिन, अमृतसर के जलियांवाला बाग में सिख बैसाखी पर्व पर रोलेट ऐक्ट के विरोध में एकत्र हुए थे. इसमें महिलाएं और बच्चे भी थे. जलियांवाला बाग की चारों तरफ बड़ी बड़ी दीवारें तब भी बनी हुई थी और तब वहां बाहर जाने के लिए सिर्फ एक मुख्य द्वार था और दो-तीन छोटी लेन ही थी. ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवार्ड हैरी डायर यहां 50 बंदूकधारी सिपाहियों के साथ पहुंचा तथा बिना किसी पूर्व सूचना के गोली चलाने का आदेश दे दिया. यह फायरिंग 10 मिनट तक चलती रही. इसमें कई बेगुनाहों की जानें गई. लोग जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए. मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी थे. लगभग 1650 राउंड की फायरिंग की गई थी. सरकारी आंकड़े में 379 मौत बताई गई जबकि कुछ निजी आंकड़ों में ये संख्या 1 हजार से भी अधिक थी. अब इस नरसंहार के लिए ब्रिटिश ईसाई पादरी ने  माफी माँगी है.

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