पहले जहाँ पारसी रहते थे अब वो जगह है ईरान… जानिए कैसे और क्यों भागे पारसी और बन गया वो इस्लामिक मुल्क

प्राचीन काल में पारसियों का देश कहा जाने वाला फारस आधुनिक युग का ईरान आज पारसियों के लिए ही नर्क बक चूका है। ईरान में जिस धर्म की सबसे पहले नींव पड़ी थी वही धर्म आज वहां बिलुप्त होने की कगार पर है। इस्लामिक आतंकियों ने जबरन हजारो पारसियों को वहां मुस्लिम बना दिया है। प्राचीन काल में अरब आक्रमणकारियों ने फारस की संस्कृति और उनके धार्मिक स्थलों को खत्म किया। तब से आज तक वहां के पारसी अपना अस्तित्व बचाने के लिए लड़ रहे है।

इस्लामिक सरकार के अनेक जुल्मो से वो खून के आंसू सेहन कर रो रहे है।

 पारसी धर्म लोग अंतिम संस्कार के दौरान जुलूस निकालते हैं लेकिन उनकी शांति विस्फोट और गोलीबारी की आवाजों से भंग हो जाती है। उनके इस धार्मिक क्रियाकलाप के रास्ते में इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का अभ्यास आड़े आता है। पारसियों के धार्मिक क्रियाकलाप के खातिर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी के गार्ड्स अपनी ट्रेनिंग नहीं रोकते हैं।

पारसी धर्म में 24 घंटे के अंदर शव का अंतिम संस्कार करने की परंपरा है लेकिन इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने उनका रास्ता अवरुद्ध कर दिया है। इस्लामिक राज्य में धार्मिक आजादी की बलि चढ़ने की ओर यह केवल एक इशारा भर है।

 पैगंबर ज़राथुस्ट्र ने पारसी धर्म की स्थापना प्राचीन ईरान में 3500 साल पहले की थी। जब तक ईरान में अरबों ने प्रवेश नहीं किया था तब तक पारसी, यहूदी और ईसाई धर्म के लोग अपनी-अपने परंपराओं और रिवाजों का पालन निर्बाध रूप से करते थे।

अरबों के ईरान में प्रवेश के बाद पारसियों पर खूब अत्याचार शुरू हो गया और वे अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनकर रह गए। पारसी धर्म के लोगों का बड़े स्तर पर इस्लाम में धर्मांतरण कर दिया गया.

1979 में जब इस्लामिक क्रान्ति हुई तो कट्टरवादी शियाओं ने तेहरान में पारसियों के फायर टेंपल पर धावा बोल दिया और जोरोऐस्टर की मूर्तियों को तोड़ दिया। फायर टेंपल में पारसी धर्म के लोग ईश्वर के प्रतीक रूप में अग्नि की पूजा करते हैं।

नवंबर 2005 में काउंसिल ऑफ गार्जियन ऑफ कॉन्स्टिट्यूशन के चेयरमैन अयातुल्लाह अहमद जन्नती ने पारसियों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाना शुरू कर दिया। उन्होंने पारसियों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को ‘धरती पर घूमने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त पापी जानवर’ करार दिया। जब संसद में पारसी धर्म के एकमात्र प्रतिनिधि ने इस पर विरोध जताया तो उन्हें रिवॉल्यूशनरी ट्राइबल के समक्ष पेश कर दिया गया।

ट्राइब्यूनल में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ दिया कि दोबारा वह उनकी घोषणाओं को चुनौती पेश करने की हिमाकत नहीं करें, पारसी सांसद को दोबारा ऐसा करने पर मृत्युदंड की सजा की चेतावनी भी दी गई। .इस घटना के बाद से डर-सहमे पारसी समुदाय ने उन्हें दोबारा चुनने में बिल्कुल उत्साह नहीं दिखाया।

पारसियों के कमजोर होती राजनीतिक जमीन ने भी कट्टर शिया मौलानाओं के प्रभाव को और मजबूत किया है।

ईसाई, यहूदी और बाहा अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों और पारसी ऐक्टिविस्टों को कट्टर इस्लाम का विरोध करने पर राजद्रोह के मुकदमे में कुख्यात जेल में बंद कर दिया जाता है। अयातुल्लाह के उकसाने पर ईरानी मीडिया ईरान के प्राचीन धर्म के अनुयायियों को बहुईश्वरवादी और शैतान पूजने वाले लोगों के तौर पर दिखाने लगा। कट्टर मुल्लाओं ने ना केवल ईरान में पारसियों के खिलाफ आग उगली बल्कि टोरंटो की मस्जिद तक में पारसियों के खिलाफ प्रचार किया गया।

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